इंडिया गठबंधन बैठक से एनडीए में घबराहट
राहुल के नेतृत्तव में विपक्ष एकजुट, कांग्रेस के साथ 23 दल

मोदी सरकार के खिलाफ महागठबंधन 2.0 की पटकथा लिखी जा रही है?
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आज जो हुआ वह सिर्फ एक राजनीतिक बैठक नहीं थी। यह सत्ता के गलियारों में गूंजती एक ऐसी चेतावनी दिखी जिसने भारतीय राजनीति के तापमान को अचानक कई डिग्री बढ़ा दिया है। देश के 23 से अधिक बड़े राजनीतिक दल एक मंच पर दिखाई दिए। मंच पर चेहरे अलग-अलग थे विचारधाराएं अलग थीं राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अलग थीं लेकिन उन सभी के निशाने पर नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार है। ममता बनर्जी की पहल पर बुलाई गई इस बैठक में उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, वामपंथी दलों के प्रतिनिधि और कई क्षेत्रीय ताकतें मौजूद रहीं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कौन आया और कौन नहीं आया। असली सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि वर्षों तक एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लडऩे वाले नेता अब एक ही मेज पर बैठकर आर पार की लड़ाई की बात कर रहे हैं?
मोदी सरकार पर जमकर हमला
बैठक में मोदी सरकार पर बेहद गंभीर आरोप लगाए गए। विपक्ष का कहना है कि देश में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर की जा रही हैं। संविधान की मूल भावना पर लगातार चोट हो रही है। जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार की तरह किया जा रहा है और करोड़ों लोगों की रोजी रोटी से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज किया जा रहा है। विपक्ष यह भी दावा कर रहा है कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं जो लोकतंत्र की बुनियाद को प्रभावित कर सकते हैं।
साझा राष्ट्रीय अभियान की जमीन तैयार
राजनीति में आरोप लगाना नयी बात नहीं है। नयी बात यह है कि इस बार विपक्ष केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर रहा बल्कि एक साझा राष्ट्रीय अभियान की जमीन तैयार करता दिख रहा है। राहुल गांधी लंबे समय से लोकतंत्र संविधान और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं। अब उन्हीं मुद्दों पर कई क्षेत्रीय दल भी सार्वजनिक रूप से सहमति जताते दिखाई दे रहे हैं। दिल्ली की यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब देश की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। एक तरफ भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करती है और लगातार चुनावी सफलताओं का हवाला देती है। दूसरी तरफ विपक्ष यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं बल्कि व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की है।
जांच एजेंसियों का इस्तेमाल डराने के लिए किया जा रहा है : खरगे
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बैठक में बोलते हुए कहा कि मैं इंडिया समूह के नेताओं की इस बैठक में आप सभी का स्वागत करता हूं। यह समूह लगभग ठीक तीन साल पहले अस्तित्व में आया था। मैं ज्यादा नहीं बोलना चाहता क्योंकि हमारे सामने मौजूद मुद्दे आप सभी अच्छी तरह जानते हैं। हमने 17 अप्रैल को लोकसभा में अपनी एकजुटता और एकता को बहुत निर्णायक तरीके से दिखाया जब हम सबने मजबूती से एकजुट होकर डिलिमिटेशन पर केंद्र सरकार के दुर्भावनापूर्ण बिलों को परास्त किया। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि अब हमें उसी भावना को और मजबूत करना है और आगे बढ़ाना है ताकि केंद्र सरकार के कुशासन के कारण देश के सामने खड़ी कई राजनीतिक आर्थिक सामाजिक और विदेश नीति से जुड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सके। एसआईआर के कारण करोड़ों लोगों से उनका मताधिकार छीना जा रहा है। संविधान पर हमला लगातार जारी है। जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने और डराने-धमकाने के औजार के रूप में लगातार किया जा रहा है। मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि गैर भाजपा सरकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। जरूरी वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और आर्थिक माहौल बेहद नकारात्मक है। नई नौकरियां पैदा करने के लिए जिस रफ्तार से नए निवेश आने चाहिए, वे बिल्कुल उस रफ्तार से नहीं आ रहे हैं। कई क्षेत्रों में निजी एकाधिकार बढ़ रहा है और एमएसएमई का भविष्य गंभीर संकट में है। परीक्षा प्रणाली के पूर्ण कुप्रबंधन के कारण हमारे लाखों युवाओं की आशाओं और आकांक्षाओं के साथ विश्वासघात किया जा रहा है। समाज के कमजोर वर्गों पर अत्याचार खासकर भाजपा शासित राज्यों में लगातार जारी हैं। हमारी विदेश नीति के साथ पूरी तरह से समझौता किया गया है और उन पारंपरिक मूल्यों को कायम नहीं रखा गया है जिनका भारत लंबे समय से पुरजोर समर्थन करता रहा है।
क्या इस जमावड़े में सरकार को हिलाने का दम है?
कागज पर देखें तो इस बैठक में शामिल दलों के पास करोड़ों वोट हैं कई राज्यों में इनकी सरकारे रही है या फिर हैं। यह दल क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत जनाधार रखते हैं। ममता बनर्जी बंगाल में प्रभावशाली हैं, अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में बड़ी ताकत हैं, उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं और दक्षिण भारत में भी कई क्षेत्रीय दल भाजपा को चुनौती देते हैं। लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि केवल नेताओं की संख्या से सरकारें नहीं हिलतीं। विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा नेतृत्व, एजेंडा और आपसी भरोसा रही है। जब तक सभी दल एक साझा रणनीति और स्पष्ट लक्ष्य पर सहमत नहीं होते तब तक ऐसी बैठकें सुर्खियां तो बनाती हैं लेकिन परिणाम नहीं। भाजपा की ताकत सिर्फ नरेंद्र मोदी नहीं हैं। उसका विशाल संगठन, बूथ स्तर तक फैला नेटवर्क और संसाधनों की उपलब्धता उसे अलग बढ़त देते हैं। विपक्ष को यदि वास्तव में चुनौती पेश करनी है तो उसे केवल मोदी विरोध नहीं बल्कि वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टि भी प्रस्तुत करनी होगी। पूरे सूरतेहाल को देखने के बाद कहा जा सकता है कि विपक्षी राजनीतिक एकता लगातार बढ़ रही है। सत्ता एक ही फार्मूले पर चलती है फूट डालो राज करो। सवाल यही है कि समय बदल गया है और कल तक जो राजनीतिक दल एक दूसरे को कोसते थे आज वह सब एक प्लेटफार्म पर बैठकर मोदी सरकार को हटाने की प्लानिंग कर रहे हैं।
नहीं पहुंचे आप और डीएमके नेता
आज की दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक से आम आदमी पार्टी और डीएमके ने दूरी बना कर रखी। डीएमके की दूरी तो समझ में आती है लेेकिन आम आदमी पार्टी की गठबंधन से दूरी एक नये सवाल को जन्म दे रही है कि अरविंद केजरीवाल कौन सी राजनीतिक खिचड़ी पकाने के चक्कर में हैं। जानकारों के मुताबिक आम आदमी पार्टी इंडिया गठबंधन के मंच पर पंजाब चुनाव के कारण दूरी बना रही है। क्योंकि पंजाब में आप और कांग्रेस दोनों सशक्त दल है। सवान यही है कि अगर दो मजबूत लोग एक मंच पर आते हैं तो मंच और मजबूत होता है ऐसे में विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ साझा रणनीति बनाने का दावा कर रहा था तब इन दोनों दलों की गैरमौजूदगी ने विपक्षी एकता की तस्वीर पर हल्का सा धब्बा जरूर लगा दिया।




