क्या बागी सांसदों की चाल पड़ेगी भारी? उद्धव गुट ने कानूनी लड़ाई की तैयारी तेज की!
उद्धव ठाकरे गुट का कहना है कि केवल सांसदों की संख्या पूरी होने से किसी दूसरी पार्टी में विलय का अधिकार नहीं मिल जाता।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। महाराष्ट्र की महायुति सरकार में विकास की धारा भले ही न बह रही हो लेकिन नफरती राजनीति जमकर हो रही है।
महायुति सरकार में तोड़-मरोड़ की जा रही है। विपक्ष को कमजोर करने की बड़ी कोशिश की जा रही है। बीते कई रोज से नेताओं के पाला बदलने की खबरों के बीच विपक्षी नेताओं का शिंदे गुट पर लगातार आरोप-प्रत्यारोप भी जारी है। दरअसल महाराष्ट्र की राजनीति में उठापटक चल रही है।
हाल ही में Uddhav Thackeray के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसदों ने अलग रुख अपनाया है। इसके बाद यूबीटी के नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष Om Birla से मुलाकात कर कहा कि केवल सांसदों का एक समूह अपनी मर्जी से किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकता। उनका तर्क है कि पार्टी का विलय करने का अधिकार पूरी राजनीतिक पार्टी के पास होता है, न कि केवल संसदीय दल के कुछ सांसदों के पास।
विस्तार से समझें तो लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के कुल 9 सांसद हैं। इनमें से 6 सांसदों के बागी होने की चर्चा है। बागी सांसदों का दावा है कि उनकी संख्या दो-तिहाई है, इसलिए उन्हें अलग समूह के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे गुट का कहना है कि केवल सांसदों की संख्या पूरी होने से किसी दूसरी पार्टी में विलय का अधिकार नहीं मिल जाता। पार्टी का संगठन, संविधान और आधिकारिक निर्णय भी महत्वपूर्ण होते हैं। यह विवाद सीधे तौर पर भारत के दलबदल विरोधी कानून यानी संविधान की दसवीं अनुसूची से जुड़ा हुआ है।
इस कानून का उद्देश्य चुने हुए जनप्रतिनिधियों को बार-बार पार्टी बदलने से रोकना है। पहले कानून में “स्प्लिट” यानी टूट को मान्यता मिलती थी, लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया। अब केवल “विलय” का प्रावधान बचा है, जिसमें दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन एक महत्वपूर्ण शर्त माना जाता है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस बात पर मतभेद हैं कि केवल संसदीय दल के दो-तिहाई सदस्य होने से मामला पूरी तरह वैध माना जाएगा या नहीं।
उद्धव ठाकरे गुट का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों से उनकी पार्टी को लगातार कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। पहले विधायकों का बड़ा समूह अलग हुआ और बाद में Eknath Shinde के नेतृत्व में नया शक्ति केंद्र बन गया। अब सांसदों के स्तर पर भी टूट की खबरों ने यूबीटी को एक और बड़ा झटका दिया है। यूबीटी नेताओं का कहना है कि जनता ने जिन सांसदों को एक खास विचारधारा और पार्टी के नाम पर चुना था, उन्हें बीच कार्यकाल में राजनीतिक निष्ठा बदलने का नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए।
इस पूरे विवाद में भाजपा का नाम भी बार-बार सामने आ रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा देशभर में विपक्षी पार्टियों को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रही है। हालांकि भाजपा इन आरोपों को खारिज करती रही है और कहती है कि नेता अपनी राजनीतिक इच्छा से फैसले लेते हैं। फिर भी विपक्ष का दावा है कि विभिन्न राज्यों में जिस तरह विपक्षी दलों के नेता लगातार सत्ता पक्ष के करीब जाते दिखे हैं, उससे लोकतंत्र और जनादेश की भावना पर सवाल खड़े होते हैं।
शिवसेना(यूबीटी) के दो सांसदों ने बुधवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलकात की। स्पीकर के साथ हुई बैठक में तर्क दिया कि केवल दो-तिहाई सांसदों के समर्थन से किसी पार्टी या गुट का दूसरी पार्टी में विलय नहीं हो सकता, जब तक कि मूल पार्टी का ही विलय न हो जाए।
उन्होंने दलबदल विरोधी कानून संविधान की 10वीं अनुसूची के प्रावधानों का सख्ती से पालन करने की अपील की। बिरला संसद को मॉनसून सत्र से पहले कोई फैसला लेंगे। यह सत्र आमतौर पर जुलाई के दूसरे भाग में शुरू होता है। वे कानूनी विशेषज्ञों और दोनों पक्षों से सलाह-मशविरा कर रहे हैं। पार्टी के बचे हुए 3 लोकसभा सांसदों में से दो अरविंद सावंत और अनिल देसाई ने बिरला से मुलाकात की। बिरला ने उन्हें तब बुलाया था जब उन्होंने मांग की थी कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने वाले उनके 6 सहयोगियों के मामले पर फैसला लेने से पहले उनकी बात सुनी जाए।
बैठक के बाद देसाई ने पत्रकारों से कहा कि हमें भरोसा है कि संसद के संरक्षक के तौर पर स्पीकर न्याय सुनिश्चित करेंगे। उन्होंने कहा कि केवल पार्टी ही किसी दूसरी पार्टी के साथ विलय का फैसला कर सकती है और ऐसे फैसले को मंज़ूरी देने के लिए पार्टी के दो-तिहाई सांसदों की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि सांसद अपनी मर्जी से किसी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो सकते या उसका विलय नहीं कर सकते।
अध्यक्ष पहले ही मूल पार्टियों और अलग हुए गुटों, दोनों का पक्ष सुन चुके हैं। TMC के मामले में, बिरला ने पार्टी के लोकसभा नेता अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल और बागी गुट के सदस्यों से मुलाकात की। शिवसेना (UBT) में विभाजन के मामले में भी ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई गई थी। सूत्रों के अनुसार, संसद से जुड़े कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञ अभी इस मामले की जांच कर रहे हैं और अंतिम फैसला लेने से पहले अपनी सिफारिशें देने की उम्मीद है।
इसी तरह की स्थितियों में पीठासीन अधिकारियों के पिछले फैसलों का भी अध्ययन किया जा रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी फैसला कानूनी और संवैधानिक रूप से सही हो। इस बीच, लोकसभा सचिवालय मॉनसून सत्र से पहले बैठने की संभावित व्यवस्था पर काम कर रहा है;
यह सत्र आमतौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में बुलाया जाता है। TMC और शिवसेना (UBT) के बागी गुटों के अलावा, DMK ने भी कांग्रेस के साथ अपना लंबे समय से चला आ रहा गठबंधन टूटने के बाद बैठने की अलग व्यवस्था की मांग की है। कांग्रेस ने हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी TVK के साथ हाथ मिलाया है।
अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती तृणमूल कांग्रेस से जुड़ी है। 2024 के लोकसभा चुनावों में TMC के टिकट पर चुने गए 29 सांसदों में से 20 अलग हो गए हैं और उन्होंने खुद को नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जोड़ लिया है। यह हावड़ा स्थित एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है।
इस समूह ने लोकसभा में बैठने की अलग व्यवस्था की मांग की है और नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति समर्थन और NDA में शामिल होने की इच्छा भी जताई है। तब से एक TMC सांसद का निधन हो गया है, जिससे सदन में पार्टी के सदस्यों की संख्या 28 रह गई है। महाराष्ट्र में, शिवसेना (UBT) के टिकट पर चुने गए नौ सांसदों में से छह ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है।
दोनों पार्टियों ने ओम बिरला से दलबदल विरोधी कानून लागू करने और बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने का आग्रह किया है। उन्होंने तर्क दिया है कि दसवीं अनुसूची के तहत सुरक्षा तभी मिलती है जब पूरी पार्टी का दो-तिहाई हिस्सा किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय हो जाता है, न कि तब जब विधायक व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से पाला बदलते हैं।
अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर के सामने व्यक्तिगत रूप से TMC का पक्ष रखा और बागी सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग वाली 20 अलग-अलग याचिकाएं सौंपीं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बागियों का NCPI में विलय का दावा कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं है, क्योंकि किसी भी वैध विलय में केवल चुने हुए प्रतिनिधियों के बजाय पूरी राजनीतिक पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों का शामिल होना जरूरी है।
शिवसेना (UBT) के नेताओं अनिल देसाई और अरविंद सावंत ने भी ओम बिड़ला से मुलाकात की और बागी सांसदों द्वारा दी गई किसी भी जानकारी या आवेदन का विवरण मांगा। सावंत ने कहा कि हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें बागियों की ओर से कोई अपील मिली है।
उन्होंने आगे बताया कि स्पीकर ने उन्हें सूचित किया कि लिखित रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है। देसाई ने कहा कि उन्होंने बिड़ला के सामने इस बात पर जोर दिया कि दसवीं अनुसूची में अस्पष्टता की बहुत कम गुंजाइश है। विधायिक दल का कोई भी समूह अपनी मर्ज़ी से किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकता, भले ही उनके पास दो-तिहाई बहुमत हो।
वहीं इसी बीच महाराष्ट्र की सियासत में ‘महा विकास अघाड़ी’ (MVA) गठबंधन एक बार फिर पटरी से उतरती नजर आ रही है। मानसून सत्र की रणनीनि तय करने से पहले बुलाई गई बैठक में विपक्षी गठबंधन के 60 में से 23 विधायक अनुपस्थित रहें। शरद पवार, जयंत पाटिल और नाना पटोले जैसे बड़े नेता भी इस बैठक में शामिल नहीं हुए।
हालांकि, इस बैठक में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल और ठाकरे सेना के संकटमोचक संजय राउत बैठक में उपस्थित थे। लेकिन बड़ी संख्या में विधायकों के गैरमौजूदगी की को लेकर अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए सहयोगियों से पूछा कि क्या हम सचमुच साथ हैं? बैठक के दौरान ठाकरे ने पूछा, “हम कहते हैं कि हम साथ हैं… लेकिन क्या हम सचमुच साथ हैं? क्या हम सदन में महा विकास अघाड़ी के रूप में एकजुट हैं? क्या हम मुद्दों को एक साथ उठाते हैं?”
पिछले चार सालों में दूसरी बार जब उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (UBT) के छह सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी शिवसेना गुट में शामिल हो गए, तो उन्होंने अपने नेताओं और गठबंधन से उन लोगों पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह करते हुए कहा, “जो लोग चले गए हैं… उन्हें जाने दो।” उन्होंने कहा कि महा विकास अघाड़ी के रूप में हम एक बड़ी ताकत हैं।
ठाकरे ने पार्टी के सदस्यों से एकजुट होकर काम करने, संयुक्त बैठकें करने और हार के बावजूद एकता दिखाने के लिए रैलियां आयोजित करने का आह्वान किया। गौरतलब है कि शिवसेना यूबीटी के छह सांसदों द्वारा ठाकरे की पार्टी छोड़कर शिंदे का साथ देने के बाद फिलहाल किसी अन्य विद्रोह की कोई खबर नहीं है। लेकिन जून 2022 में मूल शिवसेना में विद्रोह हुआ था, ठीक वैसी ही वैचारिक और व्यावहारिक रूपरेखा जून 2023 में एनसीपी (NCP) के भीतर भी दोहराई गई।
कुल मिलकर उद्धव ठाकरे गुट का मुख्य तर्क यह है कि “दो-तिहाई सांसद” होने भर से कोई समूह अपनी मर्जी से दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकता। उनका कहना है कि पार्टी की सामूहिक स्वीकृति और संवैधानिक प्रक्रिया जरूरी है। अब सबकी नजर लोकसभा अध्यक्ष और संभावित कानूनी प्रक्रियाओं पर है, जो तय करेंगी कि बागी सांसदों की स्थिति क्या होगी और महाराष्ट्र की राजनीति किस दिशा में जाएगी।



