गाजियाबाद में वकीलों से मारपीट का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, यूपी सरकार की बढ़ी मुश्किलें

याचिका में आरोप लगाया गया है कि वकीलों पर हमला होने के बावजूद गाजियाबाद पुलिस ने अब तक उचित कार्रवाई नहीं की और हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर भी दर्ज नहीं की।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: गाजियाबाद में वकीलों के साथ मारपीट और हमले का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। चार वकीलों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है।

CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने राज्य सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि वकीलों पर हमला होने के बावजूद गाजियाबाद पुलिस ने अब तक उचित कार्रवाई नहीं की और हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर भी दर्ज नहीं की।

क्या है पूरा मामला?

मिली जानकारी के अनुसार, यह मामला गाजियाबाद में हुए एक अवैध निर्माण से जुड़े विवाद का है। आरोप है कि इस विवाद के दौरान कुछ अज्ञात लोगों ने वकीलों के एक समूह पर हमला कर दिया था। इस घटना में वकीलों के साथ मारपीट किए जाने का आरोप लगाया गया है।

घटना के बाद पीड़ित पक्ष की ओर से पुलिस से शिकायत की गई, लेकिन याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। वकीलों का कहना है कि उन पर हुए हमले के बावजूद पुलिस ने हत्या के प्रयास के मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की।

याचिका के मुताबिक याचिकाकर्ता 1 (ए दीपा), उनके पति और याचिकाकर्ता 2 (ए देब कुमार), याचिकाकर्ता 3 (विपिन शर्मा) और याचिकाकर्ता 4 (अनूप गोयल) ने आरोप लगाया है कि 22 अक्टूबर को उन पर बेरहमी से हमला किया गया. याचिका में बताया गया है कि रात करीब 9 बजे, अमित वर्मा और उनके बेटे राहुल वर्मा कुछ अज्ञात लोगों को आवासीय परिसर में ले आए, फिर इन लोगों ने चारों वकीलों और उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे अन्य निवासियों के साथ मारपीट की.

इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई FIR

इसके बाद पिटीशनर 1 ने इस घटना की रिपोर्ट इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में की और मेडिकल जांच के बाद CCTV फुटेज के वैरिफिकेशन पर FIR दर्ज की गई. पिटीशनर्स की शिकायत है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2) (जानबूझकर चोट पहुंचाने की सजा), 131 (गंभीर उकसावे के अलावा हमला या क्रिमिनल फोर्स), 191(2) (दंगा), 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर बेइज्जती) और 352(2) के तहत सिर्फ छोटे-मोटे अपराध ही लगाए गए.

SCBA ने DGP को लिखा लेटर

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की तरफ से डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस और कमिश्नर ऑफ पुलिस को एक लेटर भी भेजा गया था, जिसमें बताया गया था कि पिटीशनर 1 के डिटेल्ड बयान में हमले की क्रूरता दिखाने के बावजूद लगी चोटों के लिए कोई सख्त BNS सेक्शन नहीं लगाया गया है.

याचिकाकर्ताओं की क्या है मांग?

याचिकाकर्ताओं ने इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन के खिलाफ एफआईआर में बीएनएस की धारा 74 (महिला की शील भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), 109 (हत्या का प्रयास), 117 (3) (स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना, जिसके परिणामस्वरूप स्थायी विकलांगता या कोमा हो जाना) को जोड़ने के लिए निर्देश देने की मांग की है.

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