जनआक्रोश में बदलती 4PM पर लगी पाबंदी

- सदन में संजय सिंह ने सरकार को ललकारा, प्रेस क्लब आफ इंडिया ने जाहिर कि चिंता बताया इसे खतरनाक ट्रेंड
- मुकेश मोहन पर मुकदमा राजीव निगम के फेसबुक पेज पर पाबंदी, जुबैर के एक्स पोस्ट डिलीट
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। डिजिटल भारत के इस दौर में जहां एक क्लिक से सच लाखों तक पहुंचता है अब उसी क्लिक की जान खतरे में हैं। क्योंकि सरकार ने सोशल मीडिया को पूरी तरह से कंट्रोल करने के लिए मन बना लिया है और उसकी ताबड़तोड कार्रवाई यह बताने के लिए काफी है। 4पीएम पर लंबे समय से सरकार शिंकजा कसने की कोशिश कर रही है। उसने ऐसा किया भी और कई बार उसके नेशनल चैनल समेत सोशल मीडिया एकाउंट पर पाबंदी लगायी। हाल में एक बार फिर 4पीएम के नेशनल चैनल पर लगी पाबंदी अब जनआक्रोश में बदलने लगी है। प्रेस क्लब आफ इंडिया ने सरकार की इन कोशिश का विरोध खुले मंच से किया है और चिटठी भी जारी कि हैं। वही सदन के भीतर आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने सदन में सरकार की इस मुद्दे पर बखिया उधेड़ दी। उन्होंने सदन में बोलते हुए कहा कि सरकार अपराधियों को पकडऩे में नाकाम है क्योंकि वह यूटयूब पर निगरानी रखने में व्यस्त हैं। उनहोंने कहा कि सरकार ने संजय शर्मा के 4पीएम को बंद करवा दिया है। राजीव निगम के फेसबुक पेज पर भी पाबंदी है। मुकेश मोहन पर भी मुकदमा लिखवा दिया है। प्रेस क्लब का आरोप है कि हाल के दिनों में जिस तरह से सरकार आलोचनात्मक कंटेंट को निशाना बना रही है वह एक खतरनाक ट्रेंड की ओर इशारा करता है। कंटेंट क्रिएटर्स के अकाउंट ब्लॉक किए जा रहे हैं पोस्ट हटाए जा रहे हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल क्यों? किस आधार पर इसका जवाब किसी के पास नहीं।
संविधान बनाम सेंसरशिप
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन क्या यह अधिकार अब शर्तों के साथ दिया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले में साफ कहा था कि अस्पष्ट और मनमाने प्रावधानों के आधार पर आनलाइन कंटेंट हटाना असंवैधानिक है। कोर्ट ने चेताया था कि ऐसी कार्रवाइयां भय का माहौल पैदा करती हैं जहां लोग खुद ही अपनी आवाज दबाने लगते हैं। लेकिन आज हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट की उस चेतावनी को नजरअंदाज किया जा रहा है?
प्रेस क्लब की मांग आवाज को मत कुचलो
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने साफ कहा है कि सरकार को इन अतिरेकपूर्ण और मनमानी कार्रवाइयों को रोकना चाहिए और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की है कि कंटेंट हटाने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए ताकि किसी को भी बिना कारण चुप न कराया जा सके। यह मुद्दा सिर्फ कुछ अकाउंट्स या पोस्ट्स का नहीं है। यह भारत के लोकतांत्रिक चरित्र का सवाल है। अगर आज सोशल मीडिया पर आवाज दबाई जा रही है तो कल यह दायरा और बढ़ सकता है। सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहां सच बोलने से पहले अनुमति लेनी पड़ेगी? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है लेकिन लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं चलता वह विचारों की आज़ादी से चलता है। अगर वही आजादी खतरे में है तो यह सिर्फ पत्रकारों या एक्टिविस्ट्स की लड़ाई नहीं बल्कि हर उस नागरिक की लड़ाई है जो अपनी बात कहने का हक रखता है। सरकार को यह समझना होगा कि आवाज दबाने से सवाल खत्म नहीं होते बल्कि और तेज हो जाते हैं। और शायद यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सच है।
डर का माहौल या लोकतंत्र का दम घुटना?
जब किसी कंटेंट को बिना स्पष्ट कारण के हटा दिया जाता है तो सिर्फ एक पोस्ट नहीं मिटती उसके साथ भरोसा भी मिटता है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने अपने बयान में इसी खतरे की ओर इशारा किया है। उनका कहना है कि ऐसी कार्रवाइयां न सिर्फ पत्रकारों बल्कि आम नागरिकों में भी भय का माहौल पैदा करती हैं। लोग अब लिखने से पहले सोचते नहीं डरते हैं। यह वही चिलिंग इफेक्ट है जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि जहां कानून का डर लोगों को चुप करा देता है भले ही उन्होंने कुछ गलत न किया हो।
एक के बाद एक कार्रवाई सिर्फ इत्तेफाक?
पिछले कुछ हफ्तों में जो घटनाएं सामने आयी हैं वह किसी संयोग से ज्यादा एक सिस्टमेटिक पैटर्न की ओर इशारा करती हैं। फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर के कई पोस्ट एक्स पर ब्लाक कर दिए गए। मोलिटक्स और नेशनल दस्तक जैसे मीडिया प्लेटफॉर्म्स के फेसबुक पेज भारत में बंद कर दिए गए। राजीव निगम जैसे व्यंग्यकार भी इस कार्रवाई की चपेट में आ गए। 4पीएम न्यूज का यूट्यूब चैनल भी ब्लाक हो चुका है। हद तो तब हो गयी जब 4पीएम की न्यूज एंकर की रील तक को सरकार ने भारत में बैनकरवा दिया। इन सभी मामलों में एक समानता है यह सभी प्लेटफार्म या व्यक्ति सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट के लिए जाने जाते हैं। सरकार का पक्ष यह है कि यह कार्रवाई आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत की जा रही है लेकिन यहां भी पारदर्शिता का अभाव साफ दिखता है। कई मामलों में यह तक नहीं बताया गया कि कौन सा कंटेंट हटाया गया और क्यों।
पारदर्शिता का अभाव सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहल है पारदर्शिता की कमी। कंटेंट क्यों हटाया गया? किस आधार पर अकाउंट ब्लॉक हुआ? क्या क्रिएटर को सफाई देने का मौका मिला? इन सवालों के जवाब अक्सर गायब रहते हैं। और यही इस पूरी प्रक्रिया को मनमाना और असंवैधानिक बनाता है। यह भी सच है कि सरकार के पास कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। फेक न्यूज हिंसा भड़काने वाले कंटेंट या राष्ट-विरोधी गतिविधियों पर रोक जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर आलोचना को खतरा मान लिया जाएगा? लोकतंत्र में सरकार की आलोचना कोई अपराध नहीं बल्कि एक जरूरी प्रक्रिया है। अगर आलोचना ही गायब हो जाए तो लोकतंत्र सिर्फ एकतरफा संवाद बनकर रह जाएगा।




