नाटो से अलग होगा अमेरिका? ट्रंप और कीर स्टार्मर में तीखी भिड़ंत

अमेरिका कल तक पूरी दुनिया का 'थानेदार' बना फिरता था, जहाँ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हर समय लालफीताशाही वाला शाही फरमान सुनाया करते थे, आज वही अमेरिका अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद साथी ब्रिटेन से भिड़ गया है।

4pm न्यूज नेटवर्क: अमेरिका कल तक पूरी दुनिया का ‘थानेदार’ बना फिरता था, जहाँ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हर समय लालफीताशाही वाला शाही फरमान सुनाया करते थे, आज वही अमेरिका अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद साथी ब्रिटेन से भिड़ गया है।

खबर इतनी बड़ी है कि पूरी दुनिया के डिफेंस एक्सपर्ट्स के पसीने छूट रहे हैं कि— क्या अमेरिका नाटो (NATO) से अलग होने जा रहा है? डोनाल्ड ट्रंप और ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर के बीच ऐसी जुबानी जंग छिड़ी है कि ‘स्पेशल रिलेशनशिप’ के परखच्चे उड़ गए हैं। स्टार्मर ने दो-टूक कह दिया है कि ट्रंप का दबाव चाहे कितना भी हो, उनके लिए ‘देशहित’ सबसे पहले है।  सवाल ये है कि क्या ट्रंप सिर्फ ‘पोज़’ देने वाले और सोशल मीडिया पर दहाड़ने वाले राष्ट्रपति बनकर रह गए हैं? और होर्मुज के मोर्चे पर जैसे ही बहरीन ने सिर उठाया, रूस और चीन ने कैसे उसकी आवाज़ बंद करा दी?

ट्रंप की ज़िद ने आज अमेरिका को दुनिया में अकेला कर दिया है। ट्रंप प्रशासन का दबाव था कि ब्रिटेन भी ईरान जंग में अपनी पूरी ताकत झोंक दे, लेकिन कीर स्टार्मर ने साफ़ तौर पर ‘ना’ कह दिया है। स्टार्मर का कहना है कि वे अपने सैनिकों को ट्रंप की ‘निजी खुन्नस’ की आग में नहीं झोंकेंगे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने बुधवार को देश को संबोधित करते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ चल रही जंग उनकी नहीं है और ब्रिटेन इसका हिस्सा नहीं बनेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटेन एक ‘ग्लोबल समिट’ आयोजित करेगा, जिसमें होर्मुज को दोबारा खोलने के तरीकों पर चर्चा होगी।

स्टार्मर ने कहा— “चाहे मुझ पर कितना भी दबाव हो, मैं हर फैसला ब्रिटेन के राष्ट्रीय हित में ही लूंगा। यह हमारी लड़ाई नहीं है और हम इसमें शामिल नहीं होंगे।” उन्होंने चेतावनी दी कि यह युद्ध अब दूसरे महीने में पहुँच चुका है और इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। हालांकि, स्टार्मर ने भरोसा दिलाया कि ब्रिटेन इस स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। जैसे ही इस बात की खबर ट्रंप को हुई, वे बुरी तरह तिलमिला उठे और उन्होंने नाटो से हटने तक की धमकी दे डाली।

एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि वे पहले से ही नाटो से ज़्यादा मुतास्सिर (प्रभावित) नहीं थे और उन्हें लगता है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी यही मानते हैं। यह बयान तब आया है जब नाटो देशों ने ईरान जंग में अमेरिका का साथ देने से साफ़ इनकार कर दिया। अमेरिका चाहता था कि नाटो देश होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने के लिए अपने वॉरशिप भेजें, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

ट्रंप ने रोना रोते हुए कहा कि अमेरिका हमेशा अपने साथियों के लिए खड़ा रहा है, लेकिन इस बार कोई भी अमेरिका के साथ नहीं आया। उन्होंने यूक्रेन का मिसाल देते हुए कहा कि वहां अमेरिका ने मदद की थी, लेकिन अब वही समर्थन अमेरिका को नहीं मिल रहा। उन्होंने ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर की भी कड़ी आलोचना की।

हालांकि ट्रंप भले ही अपनी नाकामी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ रहे हों, लेकिन सच तो ये है कि इस पूरे फसाद के ज़िम्मेदार अकेले ट्रंप हैं। ट्रंप ने जब से दूसरी बार अमेरिका की कमान संभाली है, उनका किरदार अजब-ग़ज़ब रहा है। कभी वे दुनिया के तमाम देशों पर टैरिफ लगाने लगते हैं, तो कभी इंटरनेशनल लॉ तोड़कर ईरान और वेनेजुएला पर कब्ज़ा करने की सोचने लगते हैं। ईरान पर हमला करने से पहले ट्रंप ने नेतन्याहू के अलावा किसी से मशविरा नहीं किया—न ही अपनी ‘कांग्रेस’ से अनुमति ली, न ही मित्र देश ‘नाटो’ से कोई बात की।

सीधा अटैक कर दिया! और अब जब ईरान ने अमेरिका को बुरी तरह फंसा दिया है, तो ट्रंप मदद की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन जब ट्रंप हर देश पर टैरिफ लगा रहे थे और नाटो को किनारे कर रखा था, तो जंग के वक्त कोई उनके साथ कैसे खड़ा हो जाता? असल में यह ट्रंप की विदेश नीति और रक्षा नीति का ‘टोटल फेलियर’ है। ट्रंप को लगता था कि वे धौंस दिखाकर दुनिया को चला लेंगे, लेकिन कीर स्टार्मर ने उन्हें आईना दिखा दिया। ट्रंप साहब, पोज़ देना और फोटो खिंचवाना आसान है, लेकिन एक गठबंधन को साथ लेकर चलना आपके बस की बात नहीं। ऐसे में दिख रहा है कि ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति असल में ‘अमेरिका अलोन’ (America Alone) बनने जा रही है।

डिफेंस एक्सपर्ट्स अब खुलेआम पूछ रहे हैं कि क्या ट्रंप सिर्फ एक ‘सोशल मीडिया’ के राष्ट्रपति रह गए हैं? 33 दिन बीत गए, अरबों डॉलर पानी की तरह बह गए, लेकिन नतीजा सिफर (Zero) है। ईरान झुकने के बजाय और आक्रामक हो गया है। ट्रंप की विदेश नीति का हाल ये है कि नाटो बिखर रहा है, यूरोप साथ छोड़ रहा है और एशिया में उनकी साख मिट्टी में मिल गई है। उधर, नेतन्याहू साहब अपनी सत्ता बचाने के लिए ट्रंप के कंधे का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन दोनों की जोड़ी ने गाज़ा को तो श्मशान बना ही दिया, अब ये पूरी दुनिया की इकोनॉमी को दफन करने पर तुले हैं। ट्रंप की नीतियां कागज़ों पर शेर हैं, लेकिन हकीकत में सिर्फ ‘गीदड़भभकी’ साबित हो रही हैं।

एक ओर जहाँ अमेरिका और ब्रिटेन आपस में भिड़े हैं, वहीं दूसरी ओर रूस और चीन मजबूती से ईरान के पक्ष में लामबंद होते दिख रहे हैं। ट्रंप के इशारे पर पिछले दो दिनों से यूएई और बहरीन होर्मुज के ‘सरपंच’ बनने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों देश न सिर्फ बयानबाज़ी कर रहे हैं, बल्कि अपनी सैन्य शक्ति झोंकने का वादा भी कर रहे हैं। लेकिन जैसे ही इन दोनों ने ट्रंप के इशारे पर होर्मुज में दखल देने की हिमाकत की, रूस और चीन ने वो तेवर दिखाए कि बहरीन के पसीने छूट गए।

रूस और चीन ने साफ़ कर दिया कि अगर किसी भी ‘तीसरे मुल्क’ ने होर्मुज के बहाने ईरान पर हमला करने की कोशिश की, तो अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे। चीन ने अपनी सप्लाई लाइन और रूस ने अपनी मिसाइलों का डर ऐसा दिखाया कि बहरीन की आवाज़ रातों-रात बंद हो गई। बहरीन, जो इस समुद्री रास्ते पर सबसे अधिक निर्भर है, अब अपनी सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) के मैदान में उतरा है। लेकिन चीन के घुसते ही एक नया ‘ट्विस्ट’ आ गया। बहरीन ने पहले तो ईरान के खिलाफ सीधे एक्शन की तैयारी की थी, पर रूस और चीन के ‘वीटो’ वाले डर ने उसे अपना प्लान बदलने पर मजबूर कर दिया।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, बहरीन का शुरुआती प्रस्ताव बेहद सख्त था, जिसमें यूएन चार्टर के ‘चैप्टर 7’ का हवाला दिया गया था। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ‘चैप्टर 7’ का मतलब होता है—आर-पार की लड़ाई! अगर कोई प्रस्ताव इसके तहत पास हो जाता है, तो सदस्य देशों को उस इलाके में प्रतिबंध लगाने या सीधे सैन्य कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार मिल जाता है।

बहरीन का इरादा साफ़ था—ईरान द्वारा अमेरिका और इज़रायल के साथ जारी संघर्ष के बीच व्यापारिक जहाजों पर हो रहे हमलों को रोकना। इस ड्राफ्ट को अमेरिका का पूरा समर्थन था। लेकिन चर्चा तेज़ थी कि चीन और रूस इसे तुरंत ‘वीटो’ कर देते, जिससे प्रस्ताव कूड़ेदान में चला जाता। इसी वीटो पावर के डर से बहरीन को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। संशोधित ड्राफ्ट में अब ‘चैप्टर 7’ का ज़िक्र हटा दिया गया है ताकि चीन और रूस को मेज़ पर लाया जा सके। चीन ने पश्चिम एशिया की इस जंग को एक ‘लैब’ बना लिया है, जहाँ सुपरपावर अमेरिका की साख राख हो गई है।

भले ही बहरीन ने ‘चैप्टर 7’ हटा दिया हो, लेकिन उसने चतुराई से ‘एक्शन’ वाली भाषा बरकरार रखी है। नए ड्राफ्ट में कहा गया है कि देश अकेले या मिलकर परिस्थितियों के अनुसार सभी ज़रूरी उपाय कर सकते हैं और एक समुद्री गठबंधन बना सकते हैं। अगर कोई अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन में बाधा डालता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी। यह नियम केवल होर्मुज ही नहीं, बल्कि ओमान की खाड़ी और पूरे क्षेत्र पर लागू होगा। वैसे भी ईरान ने अमेरिका को छोड़कर बाकी देशों के लिए होर्मुज के रास्ते को ‘टोल’ के साथ खोल दिया है।

ऐसे में साफ़ है कि अमेरिका अभी तक जो अपने सुपरपावर वाला ढोल पीट रहा था, अब वह कहीं न कहीं फटता दिख रहा है। ट्रंप जो सबको धौंस सुनाते थे, उनके वो दिन अब लदने वाले हैं। ब्रिटेन जैसा साथी हाथ छुड़ा रहा है, नाटो टूट रहा है, और रूस-चीन की जुगलबंदी ने अमेरिका को कोने में धकेल दिया है। ट्रंप का ‘ग्रेट अमेरिका’ का गुब्बारा अब फट चुका है।

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