जब तक सत्ता, तब तक यारी! ममता बनर्जी से दूर हुए ये चर्चित चेहरे

पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी के चहेते चेहरे एक-एक करके उनका साथ छोड़ते जा रहे हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी के चहेते चेहरे एक-एक करके उनका साथ छोड़ते जा रहे हैं.

इनमें वे फिल्मी सितारे भी हैं जो कभी टीएमसी के टिकट पर जीतकर संसद पहुंचे. पार्टी के लिए ग्लैमर और गर्व कहलाए. इनमें सयानी घोष, जून मलिया जैसी ग्लैमरस अभिनेत्रियां हैं तो शत्रुघ्न सिन्हा और देव जैसे दिग्गज कलाकार भी. लेकिन ममता के हाथ से सत्ता क्या गई- इन सितारों ने भी किनारा कर लिया.

गुरुदत्त की क्लासिक फिल्म कागज के फूल का एक गाना है- देखी जमाने की यारी, बिछड़े सभी बारी-बारी… मतलब की दुनिया है सारी, बिछड़े सभी बारी-बारी … पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का अभी यही हाल नजर आता है. टीएमसी में फिलहाल ‘दीदी’ एकला चलने को मजबूर हो चली हैं.

पश्चिम बंगाल की चुनावी रैलियों में ‘हृदये आछे काबा, नयने मदीना…’ गाकर सुर्खियां बटोरे वाली सुरीली सयानी घोष हों या बंगाली सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री और लोकसभा में पार्टी की उप-नेता शताब्दी रॉय भी बागी हो जाएंगी- इसका अंदाजा ममता बनर्जी को कभी नहीं रहा होगा.

इसी तरह कभी बीजेपी से नाराज जिस बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा को टीएमसी ने दोबारा संसद पहुंचाया और राजनीतिक प्रतिष्ठा दिलाई- उनका नाम भी बागियों की सूची में हों तो ममता की पार्टी का हाल समझा जा सकता है.

सियासत में कौन कब किसका शत्रु और मित्र बन जाए-कहा नहीं जा सकता. राजनीति में मित्र कठिन है…यूं ही नहीं कहा गया है. पश्चिम बंगाल का मौजूदा हाल इसका सबसे ताजा नजीर हैं. मौजूदा हालात पर शत्रुघ्न सिन्हा का खामोश रहना और टीएमसी से किनारा कर लेना ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा झटका है.

ममता बनर्जी के लिए अपनी पार्टी संभालना मुश्किल होता जा रहा है. पार्टी में भागमभाग मची है. बुधवार को खबर आई कि टीएमसी के 19 बागी सांसदों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. इस सूची में ऐसे नाम हैं- जिन पर ममता बनर्जी कभी भरोसा करती थीं.

ममता से पुराना नाता रहा शत्रुघ्न सिन्हा का

शत्रुघ्न सिन्हा हिंदी फिल्मों के अलावा राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं. संसद के दोनों सदनों में रह चुके हैं. 1996 से 2008 तक दो बार बीजेपी के राज्यसभा सांसद रहे. 2009 और 2014 में पटना साहिब से लोकसभा चुनाव जीते. जब अटल बिहारी बाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री थे, तब अटल सरकार में टीएमसी भी एक घटक दल थी.

अटल सरकार में ममता बनर्जी भी केंद्रीय मंत्री रह चुकी हैं. लेकिन बाद के सालों में बीजेपी में घटते कद से खफा होकर उन्होंने 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले बीजेपी छोड़ दी.

कांग्रेस के टिकट पर हारे तो 2022 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. ममता बनर्जी से उनकी घनिष्ठता पहले से थी लिहाजा टीएमसी के प्रमुख चेहरा बने. साल 2022 का आसनसोल लोकसभा सीट का उपचुनाव हो या 2024 का आम चुनाव- दोनों ही चुनाव में उन्हें बंपर जीत हासिल हुई.

टीएमसी तिनका-तिनका बिखर रही

शत्रुघ्न सिन्हा के अलावा बंगाली सिनेमा से ताल्लुक रखने वाले जिन सांसदों में बगावत का झंडा बुलंद किया है, वे नाम हैं- सयानी घोष, दीपक अधिकारी जो कि ‘देव’ नाम से विख्यात हैं, शताब्दी रॉय, रचना बनर्जी और जून मलिया. ये सभी नाम संसद में टीएमसी के स्टार फेस कहलाते थे.

किसी भी मुद्दे पर अपनी एकजुटता के लिए जाने गए हैं. पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हरेक फैसले में अपनी सहमति जताते थे और संसद में सत्ता विरोध की बुलंद आवाज थे. लेकिन पश्चिम बंगाल में बीजेपी इतने आक्रामक तरीके से सत्ता में आई और सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने कि टीएमसी तिनका-तिनका बिखर गई.

मौजूदा हालात के आगे टीएमसी का भविष्य अधर में है तो ममता बनर्जी और उनके अभिषेक बनर्जी दो-राहे पर. सयानी घोष टीएमसी का ऐसा नाम रहा है, जिन्हें ममता बनर्जी के बाद पार्टी की दूसरी प्रमुख महिला चेहरा बताया जा रहा था.

सयानी को ममता की शिष्या कहा जाता रहा है. चुनाव प्रचार के दौरान सयानी घोष के आक्रामक अंदाज और सामाजिक एकता के गायन-वादन की खूब चर्चा रही. सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरीं. टीएमसी के मेनिफेस्टो को आगे बढ़ाती रही. लेकिन चुनावी नतीजे में जादू नहीं जगा सकीं. अब सत्ता से दूर होने के बाद बिखराव शुरू हो गया. यानी जब तक सत्ता तब तक एकजुटता और रिश्ता भी.

बंगाली सिनेमा के चर्चित चेहरे

महज तैंतीस साल की सयानी ने अपना फिल्मी करियर साल 2010 से शुरू किया था. बंगाली सिनेमा में अभिनय के अलावा गीत-संगीत में भी प्रशंसा और सम्मान बटोर चुकी हैं. सयानी का राजनीतिक करियर लंबा नहीं है. लेकिन कम समय में ही सयानी बंगाल की राजनीति में सनसनी बन कर उभरीं.

साल 2021 में टीएमसी में शामिल हुईं थीं. हालांकि उस साल के विधानसभा चुनाव में सयानी को सफलता नहीं मिली इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने उन्हें टिकट दिया. जिसके बाद वह जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से जीतकर संसद पहुंचीं. इसके बाद सयानी को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली.

सयानी घोष के मुकाबले देव यानी दीपक अधिकारी का राजनीतिक करियर ज्यादा लंबा रहा है. देव घाटाल से तीन बार से टीएमसी सांसद बनते आ रहे हैं. बंगाली सिनेमा में देव के कद को सयानी के मुकाबले ज्यादा प्रसिद्धि है.

बंगाली सिनेमा के लोकप्रिय कलाकार हैं. साल 2006 से फिल्मी करियर प्रारंभ करने वाले देव ने 2014, 2019 और 2024 में भी घाटाल से लगातार जीत दर्ज की थी. देव के बागी होने से भी ममता को बड़ा झटका लगा है. पार्टी टूट की कगार पर पहुंच चुकी है.

शताब्दी रॉय बंगाली सिनेमा की बहुत ही प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं. ममता से उनका रिश्ता भी काफी पुराना है. टीएमसी की पुरानी नेता रही हैं. शताब्दी रॉय ने तपन सिन्हा और प्रसेनजित चटर्जी जैसे दिग्गजों के साथ काम किया है.

राजनीति के मैदान में साल 2009 में ही आ गई थीं. बीरभूम निर्वाचन क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीता. इसके बाद 2014, 2019 और 2024 में भी शताब्दी रॉय ने टीएमसी के टिकट पर जीत हासिल की. शताब्दी रॉय का ममता का साथ छोड़ना भी पार्टी के लिए बड़ा झटका है.

टीएमसी का ग्लैमर गायब

ममता बनर्जी पर आरोप लगता रहा है कि उन्होंने चुनाव जीतने और आम जनता को रिझाने के लिए ग्लैमर का भरपूर सहारा लिया है. इन्हीं में सांसद बनने वाली जून मलिया और रचना बनर्जी का नाम लिया जाता है. दोनों बंगाली सिनेमा की ग्लैमरस अभिनेत्री रही हैं.

सयानी की तरह ममता बनर्जी ने जून मलिया को भी सबसे पहले 2021 में मेदिनीपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ने का मौका दिया था. एक बार की विधायकी के दौरान ही जून मलिया को साल 2024 में मेदिनीपुर लोकसभा से लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका मिला. जून मलिया जीत दर्ज कर संसद पहुंचीं.

लेकिन जून मलिया के अलावा अभिनेत्री से सांसद बनीं रचना बनर्जी ने भी संकट की घड़ी में ममता का साथ छोड़ दिया है. रचना बनर्जी हुगली से टीएमसी सांसद हैं. अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर हैं. रचना बनर्जी मिस कोलकाता और मिस स्माइल का खिताब भी जीत चुकी हैं. बेशक उनकी लोकप्रियता से भी टीएमसी को भी फायदा हुआ था. लेकिन साल 2024 में हुगली से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बनने का गौरव भी हासिल हुआ.

इन फिल्मी सितारों के अलावा जिन अन्य सांसदों के नाम सामने आ रहे हैं उनमें हैं- काकोली घोष, युसूफ पठान, जगदीश चंद्र बसुनिया, अबु ताहिर खान, पार्थ भौमिक, बापी हल्दर, माला रॉय, मिताली बाग, कालीपद सोरेन, अरुप चक्रवर्ती, डॉ, शर्मिला सरकार और असित कुमार मल. हालात बताते हैं टीएमसी से अलग होने वाले अन्य नेताओं की सूची लंबी भी हो सकती है. जाहिर है ऐसे में अंदाजा लगाना मुश्किल है कि टीएमसी में ममता के साथ कौन-कौन बचेगा!

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