बिहार मुखिया चुनाव में आरक्षण पर हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- चुनाव और नौकरी के नियम अलग
पटना हाई कोर्ट ने बिहार पंचायत चुनाव में आरक्षण पर फैसला सुनाते हुए ने स्पष्ट किया कि मुखिया चुनाव में बिहार पंचायत राज अधिनियम की धारा 15(5) लागू होगी, न कि सरकारी नौकरियों वाला आरक्षण कानून.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: पटना हाई कोर्ट ने बिहार पंचायत चुनाव में आरक्षण पर फैसला सुनाते हुए ने स्पष्ट किया कि मुखिया चुनाव में बिहार पंचायत राज अधिनियम की धारा 15(5) लागू होगी, न कि सरकारी नौकरियों वाला आरक्षण कानून.
पटना हाई कोर्ट ने बिहार में पंचायत चुनाव में आरक्षण को लेकर सोमवार (24 अगस्त) को एक अहम फैसला सुनाया. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुखिया के चुनाव में आरक्षण नियम बिहार पंचायत राज कानून की धारा 15(5) लागू होगी, न कि बिहार आरक्षण कानून. बिहार में इसी साल में पंचायत चुनाव होने थे, लेकिन परिसीमन की वजह से अब अगले साल ही चुनाव होंगे.अब राज्य में करीब आठ हजार जगह 13 हजार मुखिया के पद होंगे.
सोमवार को पटना हाई कोर्ट के जस्टिस पार्थ सारथी की सिंगल बेंच ने मो. ईसा की याचिका पर सुनवाई करते कहा कि मुखिया के चुनाव में आरक्षण का नियम बिहार पंचायत राज अधिनियम की धारा 15(5) के तहत तय होगा. सरकारी नौकरियों और सेवाओं में आरक्षण से जुड़े 1991 के बिहार आरक्षण कानून को सीधे पंचायत चुनाव में लागू नहीं किया जा सकता है.
जाति जांच समिति और SEC का आदेश रद्द
बेंच ने जाति जांच समिति के फैसले और राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत 2021 में निर्वाचित मुखिया को पद से हटा दिया गया था. हाई कोर्ट ने सहरसा जिले की ग्राम पंचायत राज सहुरिया के मुखिया मो. ईसा को पद से हटाने के मामले में यह फैसला दिया.
क्या है मामला
मामला ग्राम पंचायत राज सहुरिया से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता 2021 के पंचायत चुनाव में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए आरक्षित सीट से मुखिया निर्वाचित हुए थे. उनके खिलाफ शिकायत की गई कि वह शेख समुदाय से संबंधित हैं, लेकिन उन्होंने कथित तौर पर फर्जी तरीके से खुद को तेली (मुस्लिम) जाति का बताते हुए EBC प्रमाणपत्र प्राप्त किया.
जाति जांच समिति ने बिहार आरक्षण अधिनियम, 1991 में 2003 में किए गए संशोधन का हवाला देते हुए माना कि बिहार से बाहर रहने वाला व्यक्ति इस कानून के तहत आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता. इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने याचिकाकर्ता (मुखिया मो. ईसा) को बिहार का स्थायी निवासी न मानते हुए उसे मुखिया पद से हटा दिया.
हाई कोर्ट ने क्या कहा
हाई कोर्ट ने कहा कि मुखिया पद के चुनाव में आरक्षण का वैधानिक आधार पंचायत राज अधिनियम की धारा 15(5) है. 1991 का कानून सरकारी पदों और सेवाओं में SC, ST और OBC के आरक्षण से संबंधित है.
दोनों कानूनों का संबंध केवल पिछड़े वर्गों की जातियों की पहचान तक सीमित है.कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को बिहार से बाहर रहने वाला व्यक्ति नहीं माना जा सकता. रिकॉर्ड के अनुसार, उसके पूर्वज करीब 125 साल पहले उत्तर प्रदेश के जौनपुर से बिहार आए थे और उसकी तीन-चार पीढ़ियां बिहार में रह चुकी हैं.
हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि जाति जांच समिति ने याचिकाकर्ता का जाति प्रमाणपत्र रद्द नहीं किया था और न ही यह निष्कर्ष दिया था कि वह तेली (मुस्लिम) के अलावा किसी अन्य जाति से संबंधित है. इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि जाति जांच समिति और SEC ने 1991 के कानून और 2003 के संशोधन को मुखिया चुनाव में आरक्षण पर लागू करके गलती की. कोर्ट ने दोनों के आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की.
चुनावी आरक्षण और सेवा में आरक्षण अलग
निर्वाचित मुखिया को हटाए जाने के मामले में जाति छानबीन समिति ने 1991 के अधिनियम के प्रावधानों को लागू किया था, जिसे हाईकोर्ट ने गलत ठहराया. कोर्ट ने कहा कि चुनावी आरक्षण और सेवा में आरक्षण के लिए अलग-अलग कानून है.
पंचायत चुनावों में सेवा-आरक्षण के नियमों को लागू करना कानूनन गलत है. इस आदेश में कहा गया कि आरक्षण कानूनों की व्याख्या उनके विशेष विधायी उद्देश्य और योजना के अनुसार ही की जानी चाहिए. कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग और जाति छानबीन समिति की ओर से जारी आदेश को निरस्त कर दिया.
पंचायत चुनाव को लेकर अभी तक तिथि घोषित नहीं हुई है. माना जा रहा है कि चुनाव इस साल नहीं होगा. पंचायती राज विभाग के अनुसार पहले परिसीमन होगा, उसके बाद चुनाव होगा. ऐसे में माना जा रहा है कि अगले साल पंचायत चुनाव होंगे. पिछली बार 2021 में सितंबर से दिसंबर के बीच चुनाव हुए थे.



