सीएम हेमंत सोरेन को सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी राहत, निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक
ईडी के समन अवहेलना मामले में चल रही थी कार्रवाई

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
रांची। झारखंड की राजनीति में पिछले डेढ़ साल से जारी उथल-पुथल के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को आज बड़ी राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय के समन की अवहेलना मामले में निचली अदालत की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी। यह फैसला सिर्फ एक कानूनी राहत नहीं बल्कि उस पूरे नैरेटिव पर सवाल है जिसमें जांच एजेंसियों की कार्रवाई को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने न केवल इस मामले में नोटिस जारी किया बल्कि प्रवर्तन निदेशालय को एक महत्वपूर्ण और संकेतात्मक टिप्पणी भी दी। अदालत ने हल्के लेकिन गहरे अर्थ वाले अंदाज़ में कहा कि यह छोटा मामला है आपके पास कई बड़े मामले हैं उन पर ध्यान दीजिए। यह टिप्पणी उस संस्थागत संतुलन का संकेत है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय जांच एजेंसियों को उनकी प्राथमिकताओं की याद दिला रहा है।

अधिकारों का उपयोग संतुलित तरीके से करें जांच एजेंसियां
यह टिप्पणी महज एक औपचारिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें यह सवाल उठ रहा है कि क्या जांच एजेंसियां अपने अधिकारों का उपयोग संतुलित तरीके से कर रही हैं या राजनीतिक संदर्भों में उनका इस्तेमाल अधिक हो रहा है। इस पूरे विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब प्रवर्तन निदेशालय ने एक सहयोगी के पास से कथित रूप से 8.86 एकड़ जमीन से जुड़े दस्तावेज बरामद करने का दावा किया। इसके बाद पीएमएलए के तहत जांच शुरू हुई और मुख्यमंत्री को कई बार समन भेजे गए। ईडी का दावा है कि सोरेन सात बार समन के बावजूद पेश नहीं हुए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उनके वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने स्पष्ट किया कि सोरेन तीन बार पेश हुए थे और उसी प्रक्रिया के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह तथ्य इस पूरे मामले को एक अलग दृष्टिकोण देता है। क्या वास्तव में जांच में सहयोग नहीं किया गया था या फिर सहयोग के बावजूद कार्रवाई पहले से तय थी?
मामले ने पकड़ा था राजनीतिक तूल
31 जनवरी 2024 को हुई गिरफ्तारी ने इस पूरे मामले को राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर विस्फोटक बना दिया था। गिरफ्तारी के बाद रांची की निचली अदालत ने आईपीसी की धारा 174 के तहत समन जारी किया, जिसे चुनौती देते हुए सोरेन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि झारखंड हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार किया और कहा कि यह तथ्यात्मक प्रश्न है, जिसका निर्णय ट्रायल के दौरान होगा। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि सर्वोच्च न्यायपालिका इस मामले को केवल तकनीकी नजरिए से नहीं, बल्कि व्यापक न्यायिक संतुलन और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में देख रही है।
न्यायपालिका की ढाल और राजनीतिक संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला झारखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। पिछले कुछ महीनों में सोरेन को जिस तरह से जांच एजेंसियों की कार्रवाई और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा, उससे एक ऐसा माहौल बना जिसमें उनकी राजनीतिक छवि को चुनौती देने की कोशिश स्पष्ट दिख रही थी। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उस नैरेटिव को संतुलित करता है। अदालत का यह कहना कि ईडी को बड़े मामलों पर ध्यान देना चाहिए, अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत देता है कि जांच एजेंसियों को अपनी प्राथमिकताओं और कार्रवाई की गंभीरता पर पुनर्विचार करना चाहिए। यह फैसला सोरेन के लिए केवल कानूनी राहत नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक संबल भी है। झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में, जहां सोरेन सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं बल्कि आदिवासी पहचान और अधिकारों के प्रतीक माने जाते हैं, वहां यह फैसला उनके समर्थकों के लिए न्यायपालिका की निष्पक्षता का प्रमाण बन सकता है।
एक व्यापक संकेत-संस्थाओं का संतुलन अभी कायम है
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित किया है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था अभी भी संस्थागत संतुलन बनाए रखने में सक्षम है। जांच एजेंसियों को कार्रवाई का अधिकार है, लेकिन उस कार्रवाई की वैधता और औचित्य की अंतिम परीक्षा न्यायपालिका के सामने ही होती है। हेमंत सोरेन के मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप यह संकेत देता है कि न्यायपालिका न केवल संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कर रही है, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रही है कि जांच और न्याय के बीच संतुलन बना रहे।
सुप्रीम कोर्ट की मुहर नवा केरल सर्वेक्षण पर लगी रोक हटी
केरल हाई कोर्ट ने केरल छात्र संघ की याचिका पर लगाई थी रोक
अब सर्वेक्षण फिर शुरू करने का रास्ता साफ
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को राहत देते हुए केरल उच्च न्यायालय के उस अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी जिसमें राज्य के प्रस्तावित ‘नवा केरल सर्वेक्षण’ को रोक दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद सरकार को इस कार्य को आगे बढ़ाने की अनुमति मिल गई। मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी।
पिछले हफ्ते उच्च न्यायालय ने केरल छात्र संघ (केएसयू) के नेताओं की ओर से दायर याचिकाओं के बाद सर्वेक्षण पर रोक लगा दी थी जिन्होंने आरोप लगाया था कि चुनावों से पहले चलाया गया डाटा संग्रह अभियान सार्वजनिक धन से वित्त पोषित एक राजनीतिक रूप से प्रेरित अभियान था। उच्च न्यायालय ने नवा केरल सर्वेक्षण को गैरकानूनी बताते हुए रद्द कर दिया था और इसके वित्तपोषण और क्रियान्वयन पर सवाल उठाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम के लिए न तो उचित बजट आवंटन किया गया था और न ही वित्तीय स्वीकृति दी गई थी।
कपिल सिब्बल ने लड़ा केस
उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। कोर्ट में राज्य की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने तर्क दिया कि सरकार के पास यह आकलन करने का अधिकार है कि कल्याणकारी योजनाएं लाभार्थियों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रही हैं और प्रशासनिक मूल्यांकन के लिए डाटा एकत्र करने का भी अधिकार है। इस तर्क को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि सरकारें उन योजनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए ऐसे सर्वेक्षण करने की हकदार हैं जिन पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को रोकने के आधार पर सवाल उठाया और पूछा कि कल्याणकारी कार्यक्रम इच्छित परिणाम दे रहे हैं या नहीं यह निर्धारित करने के लिए जानकारी एकत्र करने में क्या गलत था।
संयम बरतने की सलाह
इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि किसी सर्वेक्षण की राजनीतिक आलोचना किसी राज्य को शासन संबंधी कार्य करने से रोकने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। अदालत ने प्रशासनिक मामलों में अनुचित न्यायिक हस्तक्षेप के खिलाफ तीखी टिप्पणी करते हुए इस बात पर जोर दिया कि जब तक कोई स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन न हो, तब तक संयम बरतने की आवश्यकता है। सर्वेक्षण को जारी रखने की अनुमति देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को लगभग 20 करोड़ रुपए के अनुमानित व्यय का विवरण देते हुए एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इस मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी।
उमाशंकर छापा मामले में राज्यमंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने जताई आपत्ति
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। उमाशंकर छापा मामले में बीजेपी में विद्रोह की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।कई विधायकों ने दबे शब्दों में नाराजगी जताई हैं। वहीं राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह खुल कर उमाशंकर सिंह के साथ आ गये हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स उन्होंने लिखा है कि बलिया के रसड़ा से विधायक उमाशंकर सिंह के घर में मेरी बेटी ब्याही है। उनके घर में आयकर विभाग की ओर से छापेमारी की जा रही है।
देश प्रदेश के नेता और आयकर विभाग समेत सभी संस्थाओं को पता है कि उमाशंकर सिंह दो वर्ष से अधिक समय से जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियों में उमाशंकर सिंह के लिए धनार्जन नहीं, सांसें बचाने में ही सारा समय और धन व्यय हो रहा है। सभी व्यवसाय लगभग बंद हो गए हैं। आज अपने आवास में आइसोलेशन में रह रहे हैं। विधानसभा का सत्र एक विधायक के लिए महत्वपूर्ण होता है, लेकिन एक घंटे के लिए भी नहीं जा सके। दिनेश प्रताप सिंह ने लिखा, इस समय उनके घर पर नर्स या डॉक्टर को भी जाने की अनुमति नहीं है। अगर उनके जीवन को कोई हानि होती है तो ये संवेदनहीन संस्थाएं जिम्मेदार होंगी।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार की परिस्थितियों में दुर्लभतम अपराधों में भी माननीय न्यायालय दया के आधार पर याचिका स्वीकार कर दोषमुक्त कर देते हैं। आयकर विभाग ने बुधवार को बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के कई ठिकानों पर छापे मारे हैं।
जानकारी सामने आई है कि लखनऊ में उनके आवास और सोनभद्र के ठिकानों पर रेड मारी गई है।
बलिया स्थित आवास और कार्यालय में भी छापेमारी हुई है।
फिल्म ’यादव जी की लव स्टोरी’ पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
टाइटल से समुदाय की छवि खराब नहीं होती, 27 फरवरी को तय समय पर रिलीज होगी फिल्म
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। फिल्म यादव जी की लव स्टोरी को लेकर चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए फिल्म के टाइटल और रिलीज पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से साफ इनकार कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल किसी समुदाय की छवि खराब होने की आशंका के आधार पर किसी फिल्म के टाइटल को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि फिल्म के टाइटल में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यादव समुदाय की छवि को ठेस पहुंचती हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मामला उन मामलों से अलग है जिनमें टाइटल स्पष्ट रूप से अपमानजनक या आपत्तिजनक पाए गए थे। अदालत की इस टिप्पणी के साथ ही फिल्म की रिलीज पर मंडरा रहा कानूनी खतरा पूरी तरह खत्म हो गया है। अब यह फिल्म तय कार्यक्रम के अनुसार 27 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।
फिल्म का टाइटल और ट्रेलर सामने आने के बाद कुछ संगठनों और सोशल मीडिया समूहों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था। विरोध करने वालों का आरोप था कि फिल्म में यादव समुदाय की लडक़ी और दूसरे वर्ग के युवक के बीच प्रेम संबंध को जिस तरह से दिखाया गया है, उससे सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर फिल्म के टाइटल और रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि फिल्म का नाम और कथानक एक विशेष समुदाय की छवि को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत कर सकता है। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि केवल आशंका के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
जीपीएस से मॉनिटर होंगे बंगाल में तैनात जवान
पोलिंग के दिनों प्रभावी इस्तेमाल न होने की मिली थी शिकायत
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले 1 मार्च से तैनात होने वाले केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के जवानों को आवंटित वाहनों में जीपीएस ट्रैकर लगाए जाएंगे ताकि भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की ओर से नियुक्त केंद्रीय पर्यवेक्षक लगातार निगरानी कर सकें कि तैनात सीएपीएफ कर्मियों का पहले दिन से प्रभावी उपयोग हो रहा है या नहीं।
आयोग ने पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 1 मार्च को तैनात की जाने वाली सीएपीएफ की 240 कंपनियों को चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही तैनात किया जाएगा। उन्हें क्षेत्र पर कंट्रोल और राज्य की भौगोलिक स्थिति से परिचित होने के कार्य में लगाया जाएगा।
मूवमेंट ट्रैक करने के लिए जीपीएस
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, आयोग के निर्देशानुसार पहले दिन से प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए इन सीएपीएफ कर्मियों को आवंटित वाहनों में जीपीएस ट्रैकर लगाए जाएंगे, ताकि आयोग की ओर से नियुक्त केंद्रीय पर्यवेक्षक उनके मूवमेंट को ट्रैक कर सकें। पर्यवेक्षक सीएपीएफ के इस्तेमाल पर दैनिक रिपोर्ट भी आयोग को भेज सकते हैं। सूत्र के अनुसार, यही व्यवस्था 10 मार्च को दूसरे चरण में तैनात होने वाली अतिरिक्त 240 कंपनियों पर भी लागू होगी।
प्रभावी इस्तेमाल पर सवाल
सीईओ ऑफिस के अंदरूनी सूत्र ने बताया, पश्चिम बंगाल में पिछले चुनावों में कई शिकायतें मिली थीं कि बड़ी संख्या में सीएपीएफ कर्मियों को तैनात करने के बावजूद पोलिंग के दिनों में भी उनका प्रभावी इस्तेमाल नहीं हुआ था। ड्यूटी के दौरान सीएपीएफ कर्मियों के घूमने-फिरने की भी शिकायतें थीं। इसलिए ऐसी शिकायतों को ध्यान में रखते हुए इस बार आयोग ने पहले दिन से ही सीएपीएफ कर्मियों की मूवमेंट पर सख्ती से नजर रखने का फैसला किया है, ताकि शुरू से आखिर तक उनका प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके।



