थ्री लैंग्वेज फार्मूला दक्षिण राज्यों में बढ़़ा रहा है बीजेपी की मुसीबत

  • तमिलनाडु के सीएम स्टालिन ने किया आर-पार की लड़ाई का आगाज
  • तेलंगाना और कर्नाटक में भी सुलग रही है आग
  • बीजेपी ने भी पूछे सवाल

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
चेन्नई। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने वीडियो जारी कर मोदी सरकार की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत थ्री लैंग्वेज फार्मूले का मरते दम तक विरोध करने का एलान किया है। तमिलनाडु से पहले कर्नाटक, पंजाब और तेलंगाना से भी विरोध के स्वर फूंट चुके हैं। स्टालिन ने तमिलनाडु की जनता से इस मुददे पर मदद की गुहार लगाई हैं। थ्री लैंग्वेज फार्मूले का सबसे ज्यादा विरोध दक्षिण के राज्यों से हो रहा है। गौरतलब है कि यदि यह विरोध तेज होता है और इसे जनता का समर्थन मिलता है तो बीजेपी के लिए यह बड़ी मुसीबत खड़ा करने वाला साबित होगा।

क्या है थ्री लैंग्वेज फार्मूला

केंद्र की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत शैक्षिक प्रणाली में भाषाई संतुलन स्थापित करने के लिए त्री-भाषा नीति अपनाई गयी है। इस नीति का उद्देश्य छात्रों को तीन भाषाओं में शिक्षित करना और भाषाई विविधता को प्रोत्साहित करना है। त्री-भाषा नीति का तात्पर्य तीन भाषाओं के अध्ययन से है, जिनमें से एक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, दूसरी हिंदी (गैर-हिंदी भाषी राज्यों में) और तीसरी अंग्रेज़ी या कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा हो सकती है।

केन्द्र हम पर भाषा युद्ध थोप रहा है : स्टालिन

सीएम एमके स्टालिन ने थ्री लैंग्वेज फार्मूले को सबसे बड़ी चुनौतियों करार दिया है। उन्होंने इसे भाषा युद्ध की संज्ञा दी है और कहा है कि हम इस युद्ध में पहले ही काफी कुछ खो चुके हैं। यह हम पर थोपा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि यह संदेश लोगों तक पहुंचाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को हमारे राज्य की रक्षा के लिए उठ खड़ा होना चाहिए। तमिलनाडु के सीएम ने केंद्र सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा, आज हम कर्नाटक पंजाब, तेलंगाना और अन्य जगहों से एकजुटता की आवाज उठते हुए देख रहे हैं। इस प्रतिरोध का सामना करते हुए, केंद्र सरकार जोर देकर कहती है कि वह अपनी इच्छा हम पर नहीं थोप रही है, फिर भी उनके सभी कार्य इसके विपरीत संकेत देते हैं। उनकी त्री-भाषा नीति के कारण पहले ही हमने नुकसान उठाया है। हम तमिलनाडु के कल्याण और भविष्य के साथ किसी भी व्यक्ति या वस्तु के लिए समझौता नहीं करेंगे। तमिलनाडु विरोध करेगा, तमिलनाडु विजयी होगा।

लगातार हो रहा है विरोध

हिंदी को अनिवार्य करने के प्रयासों का कई राज्यों में विरोध होता रहा है। यह विवाद विशेष रूप से दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल जैसे क्षेत्रों में अधिक तीव्र रहा है, जहाँ क्षेत्रीय भाषाएँ न केवल संचार का माध्यम हैं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी मानी जाती हैं। हिंदी को राजभाषा का दर्जा 1950 में मिला, लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य करने के प्रस्तावों का विरोध शुरू से ही रहा। तमिलनाडु में 1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन इसका प्रमुख उदाहरण है। इसी प्रकार, केरल, बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी समय-समय पर हिंदी को थोपने के प्रयासों का विरोध हुआ है। क्षेत्रीय भाषाओं के समर्थकों का तर्क है कि प्रत्येक राज्य की अपनी भाषा और संस्कृति है, जिसे संरक्षित किया जाना चाहिए। एक्सपर्ट का मानना है कि यह देश की भाषाई बहुलता के खिलाफ है और इससे गैर-हिंदी भाषी राज्यों में असंतोष बढ़ सकता है। इस विवाद का समाधान बहुभाषिकता को बढ़ावा देने में है। सरकार को हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को भी समान महत्व देना चाहिए ताकि भाषाई सौहार्द बना रहे और सभी समुदायों की पहचान सुरक्षित रहे।

शिक्षकों की कमी

सरकार द्वारा लागू की गई नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को प्रभावी रूप से लागू करने में योग्य शिक्षकों की भारी कमी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है। एनईपी के तहत प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा देने पर ज़ोर दिया गया है। हालाँकि, सभी भाषाओं के लिए प्रशिक्षित और योग्य शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। विशेष रूप से आदिवासी और दूरदराज़ के क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर है, जहाँ स्थानीय भाषाओं में शिक्षण के लिए उपयुक्त शिक्षक मिलना कठिन होता है। इसी तरह, विज्ञान, गणित और तकनीकी विषयों के लिए भी शिक्षकों की कमी बनी हुई है।

हिंदी बनाम अदर लैंग्वेज

थ्री लैंग्वेज फार्मूला धीरे—धीरे सियासत में हवा के रूख को बदल रहा है। एनडीए और इंडिया गठबधन दोनों ही इसका फायदा और नुकसान अपने—अपने हिसाब से देख रहे है। दक्षिण के राज्यों में बड़ी मुश्किल से बीजेपी को सफलता हासिल हुई हैं। ऐसे में यदि यह लड़ाई हिंदी बनाम क्षेत्रीय भाषा के तौर पर विकसित होती है तो इससे बीजेपी को राजनीतिक नुकसान हो सकता है। स्टालिन ने बड़ी खूबसूरती से इस मुददे को राजनीतिक मुददा बना दिया है। उन्होंने हिंदी पर आरोप लागाये हैं कि वह दर्जनों क्षेत्रीय भाषाओं को निगल चुकी है। स्टालिन ने एक्स पर लिखा कि भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगही, मारवाड़ी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, संथाली, अंगिका, हो, खडिय़ा, खोरठा, कुरमाली, कुरुख, मुंडारी और कई अन्य भाषाएं अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। इन भाषाओं का बुरा हाल हिंदी के कारण है।

हिंदी को लेकर स्टालिन की टिप्पणी समाज को बांटने का ओछा प्रयास : वैष्णव

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन की ”हिंदी थोपने” संबंधी टिप्पणी को उनकी सरकार के खराब शासन को छिपाने के लिए समाज को बांटने का ”ओछा प्रयास” बताया और सवाल किया कि क्या कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) नेता के विचारों से सहमत हैं। वैष्णव ने सवाल किया कि क्या स्टालिन से लोकसभा में विपक्ष के नेता गांधी सहमत हैं। वैष्णव ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ”यह जानना दिलचस्प होगा कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी जी का इस विषय पर क्या कहना है। क्या वह हिंदी भाषी क्षेत्र की सीट के सांसद के रूप में इससे सहमत हैं। उत्तर भारतीय राज्यों में बीजेपी को इस फार्मूले से क्या फायदा मिलेगा। क्योंकि स्टालिन के विरोध के बाद बीजेपी ने सीधा सवाल राहुल गांधी से पूछा है कि उनके मित्र स्टालिन हिंदी का विरोध कर रहे हैं। उनका क्या कहना है?

अखिलेश कर चुके हैं विरोध

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव इस नई व्यवस्था का विरोध कर चुके हैं। छात्रों द्वारा संसदीय सत्र के दौरान जंतर—मंतर पर किये गये विरोध प्रर्दशन में भी अखिलेश यादव ने हिस्सा लिया ?था और छात्रों को भरोसा दिलाया था कि वह उनके साथ है।

Related Articles

Back to top button