बैग पाने के लिए मची मारामारी, पत्रकारिता की गरिमा तार-तार अखिलेश यादव ने उठाए सवाल!
AC दफ्तरों में बैठने वाले पत्रकार सरकारी तंत्र और पैसों में बीके हैं तो वहीं दूसरी तरफ जो छोटे पत्रकार हैं वो भी पीछे नहीं हैं। ऐसे ही पत्रकारों की गरिमा को गिराता हुआ एक वीडियो मध्य प्रदेश से वायरल हो हो रहा है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एक जमाना था जा पत्रकार अपनी कलम से एक लकीर खींच देता था और उसे पत्थर की लकीर माना जाता था। अगर वो कोई खबर बता दे तो लोग आँख बंद करके उसपर विश्वास कर लेते थे। लेकिन अब न वो ज़माना रहा और न वो पत्रकारिता। अब देश का चौथा स्तम्भ बिकाऊ हो गया है।
जिस-जिस ओहदे पर पत्रकार बैठे हैं उसी तरह उनकी कीमत भी है। जहां AC दफ्तरों में बैठने वाले पत्रकार सरकारी तंत्र और पैसों में बीके हैं तो वहीं दूसरी तरफ जो छोटे पत्रकार हैं वो भी पीछे नहीं हैं। ऐसे ही पत्रकारों की गरिमा को गिराता हुआ एक वीडियो मध्य प्रदेश से वायरल हो हो रहा है। जहां मध्य प्रदेश में मोहन यादव सरकार के 2 साल पूरा होने पर कई मंत्रियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वहीं प्रेस कॉन्फ्रेंस में बांटे गए सरकारी बैग पाने के लिए पत्रकारों में भारी मारामारी देखने को मिली।
जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। और इसे लेकर लोग तरह-तरह की कमेंट कर रहे हैं। किसी ने लिखा पांच किलो अनाज में जनता बिक गई और एक बैग में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, एक अदद बैग के लिए कठोर संघर्ष करते पत्रकार। तो किसी ने पत्रकारिता पर ही सवाल उठा दिए। वहीं इस वीडियो को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी शेयर किया।
इस वीडियो को पोस्ट करते हुए सपा मुखिया अखिलेश यादव ने लिखा कि
कल वाले “द्वारी” थे,
आज वाले “दरबारी” हैं।
कल सवाल दरवाज़े पर खड़े होकर पूछते थे,
आज थैले के लिए दरबार में धक्का-मुक्की कर रहे हैं।
MP सरकार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दृश्य ऐतिहासिक है ,
माइक नहीं, सरकारी बैग केंद्र में है।
सवाल नहीं, पॉलिथीन की राजनीति चल रही है।
जो खुद को “पत्तरकार” कहलाते हैं,
वो सत्ता से सवाल नहीं,
सुविधा की झोली पकड़ते नज़र आ रहे हैं।
कल जिन हाथों में कलम थी,
आज उन्हीं हाथों में मुफ्त का थैला है।
पत्रकारिता नहीं बदली साहब…
बस रीढ़ की हड्डी “ऑफर मोड” में चली गई है।
अब बात करते हैं इस पूरे मामले की भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर से आये दृश्य साबित कर रहे हैं कि पत्रकारिता के नाम पर कुछ लोगों के जीवन का अंतिम सत्य सिर्फ उपहार पाना है। उपहार में छोटा सा थैला प्राप्त करने के लिए जिस तरह का आचरण देखने को मिला वो पूरे मीडिया पर सवालिया निशान लगा रहा है। थैले के लिए मची लूटमार के दृश्य बताते हैं कि पत्रकार के भेष में ये कोई और लोग हैं ये कम से कम पत्रकार तो नहीं हैं।
पत्रकारिता के लिए ये काला अध्याय ही माना जाएगा कि उपहार के लिए धक्का मुक्की ,टेबलों पर चढ़ जाना और मारामारी कर उपहार प्राप्त करना ये तो पत्रकारिता नहीं है। इस मसले पर वायरल वीडियो देशभर में चर्चा का विषय बन गए हैं और भोपाल की पत्रकारिता को लेकर भद्दे से भद्दे कमेंट किये जा रहे हैं। पहले बात करते हैं इस घटनाक्रम की। मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार के दो साल पूरे होने पर मंत्रियों की पत्रकार वार्ताएं चल रही हैं। सरकार चाहती है कि सरकार की सफलता की कहानी आम जनता तक पहुंचे। लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है कि किसके जरिये पहुंचे।
सरकार के चार मंत्रियों की पत्रकार वार्ताएं आयोजित कीं और तकरीबन हर जगह मीडिया के भेष में झपटमारी करते लोग नजर आए। इन्हें कौन बुलाता है ? ये कौन से पत्रकार हैं? इनका मकसद सिर्फ उपहारों की जुगाड़ है। ये कहाँ लिखते और दिखते हैं। इससे किसी को कोई लेना-देना नहीं है। भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर के दृश्य असल पत्रकारों की छवि पर काले धब्बे जैसे हैं। मंत्री चैतन्य काश्यप अपने विभाग की उपलब्धियां गिना के फारिग हुए थे कि उपहार में मिल रहे थैले के लिए भयावह स्थिति निर्मित हो गई। ‘
यही हाल मंत्री विजय शाह की पत्रकार वार्ता में हुआ और मंत्री तुलसी सिलावट और दिलीप अहिरवार, प्रदीप जायसवाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भी यही असहज स्थिति बन गई। जहाँ पत्रकार और पत्रकारिता एक तमाशे की तरह नजर आईं। खैर इस वीडियो की लेकर सियासी पारा जमकर हाई है।



