वांगचुक पर एनएसए लगाने पर सुप्रीम सवाल

- हिरासत के आधार देने में 28 दिनों की देरी
- संविधान के अनुच्छेद 22 का सीधा उल्लंघन कर रही सरकार : सिब्बल
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में लद्दाख से जुड़े एक अहम मामले पर विस्तार से बहस हुई, जहां सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत को चुनौती दी गई है। बता दें कि यह याचिका उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि अंगमो की ओर से दायर की गई है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना वराले की पीठ ने पूरे दिन के दूसरे सत्र में मामले की सुनवाई की, जिसमें याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें रखीं। गौरतलब है कि सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को लद्दाख में हुए हालिया विरोध प्रदर्शनों के बाद एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था।
सरकार का आरोप है कि इन प्रदर्शनों के दौरान हालात हिंसक हो गए थे और इससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई। हालांकि, सिब्बल ने कहा कि हिरासत का आदेश जिन चार वीडियो पर आधारित बताया गया है, वे न तो समय पर और न ही पूरी तरह से वांगचुक को उपलब्ध कराए गए। उनके मुताबिक, कानून स्पष्ट है कि अगर हिरासत के आधार बताए जाएं लेकिन उन पर निर्भर दस्तावेज न दिए जाएं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 22 का सीधा उल्लंघन होता है। मौजूद जानकारी के अनुसार, सिब्बल ने अदालत को यह भी बताया कि हिरासत के आधार देने में 28 दिनों की देरी हुई, जो कानूनन तय समयसीमा का उल्लंघन है।
अब तक वीडियो उपलब्ध नहीं कराए गए : सिब्बल
सिब्बल ने यह भी दलील दी कि हिरासत के आधार 29 सितंबर को दिए गए, जबकि वीडियो न तो पेन ड्राइव में थे और न ही उनकी प्रतियां दी गईं। बाद में केवल वीडियो के लिंक दिए गए, जो प्रभावी बचाव का अधिकार नहीं माने जा सकते। उन्होंने कहा कि वांगचुक ने हिरासत से कई बार पत्र लिखकर इन वीडियो की मांग की, लेकिन उन्हें कभी उपलब्ध नहीं कराया गया। यहां तक कि उनकी पत्नी को भी संबंधित दस्तावेज देने का आश्वासन देकर इंतजार कराया गया, लेकिन कुछ नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि हिरासत का मकसद व्यक्ति को प्रभावी प्रतिनिधित्व से वंचित करना नहीं हो सकता। यदि सलाहकार बोर्ड की बैठक से ठीक पहले दस्तावेज दिए जाएँ, तो यह केवल औपचारिकता रह जाती है, जबकि संविधान वास्तविक और सार्थक अवसर की बात करता है।



