संभल की गलियों में नफरत का खेल? कोर्ट के आदेश से ASP समेत 12 पुलिसकर्मी कटघरे में

संभल हिंसा का वो चेहरा, जिसे कानून का सबसे बड़ा रक्षक बताया जा रहा था, आज कोर्ट ने उसे मुल्जिम की कतार में खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने एएसपी अनुज चौधरी समेत 12 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया गया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: कहते हैं कि जब इंसाफ की कुर्सी पर बैठकर सियासत का शतरंज खेला जाता है, तो मोहरे मासूम लोग बनते हैं और खामियाजा पूरी इंसानियत भुगतती है। उत्तर प्रदेश का संभल, जो अपनी तहजीब और भाईचारे के लिए मशहूर था, आज वहां की गलियों में सिर्फ नफरफ की गंध और बेगुनाहों के आंसू बचे हैं। लेकिन इस सबके बीच एक बहुत बड़ा धमाका हुआ है।

वो सवाल, जो पिछले कई महीनों से दबाया जा रहा था, आज अदालत की दहलीज से चीखों के साथ गूंजकर बाहर आया है। संभल हिंसा का वो चेहरा, जिसे कानून का सबसे बड़ा रक्षक बताया जा रहा था, आज कोर्ट ने उसे मुल्जिम की कतार में खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने एएसपी अनुज चौधरी समेत 12 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया गया है। ऐसे में बडा सवाल खड़ा हुआ है कि क्या वर्दी के पीछे नफरत का बड़ा खेल खेला गया है
संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सीजेएम ने मंगलवार को वो फैसला सुनाया जिससे यूपी पुलिस के महकमे में हड़कंप मच गया है। कोर्ट ने तत्कालीन एएसपी अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर और 20 अज्ञात पुलिसवालों के खिलाफ केस दर्ज करने का हुक्म दिया है।

ये मामला जुड़ा है 24 नवंबर 2024 की उस काली तारीख से, जब जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान संभल की सड़कों पर खून बहा था। एक 24 साल का नौजवान, जिसका नाम आलम था, वो सुबह घर से टोस्ट बेचने निकला था। उसे क्या पता था कि जिस पुलिस को वो अपनी सुरक्षा के लिए समझता था, वही उसे निशाना बना लेगी। आलम के पिता यामीन ने अदालत में गुहार लगाई थी कि उनके बेटे को पुलिस ने सरेआम गोली मारी। पुलिस के डर से उस मासूम का गुपचुप इलाज कराना पड़ा। आज कोर्ट ने माना कि पीड़ित की दलील में दम है और अब पुलिस को अपने ही अफसरों के खिलाफ केस दर्ज करना होगा।

कोर्ट में वकील ने दलील पेश करते हुए बताया है कि जैसे ही वो जामा मस्जिद के पास पहुंचे तभी तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और अन्य पुलिसकर्मियों ने भीड़ पर जान से मारने की नीयत से गोलियां चला दीं। आलम ने ठेला छोड़कर भागकर जान बचाने की कोशिश की लेकिन दो गोलियां उसकी पीठ में और एक गोली हाथ में लग गई थी। किसी तरह घायल हालत में आलम घर पहुंचा जहां से परिजन उसे निजी अस्पताल ले गए। हालत गंभीर होने पर उसे हायर सेंटर रेफर किया गया और बाद में मेरठ में भर्ती कराया गया। वहां ऑपरेशन के बाद उसकी जान बच सकी। पीड़ित पिता का आरोप है कि बेटे ने साफ तौर पर सीओ, कोतवाली प्रभारी और अन्य पुलिसकर्मियों द्वारा गोली चलाने की बात बताई थी लेकिन जब कार्रवाई के लिए पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों से गुहार लगाई गई तो कोई सुनवाई नहीं हुई।

इस पर कोर्ट ने कोतवाली संभल में रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए हैं। आदेश में तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और 15 से 20 अज्ञात पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया गया है। वहीं, एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई का कहना है कि उन्हें अभी कोर्ट का आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। आदेश मिलने पर नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। अब मीडिया रिपोर्ट के हवाले से खबर आ रही है कि एफआईआर दर्ज नहीं किया जाएगा बल्कि कोर्ट के आदेश को उपरी अदालत में चुनौती दी जाएगी। हालांकि अब कानून का असर देर से सही लेकिन दिखना शुरु हो गया है आज नहीं तो कल जरुर ये असर दिखाए लेकिन जिस तरह से एफआईआर का आदेश हुआ है, ये न सिर्फ यूपी पुलिस की मंशा पर सवाल उठाता है बल्कि योगी सरकार को भी सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करता है।

संभल में पिछले साल 20 नवंबर को अचानक सर्वे टीम मस्जिद पहुंचती है। 24 नवंबर को दोबारा सर्वे का ड्रामा रचा जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सर्वे टीम के साथ आए कुछ बाहरी तत्वों ने जय श्रीरामश् के नारे लगाए और मस्जिद की जबरन घुसने की कोशिश की। जब लोगों ने इसका विरोध किया, तो पुलिस ने संवाद के बजाय सीधे गोलियों का सहारा लिया।

नतीजा? 4 मुस्लिम युवाओं की मौत हो गई। आरोप तो यहां तक हैं कि पुलिस ने मारे गए लोगों के परिवारों को डराया-धमकाया कि राजीनामाश् कर लो वरना पूरे खानदान को दंगों में फंसा देंगे। पुलिस ने 79 लोगों को गिरफ्तार किया, 2,750 अज्ञात लोगों पर केस कर दिया, और समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क तक को नहीं बख्शा। लेकिन असली गुनहगार कौन था? वो भीड़ थी, या वो वर्दीधारी जो उकसावे की राजनीति का हिस्सा बने हुए थे? ये सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि कोर्ट ने एफआईआर का आदेश दे दिया, ऐसे में ये बात साफ हो गई है कि कहीं न कहीं कोई न कोई बड़ा सबूत पुलिस के हाथ लगा है, वरना कैसे अदालत इतना बडा आदेश सिर्फ शक की बुनियाद पर नहीं दे सकती है। शुरुआत से ही विपक्ष और स्थानीय जनता एक ही नाम ले रही थी अनुज चौधरी। आरोप है कि पूरा दंगा भड़काने और पुलिसिया जुल्म को दिशा देने के पीछे इसी अफसर का हाथ था। लेकिन क्योंकि यूपी में बाबाश् का राज है और सरकार का हाथ इन अफसरों की पीठ पर था, इसलिए महीनों तक इन पर कोई आंच नहीं आई।

सत्ता के नशे में चूर प्रशासन को शायद ये लगा था कि मुस्लिम समाज की आवाज को लाठियों और गोलियों से दबा दिया जाएगा। लेकिन कोर्ट के इस आदेश ने साफ कर दिया है कि कानून की आंखें बंद हो सकती हैं, लेकिन न्याय मरा नहीं है। सवाल ये है कि क्या प्रशासन को पहले ये जुल्म दिखाई नहीं दिया? या फिर अनुज चौधरी जैसे लोग जानबूझकर सत्ता के इशारे पर कानून की धज्जियां उड़ा रहे थे? वैसे तो योगी बाबा की सरकार कहती है कि

योगी सरकार मंचों से चिल्ला-चिल्लाकर कहती है कि उत्तर प्रदेश में रामराज आ गया है। लेकिन क्या रामराज में बेगुनाहों के सीने में गोलियां उतारी जाती हैं? संभल की सड़कों पर जो खून बहा, वो किसी और का नहीं देश के लोगों का ही था और वो सिर्फ इसलिए बहा कि सामने वाला मुस्लिम धर्म का था। ऐसे में सरकार का ये जो ठोक दो वाला कल्चर है, आज वो खुद कटघरे में खड़ा है। मस्जिद सर्वे में इतनी जल्दबाजी क्यों थी? क्या ये वाकई कोई कानूनी प्रक्रिया थी या फिर चुनाव को देखते हुए सांप्रदायिक रोटियां सेंकने का कोई गुप्त एजेंडा? विपक्षी दल सही कहते हैं कि सरकार ने जानबूझकर माहौल बिगड़ने दिया ताकि धु्रवीकरण की राजनीति की जा सके। जब संभल जल रहा था, तब प्रशासन शांति बहाली में नहीं, बल्कि दमन में लगा था।

अब जब कोर्ट ने एफआईआर का आदेश दे दिया है, तो जनता के मन में कई सवाल हैं। क्या ये 20 पुलिसवाले वाकई गिरफ्तार होंगे? क्या उन अफसरों पर गाज गिरेगी जिन्होंने निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दिया? या फिर एफआईआर का आदेश भी धूल फांकती फाइलों का हिस्सा बनकर रह जाएगी? संभल की उन माओं के कलेजे से पूछिए जिन्होंने अपने जवान बेटों की लाशें उठाई हैं। उनके लिए ये एफआईआर काफी नहीं है। उन्हें वो अमन और वो न्याय चाहिए जो नफरत की इस राजनीति ने उनसे छीन लिया है। संभल का जख्म बहुत गहरा है, और ये जख्म तब तक नहीं भरेगा जब तक इस साजिश के पीछे बैठे बड़े आकाओंको सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता।

संभल की हिंसा हमारे लोकतंत्र के चेहरे पर एक काला धब्बा है। अनुज चौधरी पर एफआईआर होना तो सिर्फ पहली सीढ़ी है, अभी पूरा पहाड़ चढ़ना बाकी है। अगर योगी सरकार वाकई निष्पक्ष है, तो उसे अपनी पुलिस की इस बर्बरता को स्वीकार करना होगा और दोषियों को सख्त से सख्त सजा देनी होगी। हालांकि पुलिस की ओर से अधिकारिक बयान आ चुका है कि वो एफआईआर दर्ज नहीं कराएगी बल्कि उपर की अदालतों में गोहार लगाएगी और ये वही बात है जो योगी सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहा है।

क्योंकि अगर सरकार का नजरिया साफ होता तो अदालत के आदेशों को मानकर एफआईआर दर्ज करती और पुलिस के लोग जो फंसे थे वो अपनी बेगुनाही का सबूत पेश करते और अगर न पेश कर पाते तो सीधे जेल जाते लेकिन संभल के पुलिस महकमे ने एफआईआर न करने का आदेश दिया है। संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने कहा है कि एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी बल्कि अपील में जाएंगे। अब आगे क्या होगा, ये तो अदालत की अगली कार्रवाईयों से साफ होगा लेकिन एक बात जो पूरी तरह से तय हो गई वो यह है कि संभल हिंसा में पुलिस की ओर से जानबूझकर गोली चलाई गई थी, जिसका शिकार आलम बने थे।

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