बिहार 2025 के चुनाव में चोरी किया गया जनादेश, मचा हडकंप
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों को लेकर गंभीर आरोप लगाते हुए वोट फॉर डेमोक्रेसी वीएफडी नामक संगठन ने एक विस्तृत पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन जारी किया है, जिसमें दावा किया गया है कि चुनावी प्रक्रिया में बहुत ही सिस्टेमेटिक तरीके से हेरफेर हुआ और जनादेश को चुरा लिया गया।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या बिहार विधान सभा चुनाव में जनादेश चोरी किया गया था। क्या बिहार चुनाव में नोटरीफिकेशन जारी होने के बाद रातों रात चुनाव आयोग की वेबसाइट खोल डेढ़ लाख से ज्यादा मतदाता वोटर लिस्ट में जोड़ लिए गए।
ये सवाल इसलिए क्योंकि वोट फॉर डेमोक्रेसी की एक रिपोर्ट आई है, जिसमें दावा किया गया है कि न सिर्फ जानदेश चुराया गया है बल्कि रातों रात लाखों नए वोटर्स को जोड़कर चुनाव में बड़ा खेल किया गया है। वोट फॉर डेमोक्रेसी ने अपनी रिपोर्ट में क्या कुछ दावा किया है और कैसे पूरे मामले में चुनाव आयोग पर सवाल खड़ा हुआ है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों को लेकर गंभीर आरोप लगाते हुए वोट फॉर डेमोक्रेसी वीएफडी नामक संगठन ने एक विस्तृत पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन जारी किया है, जिसमें दावा किया गया है कि चुनावी प्रक्रिया में बहुत ही सिस्टेमेटिक तरीके से हेरफेर हुआ और जनादेश को चुरा लिया गया। यह रिपोर्ट महाराष्ट्र स्थित वोट फॉर डेमोक्रेसी द्वारा तैयार की गई है, जिसमें रिटायर्ड आईएएस अधिकारी एमजी देवसायम , डॉ. प्यारा लाल गर्ग, प्रोफेसर हरिश कर्णिक और माधव देशपांडे जैसे विशेषज्ञ शामिल हैं। रिपोर्ट में चुनाव से पहले, दौरान और बाद में हुई कई बड़ी खामियों को उजागर किया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि आम तौर पर किसी भी चुनाव से पहले वोटर लिस्ट सुधारी जाती है और जनवरी 2025 में यह काम हो चुका था। लेकिन अचानक 24 जून 2025 को चुनाव आयोग एक नई प्रक्रिया शुरू करता है जिसे एसआईआर यानि कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का नाम दिया गया। 2003 से आज तक कभी इसकी जरूरत नहीं पड़ी, तो चुनाव से ठीक 3 महीने पहले ऐसा क्यों किया गया? रिपोर्ट कहती है कि इसका कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। यह सीधे तौर पर संविधान के उन अनुच्छेदों का अपमान है जो हमें बराबरी और वोट देने का अधिकार देते हैं। बिना किसी आधार के शुरू की गई यह प्रक्रिया पूरी तरह से गैर-लोकतांत्रिक और शक के घेरे में है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आंकड़े डराने वाले हैं। जून में बिहार में 7.89 करोड़ वोटर थे, लेकिन 1 अगस्त को अचानक यह संख्या घटकर 7.24 करोड़ रह गई। यानी सिर्फ कुछ दिनों में 65 लाख से ज्यादा नाम काट दिए गए!
चुनाव आयोग का दावा था कि वे अपात्र लोगों को हटा रहे हैं, लेकिन जांच में पता चला कि असल में गड़बड़ी सिर्फ 3 लाख के आसपास थी। तो बाकी के 62 लाख लोग कहां गए? रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह कोई गलती नहीं, बल्कि एक सुनियोजित तरीके से किया गया हमला था ताकि एक खास वर्ग को वोट देने से रोका जा सके। रिपोर्ट में इसे घोस्ट डिलीशन कहा गया है। 21 से 25 जुलाई के बीच, यानी सिर्फ 3 दिनों में 21 लाख से ज्यादा नाम गायब कर दिए गए। साढ़े पांच लाख लोगों को मृत बता दिया गया। 14 लाख लोगों को भगोड़ा या शिफ्टेड घोषित कर दिया गया। साथ ही जो वोटर पहले आसानी से मिल रहे थे, उन्हें अचानक अनट्रेसेबल यानि किपता नहीं मिल रहा कह दिया गया और उनकी संख्या 809 प्रतिशत बढ़ गई। मजे की बात देखिए, जिस एसआईआर को विदेशी घुसपैठियों को पकड़ने के नाम पर शुरू किया गया था, उसे पूरी प्रक्रिया में एक भी विदेशी नागरिक नहीं मिला! इसका मतलब साफ है कि मकसद घुसपैठिए पकड़ना नहीं, बल्कि असली वोटरों को लिस्ट से बाहर करना था। यह कोई जमीनी सर्वे नहीं था, बल्कि कंप्यूटर पर बैठकर किया गया एक डिजिटल खेल था।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सिर्फ चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में ही गड़बड़ी नहीं थी बल्कि वोटिंग खत्म होने के बाद जो हुआ, उसने सबको दंग कर दिया। इसे मिडनाइट हाइक यानी आधी रात की बढ़त कहा गया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अचानक डेटा में बदलाव किया गया और महिला-पुरुष दोनों के टर्नआउट में 0.18 प्रतिशत की एक जैसी बढ़ोतरी दिखाई गई। इससे रातों-रात 1 लाख 34 हजरी 145 नए वोट जुड़ गए। ये वोट कहां से आए? रिपोर्ट कहती है कि इस हेरफेर ने कम से कम 20 सीटों के नतीजों को बदल दिया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिहार की 21 सीटें ऐसी थीं जहां जीत-हार का अंतर बहुत ही कम था, लेकिन वहां बार-बार मांगने के बावजूद वीवीपैट की पर्चियों की गिनती नहीं कराई गई।
वोट फॉर डेमोक्रेसी ने अपने प्रजेंटेशन में यह भी कहा है कि चुनाव आयोग ने पोलिंग बूथों की संख्या बढ़ाकर 90 हजार से ज्यादा कर दी। लेकिन ये बूथ वहां नहीं बढ़ाए गए जहां लोगों को आने में दिक्कत थी, बल्कि उन जगहों पर बढ़ाए गए जहां राजनीतिक लाभ लिया जा सके। इसके अलावा, 1.8 लाख जीविका दीदियों को चुनाव के काम में लगाया गया। ये वो महिलाएं हैं जो सीधे सरकारी योजनाओं का लाभ लेती हैं, इसलिए उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है। बूथों पर भी भारी असंतुलन था, जहां सत्ता पक्ष के पास 91 हजार एजेंट थे, वहीं विपक्ष के पास केवल 67 हजार। यानी निगरानी करने वाली आंखें कम कर दी गईं। और सबसे हैरानी की बात है कि हरियाणा से विशेष ट्रेनें भरकर करीब 6,000 लोगों को बिहार लाया गया ताकि वे वोट डाल सकें। यह कानूनन अपराध है। सीसीटीवी कैमरे कई जगह खराब पाए गए और सड़कों पर वीवीपैट की पर्चियां पड़ी मिलीं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब चुनाव की तारीखें तय हो चुकी थीं, तब आखिरी समय में 3.34 लाख नए नाम लिस्ट में कैसे जोड़ दिए गए?
यह सब बताता है कि 2025 का बिहार चुनाव जनादेश का नहीं, बल्कि जुगाड़ और चोरी का चुनाव बनकर रह गया।
हालांकि रिपोर्ट के बहुत से सवाल पहले भी विपक्ष की ओर से उठाए जा चुके हैं लेकिन इस पर चुनाव अयोग ने कोई सफाई नहीं दी है लेकिन इस रिपोर्ट में एक दावा जो सबसे अहम है कि रातों रात चुनाव आयोग की बेवसाइट को खोलकर वोट बढ़ाने का है। जिसमें तकरीबन डेढ़ लाख वोटों के बढने की बात सामने आई है। कुल मिलाकर ऑडिट रिपोर्ट का सारांश है कि बिहार का चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं था। इसमें संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 326 का उल्लंघन करते हुए मतदाता के अधिकारों का हनन किया गया है। आधार कार्ड को दरकिनार करना और बिना फील्ड वेरिफिकेशन के एल्गोरिथमिक तरीके से नाम काटना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ बताया गया है।
ऐसे में साफ है रिपोर्ट ने बहुत ही गंभीर सवाल उठाए हैं लेकिन शायद ही चुनाव आयोग इसका जवाब दे क्योंकि चुनाव आयोग इस सब बातों को कोई जरुरी नहीं समझता है। क्योंकि मोदी सरकार ने देश के चुनाव आयुक्तों को सुपर पावर दे दी है। चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त चाहे जो करें उनका फैसला न तो टाला जा सकता है और न ही उन पर कोई कार्रवाई की जा सकती है। क्योंकि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और मोदी सरकार को चुनाव आयोग की नियुक्तियों के मामले को लेकर कटघरे में खड़ा किया था। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक याची ने चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्तों की पावर बढ़ाने को लेकर गंभीर आरोप लगाए कि सरकार ने चुनाव आयुक्तों को इतनी पावर दे दी है कि उतनी पावर राष्ट्रपति के पास भी नहीं है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और मोदी सरकार दोनों को नोटिस जारी किया है और पूछा है कि क्या सच में ऐसा है। लेकिन दूसरी ओर जिस तरह से चुनाव से पहले और चुनाव के बाद लगातार चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे हैं, ऐसे में कहीं न कहीं चुनाव आयोग की निष्पक्षता सवालों के घेरे में है। अगर चुनाव लड़कर नहीं, बल्कि लिस्ट बदलकर जीता जाएगा, तो फिर चुनावों का क्या मतलब?
अगर वोट फॉर डेमोक्रेसी की रिपोर्ट सही है तो यह बिहार के जनादेश की चोरी नहीं, बल्कि बाबा साहब अंबेडकर के संविधान की हत्या है। और सबसे शर्मनाक बात यह है कि इस हत्या का हथियार वो संस्था बनी, जिसे लोकतंत्र का रक्षक होना चाहिए। ऐसे में मोदी सरकार को चाहिए कि वोट फॉर डेमोक्रेसी की रिपोर्ट को चेक करें और अगर जैसा कि रिपोर्ट में गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उस सभी की जांच कर चुनाव आयोग से सवाल करना चाहिए। और सुप्रीम कोर्ट को भी यही प्रक्रिया अपनानी चाहिए क्योंकि एसआईआर का मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में है और इस जिस तरह से वोट फार डेमोक्रेसी ने पूरे बिहार चुनाव पर ही सवाल खड़े किए है, इसकी तह तक जाकर सच पाए जाने पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।



