Amit Shah ने CM Yogi को दिया खुला अल्टीमेटम ! शंकराचार्य विवाद पर बवाल

भारतीय राजनीति में कुछ बातें खुलकर नहीं कही जातीं...लेकिन इशारों में बहुत कुछ कह दिया जाता है....और जब इशारा करने वाला शख्स देश का गृह मंत्री अमित शाह हो, और निशाने पर मौजूद हों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ....

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भारतीय राजनीति में कुछ बातें खुलकर नहीं कही जातीं…लेकिन इशारों में बहुत कुछ कह दिया जाता है….और जब इशारा करने वाला शख्स देश का गृह मंत्री अमित शाह हो, और निशाने पर मौजूद हों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ….

तो हर शब्द, हर वाक्य, हर ठहराव अपने-आप में एक संदेश बन जाता है…हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से अमित शाह ने जो कहा…उसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है….सबसे पहले आफ अमित शाह का ये बयान देखिए…जिसमें उन्होंने कहा कि…. जो सरकार सनातन धर्म के अनुयायियों को निराश करती है, वह देश में दोबारा सत्ता में नहीं लौट सकती…

बस इस बयान के बाद ही राजनीतिक गलियारों में सियासी पारा हाई हो गया है….ऐसे में अब सवाल ये नहीं है कि ये लाइन क्या कहती है….सवाल ये है कि ये लाइन किसके लिए कही गई?…क्या अमित शाह मंच से योगी को चेतावनी दे रहे थे?…क्या ये बयान योगी सरकार के कामकाज पर सवाल है?…और सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या 2027 से पहले उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने का संकेत दे दिया गया है?…

दरअसल, गुजरात के गांधीनगर में स्वामीनारायण संप्रदाय के पवित्र ग्रंथ शिक्षापत्री के 200 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया गया था…जहां शाह ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि….आजादी के बाद लंबे समय तक सनातन परंपराओं को उचित सम्मान देने वाली सरकार की प्रतीक्षा रही…अमित शाह ने कहा कि संतों के आशीर्वाद से उन्हें पूरा भरोसा है कि जो सरकार सनातन धर्म के मूल्यों को कमजोर करेगी, वह दोबारा सत्ता में नहीं आएगी…आज देश में ऐसी सरकार है…जो सनातन धर्म के सिद्धांतों के अनुसार शासन कर रही है और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत कर रही है…इसी दौरान अमित शाह ने कहा कि…जो सरकार सनातन धर्म के अनुयायियों को निराश करती है…वो देश में दोबारा सत्ता में नहीं लौट सकती…अब उनके इस बयान को आने वाले राजनीतिक हालात और सांस्कृतिक विमर्श से जोड़कर देखा जा रहा है….

पीएम मोदी के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कोई ऐसे नेता नहीं हैं…जो बिना नपे-तुले शब्दों के बयान दें….वो जो कहते हैं, सोच-समझकर कहते हैं, और जहां कहते हैं, वहां भी पूरा संदेश छिपा होता है…जब वो कहते हैं कि सनातनियों को निराश करने वाली सरकार सत्ता में वापस नहीं आती…तो ये सामान्य भाषण नहीं माना जा सकता….क्योंकि, ये बयान किसी विपक्षी सरकार के लिए नहीं था…ये बयान किसी पुराने शासन पर हमला नहीं था…ये बयान मौजूदा भाजपा सरकार के मंच से दिया गया है…तो सवाल उठना लाज़मी है कि…क्या अमित शाह अपनी ही सरकार को आईना दिखा रहे थे?…

दरअसल, पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में संत समाज और योगी सरकार के रिश्तों में खटास की खबरें लगातार सामने आ रही हैं…शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का मामला…उनका माघ मेले में बिना स्नान लौटना…सरकार पर संतों के अपमान के आरोप…प्रशासनिक रवैये पर खुली नाराज़गी…ये सब घटनाएं सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी देती हैं….आलम तो तक थे कि सीएम योगी ने बिना नाम लिए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को कालनेमी तक कह दिया था और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सीएम योगी की तुलना औरंगजेब से कर दी थी……जिसके बाद भारी विवाद देखने को मिला था…

सीएम योगी आदित्यनाथ की पहचान ही एक संत-मुख्यमंत्री की रही है…लेकिन जब संत समाज का एक बड़ा वर्ग सरकार से नाराज़ दिखने लगे…तो ये सवाल उठता है कि…क्या योगी अपनी सबसे मजबूत ज़मीन खोते जा रहे हैं? याद कीजिए वो बयान, जब खुद योगी आदित्यनाथ ने कुछ कथित साधुओं को कालेनेमि कहा था…अब भले ही सरकार का तर्क रहा हो कि…हम ढोंगी बाबाओं की बात कर रहे थे…लेकिन संत समाज ने इसे अपमान के रूप में लिया और यहीं से शुरू हुआ वो सिलसिला…जिसने योगी सरकार को धार्मिक मोर्चे पर बैकफुट पर ला दिया…

राजनीति में संयोग बहुत कम होते हैं…जब संत समाज नाराज़ हो…शंकराचार्य सरकार पर सवाल उठा रहे हों और उसी बीच अमित शाह सनातनियों को लेकर मंच से चेतावनी दें….तो सवाल उठता है कि क्या ये योगी आदित्यनाथ के लिए सीधा संदेश था?…क्या अमित शाह ये कहना चाह रहे थे कि सरकार अपनी जड़ों से भटक रही है?…..

सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की हो रही है….वो है मठ वापसी का इशारा…जिसमें खुलकर तो अमित शाह ने ऐसा कुछ नहीं कहा…लेकिन उनके बयान को जिस तरह से पढ़ा जा रहा है…उसमें एक सवाल उभरता है कि क्या योगी आदित्यनाथ को याद दिलाया जा रहा है कि वो पहले एक संत हैं और उसके बाद मुख्यमंत्री हैं?…..तो इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सीएम योगी का प्रशासनिक चेहरा…सख्त फैसले…और संत समाज से टकराव….ये सब दिल्ली की नज़र में अच्छा संदेश नहीं दे रहा….

अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर कि….क्या 2027 में भाजपा सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ जाएगी?…..तो दोस्तों, भाजपा चुनाव भावनाओं से नहीं….गणित और ज़मीनी फीडबैक से लड़ती है….अगर पार्टी को लगता है कि संत समाज नाराज़ है…परंपरागत समर्थक असंतुष्ट हैं और सरकार का धार्मिक नैरेटिव कमजोर पड़ रहा है…तो नेतृत्व बदलाव पर विचार करना असंभव नहीं…अमित शाह का बयान इसी दिशा में पहला राजनीतिक संकेत माना जा रहा है…..यानी दिल्ली बनाम लखनऊ?….

हालांकि, राजनीति गलियारों में ये भी चर्चा है कि सीएम योगी का राजनीतिक कद बहुत बड़ा हो गया है…राष्ट्रीय राजनीति में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है और यही बात दिल्ली को असहज करती है….ऐसे में सवाल उठता है कि…क्या दिल्ली में सीएम योगी के खिलाफ स्क्रिप्ट लिखी जा रही है?…क्या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बयान उसी स्क्रिप्ट का ट्रेलर है?…….जोभी हो, लेकिन यहां एक बात तो साफ है कि…अमित शाह ने सीधे सीएम योगी आदित्यनाथ का नाम तो नहीं लिया….लेकिन राजनीति में कई बार नाम न लेना ही सबसे बड़ा हमला होता है…उनका बयान चेतावनी भी हो सकता है…सलाह भी हो सकता है…और सत्ता संतुलन का संदेश भी हो सकता है….

वहीं इन सब के बीच सीएम योगी की चुप्पी भी सवालों में है…क्योंकि इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से कोई तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई…और जैसा कि हम सभी जानते हैं कि राजनीति में चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है…ऐसे में सवाल उठता है कि…क्या सीएम योगी समझ चुके हैं कि…संदेश ऊपर तक पहुंच चुका है और अब हर कदम सोच-समझकर उठाना होगा?

अमित शाह का बयान कोई साधारण भाषण नहीं था…कथिततौर पर वो एक राजनीतिक संकेत था…जिसे हर कोई अपने-अपने तरीके से देख रहा है….आज सवाल ये हैं कि क्या ये सीएम योगी को चेतावनी थी?…क्या संत समाज की नाराज़गी दिल्ली तक पहुंच गई है?…और क्या 2027 में उत्तर प्रदेश को नया चेहरा मिलेगा?…या फिर ये सिर्फ एक रणनीतिक बयान था?……इन सभी सवालों के जवाब फिलहाल अभी भविष्य के गर्भ में हैं…लेकिन इतना तो तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ बड़ा जरूर पक रहा है और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बयान उस राजनीति का पहला इशारा हो सकता है..

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