सत्ता के सीने पर सवालों की चोट

- राहुल का वार, सरकार बेकरार
- अगर सब ठीक है तो इतनी घबराहट क्यों?
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब के कुछ अंशों का जिक्र कर देश में राजनीतिक बवाल मचा दिया है। एपिस्टन फाइल पर जारी बमचक के बीच राहुल का यह वार सरकार को बेचैन कर गया है। ससंद में इस मुद्दे पर जबर्दस्त गर्मी देखने को मिल रही है। राहुल गांधी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान जनरल नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का जिक्र कर अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे थे। लोकसभा अध्यक्ष ने टोकते हुए राहुल गांधी को ऐसा करने से रोक दिया। यही से बवाल कि शुरूआत हो गयी। गौरतलब है कि जनरल नरवणे की किताब के जिन अंशों का जिक्र राहुल गांधी करना चाहते थे वह सिर्फ व्यक्तिगत अनुभव नहीं बल्कि सत्ता सेना और नीति निर्माण के रिश्ते पर सीधे सवाल थे।
किताब से घबराहट क्यों?
रक्षा विशेषज्ञों की राय भी दो फाड़ है। कुछ मानते हैं कि राहुल गांधी ने सेना और सरकार के रिश्तों पर बहस छेड़कर सही किया तो कुछ का कहना है कि यह संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक मंच पर उठाना जोखिम भरा है। नियम साफ हैं रिटायरमेंट के बाद पांच वर्षों तक कोई भी पूर्व सेना प्रमुख ऐसी जानकारियां सार्वजनिक नहीं कर सकता जो राष्ट्रीय सुरक्षा या नीति से जुड़ी हों। शायद यही वजह है कि सरकार ने नरवणे की किताब पर प्रतिबंध लगाने का रास्ता चुना। लेकिन सवाल यहीं अटक जाता है अगर सब कुछ नियमों के दायरे में है तो किताब से इतनी घबराहट क्यों?
चुनौतीपूर्ण समय में नरवणे ने संभाली कमान
जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भारतीय सेना के 28वें थल सेना प्रमुख रहे। उन्होंने दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक यह पद संभाला। उनका कार्यकाल ऐसे समय में रहा जब भारत को चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गंभीर तनाव का सामना करना पड़ा। पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी की घटना, सैन्य तैनाती में वृद्धि, कूटनीतिक और सैन्य स्तर की वार्ताएँ—ये सभी घटनाएँ नरवणे के कार्यकाल के दौरान हुईं। इसके अलावा, सुरक्षा से जुड़े कई नीतिगत निर्णय भी इसी अवधि में लिए गए।
यह सिर्फ सवाल नहीं है?
सवाल सिर्फ यह नहीं था कि राहुल गांधी ने क्या कहा सवाल यह था कि उन्होंने किसके शब्दों के सहारे क्या कहा। एक ऐसे सैन्य अधिकारी के शब्द जिन्होंने 2019 से 2022 तक थल सेना प्रमुख रहते हुए चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव जैसे अत्यंत संवेदनशील हालात देखे बड़े रणनीतिक फैसलों का हिस्सा रहे और देश की सुरक्षा की कमान संभाली। रिटायरमेंट के बाद उनकी आत्मकथा में उन्हीं दौरों से जुड़े अनुभवों और घटनाओं का उल्लेख है और अब वही अनुभव सत्ता के लिए असहज सच बनते जा रहे हैं।
अग्निवीर योजना नहीं चाहते थे नरवणे!
मीडिया रिपेार्टस के मुताबिक नरवणे को यह भरोसा था कि वह देश के अगले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनेंगे। लेकिन एक बुनियादी मतभेद आड़े आया और वह था अग्निवीर योजना का। नरवणे इस योजना के पक्ष में नहीं थे जबकि सरकार इसे किसी भी कीमत पर लागू करना चाहती थी। इसी टकराव के चलते ऐसा माना जा रहा है कि उन्हें सीडीएस नहीं बनाया गया और यह जिम्मेदारी जनरल बिपिन रावत को सौंप दी गई। राहुल गांधी ने जब इस दावे को संसद में उठाया तो मामला महज राजनीतिक आरोप से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य स्वायत्तता के सवाल में तब्दील हो गया।
राहुल गांधी ने देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण मसला उठाया। वह भी सेना के सर्वोच्च पद पर रहे व्यक्ति द्वारा लिखा गया है। सारे देश को जानना चाहिए कि सरकार चीन के सामने नतमस्तक क्यों है? राज्यसभा में भी यही बात कही गई, लेकिन लोकसभा में क्यों नहीं कहने दिया गया? वह तो देश के हित के बारे में बात कर रहे थे।
प्रमोद तिवारी, कांग्रेस सांसदसदन से जुड़े नियमों का सही ढंग से पालन नहीं किया जा रहा है। 1947 में जब पाकिस्तान के साथ संघर्ष हुआ, तो संसद भवन में इसकी चर्चा हुई थी। 1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान भी संसद भवन के दोनों सदनों में चर्चा हुई थी। यह चर्चा लगभग एक हफ्ते तक चली थी। 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध को लेकर भी राष्ट्रपति ने सदन में इसकी जानकारी दी थी। ऐसे उदाहरणों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर सदन में चर्चा होनी ही चाहिए।
मनीष तिवारी, कांग्रेस सांसददिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को लोकतंत्र खतरे में है जैसे बयान नहीं देने चाहिए। उनका लंबा राजनीतिक अनुभव है। उन्हें अमर्यादित और अव्यावहारिक बातें नहीं करनी चाहिए। उनकी पार्टी ने आपातकाल लगाया था। मुझे लगता है उन्हें इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है। अपने आकाओं को खुश करने के लिए वह इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं।
मदन राठौड़, भाजपा सांसदभारत की जनता ने जिसके हाथ में लोकतंत्र को सुरक्षित समझा है उसे जिम्मेदारी दे दी है। जनता की अदालत सबसे बड़ी है। उसी अदालत ने भाजपा और एनडीए को संसद में पहुंचाया है। उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेनी चाहिए।
मयंक कुमार नायक भाजपा सांसद




