कानूनी प्रक्रिया का दिखावा, अवैध तोड़फोड़ पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि कोर्ट ऐसे कई मामलों का गवाह रहा है जहां अपराध होने के तुरंत बाद किसी रहने वाली जगह पर कब्जा करने वाले लोगों को तोड़ने का नोटिस जारी कर दिया जाता है, उसके बाद कानूनी जरूरतों को पूरा करने का दिखावा करते हुए उसे तोड़ दिया जाता है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद उत्तर प्रदेश में बुलडोजर के जरिए तोड़फोड़ जारी रहने की घटना पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है. घरों और इमारतों को गिराने की दंडात्मक कार्रवाई जारी रहने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि कोर्ट ऐसे कई मामलों का गवाह है जहां अपराध होने के तुरंत बाद किसी रहने की जगह पर कब्जा करने वाले लोगों को तोड़ने का नोटिस जारी किया जाता है, उसके बाद कानूनी जरूरतों को पूरा करने का दिखावा करके उसे तोड़ दिया जाता है.

हाईकोर्ट ने कहा कि कोर्ट ऐसे कई मामलों का गवाह रहा है जहां अपराध होने के तुरंत बाद किसी रहने वाली जगह
पर कब्जा करने वाले लोगों को तोड़ने का नोटिस जारी कर दिया जाता है, उसके बाद कानूनी जरूरतों को पूरा करने
का दिखावा करते हुए उसे तोड़ दिया जाता है.

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डबल बेंच ने फ़ैमुद्दीन और दो अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आज मंगलवार को हमीरपुर से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ताओं द्वारा अपनी संपत्तियों को बुलडोजर एक्शन से बचाने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान नाराजगी व्यक्त करते हुए तल्ख टिप्पणी की. याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट से अपनी संपत्तियों के संभावित विनाश को रोकने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप किए जाने की मांग की गई है.

कानूनी जरूरतों का दिखावा कर तोड़ देते हैं कोर्ट
हाईकोर्ट ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद राज्य में कई घरों को गिराने की दंडात्मक कार्रवाई जारी है. कोर्ट ने यह भी कहा कि कोर्ट ऐसे कई मामलों का गवाह रहा है जहां अपराध होने के तुरंत बाद किसी रहने वाली जगह पर कब्जा करने वाले लोगों को तोड़ने का नोटिस जारी कर दिया जाता है, उसके बाद कानूनी जरूरतों को पूरा करने का दिखावा करते हुए उसे तोड़ दिया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश के बावजूद तोड़-फोड़ जारी है, भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इमारतों को सजा के तौर पर तोड़ना शक्तियों के बंटवारे का खुला उल्लंघन है, क्योंकि सजा देने का अधिकार तो न्यायपालिका के पास है.

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