लोकसभा से निकल कर गिरफ्तारी देने को तैयार हो गए राहुल, नरवणे की किताब पर छिड़ा संग्राम

तानाशाही सरकारों में सदन किस तरह से चलती है, किस तरह से विपक्ष का चुप कराकार लोकतंत्र का गला घोंटा जाता है इसका उदाहरण अगर आपको कहीं देखना है तो दिल्ली की संसद की ओर देख सकते हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: तानाशाही सरकारों में सदन किस तरह से चलती है, किस तरह से विपक्ष का चुप कराकार लोकतंत्र का गला घोंटा जाता है इसका उदाहरण अगर आपको कहीं देखना है तो दिल्ली की संसद की ओर देख सकते हैं।

एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने आने से कांप रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर एक किताब की महज पांच लोइनों को लेकल पूरी सरकार के मंत्री ऊपर से लेकर नीचे तक कांप रहे रहे हैं। यही वजह है कि एक तरफ स्पीकर द्वारा विपक्ष को बोलने का मौका तक नहीं दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ किताब को फॉरवर्ड करने पर भी कार्रवाई कर दी जा रही है। लेकिन इस बीच आखिर ऐसा क्या हुआ कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ये आ कर कहना पड़ा कि विपक्षी सांसदों को गिरफ्तार करके जेल भेज दो? और किस किताब को सर्कुलेट करने के मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है?

पिछले कुछ दिनों जिस तरीके से संसद को चलाया जा रहा है वो बताता है कि ये सरकार अब बेशर्म हो चुकी है। खुलेआम लोकसभा स्पीकर सरकार द्वारा जिस तरह से विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश की गई है वो बेहद शर्मनाक है। पहले तो नेताप्रतिपक्ष राहुल गांधी को जनरल नरवणे की किताब कोट करने से रोका गया। लेकिन अब तो कुछ भी बोलने से मना किया जा रहा है। अभी कल की ही बात है जब सत्र की शुरुआत हुई तो स्पीकर साहब ओम बिरल ने प्रश्नकाल के दौरान नेता विपक्ष को बोलने नहीं दिया।

जब हंगामा हुआ तो वो कार्यवाही स्थगित करके चल दिये। फिर जब दोबारा कार्यवाही की शुरुआत होती है तो पीठासीन संध्या राय जी भी राहुल गांधी अपने मुद्दे पर बोल सकते हैं कि नहीं, इसकी परमिशन भी वो सरकार से लेती पकड़ी गईं। वहीं विपक्ष की महिला सांसदों पर ओम बिरला द्वारा आरोप लगाया गया कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने की नियत से उनकी कुर्सी तक पहुंच गई थी। जिसके कारण स्पीकर ओम बिरला को पीएम मोदी का अभिभाषण रद्द करना पड़ा। इसी सबको लेकर कल नेता प्रतिपक्ष पूरी तरह से आहत हो गए और उनको मीडिया के कैमरों के सामने आकर ये कहना पड़ गया कि हमको गिरफ्तार करके जेल में ही डाल दो।

एक तरफ जहां मोदी-शाह एंड कंपनी इस बीत से डरी हुई कि कहीं संसद में विपक्ष उससे यूएय डील या एपस्टीन फाइल्स को लेकर सवाल न पूछ ले तो वहीं एक सबसे बड़ा डर जो अब उभर कर सामने आने लगा है वो हा पूर्व आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’। पिछले दिनों हमने देखा था कि कैसे जब संसद सत्र के दौरान राहुल गांधी ने जैसे हीइस किताब का जिक्र किया था यो मोदी शाह एंड कंपनी की हवाईयां उड़ गई थी। अमित शाह और राजनाथ सिंह ने तो पूरा जोर लगाया कि कैसे भी करके राहुल गांधी उस किताब का संसद में जिक्र न कर पाएं। स्पीकर ओम बिरला भी तमाम तरह के कानून झाड़ने लगे और जैसे तैसे करके भी राहुल को बोलने नहीं दिया। लेकिन यही चीज सरकार को भारी पड़ गई।

जैसे ही जनता के सामने संसद का ये दृश्य सामने आया उसकी इस किताब को लेकर जिज्ञासा हो गई कि आखिर इस किताब में ऐसा क्या है कि सरकार इतना डर रही है। हर कोई यह जानना चाह रहा था कि इस किताब में जनरल नरवणे ने ऐसा क्या खुलासा किया है जिसको लेकर सरकार के मंत्री इतना परेशान हो गए। सरकार की तरफ से पहले कहा गया हा कि ये किताब प्रकाशित ही नहीं हुई है तो राहुल गांधी प्रकाशित किताब को लेकर संसद के बाहर पहुंच गए। उधर इंटरनेट पर इस किताब की पीडीएफ फाइल सर्कुलेट होने लगी जिसके बाद सरकार इतनी परेशान हो गई कि उसने इसपर भी एफआईआर करा दी। जी हां जनरल नरवणे की जिस किताब के राहुल गांधी के ज़िक्र से संसद में हंगामा हुआ है और मोदी सरकार फँसी नज़र आ रही है, उसकी सॉफ्ट कॉपी के ऑनलाइन सर्कुलेट होने पर एफ़आईआर दर्ज की गई है।

दिल्ली पुलिस अब इस मामले की जाँच-पड़ताल में अपनी ऊर्जा खपाएगी कि आख़िर यह किताब पीडीएफ़ फॉर्मेट में कैसे ऑनलाइन लोगों तक पहुँच रही है। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि सोशल मीडिया, व्हाट्सएप और कुछ वेबसाइटों पर किताब की प्री-प्रिंट पीडीएफ़ कॉपी मिल रही है। किताब का कवर भी ऑनलाइन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म पर दिखाया जा रहा है, जैसे कि यह खरीदने के लिए उपलब्ध है। लेकिन किताब को प्रकाशित करने की जरूरी मंजूरी रक्षा मंत्रालय से अभी नहीं मिली है। इसलिए यह लीक या सुरक्षा नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है। उधर राहुल गांधी आज संसद के बाहर आए और उन्होंने जनरल नरवणे का पुराना ट्वीट दिखा दिया जिसमें वो साफ कहते हैं कि उनकी किताब छप गई है । इसके अलावा उन्होंने पब्लिकेशन के दावों पर सवाल उठाया।

संसद के भीतर और बाहर जो तस्वीर सामने आ रही है, वह किसी मजबूत लोकतंत्र की नहीं बल्कि एक डरी हुई और असहज सरकार की तस्वीर है। जिस सदन को जनता की आवाज़ बनने के लिए बनाया गया था, वही सदन आज सत्ता की ढाल बनता जा रहा है। विपक्ष सवाल पूछना चाहता है, लेकिन उसे बोलने नहीं दिया जा रहा। नेता प्रतिपक्ष अपनी बात रखना चाहते हैं, लेकिन माइक्रोफोन बंद कर दिए जाते हैं, कार्यवाही स्थगित कर दी जाती है और अनुमति लेने का तमाशा खड़ा कर दिया जाता है। यह सब कुछ बताता है कि सरकार को बहस से नहीं, सवालों से नहीं बल्कि सच से डर लगने लगा है। सबसे गंभीर बात यह है कि अब डर सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहा। एक किताब, महज कुछ पंक्तियाँ और एक पूर्व सेना प्रमुख के अनुभव सरकार के लिए इतना बड़ा खतरा बन गए कि उस पर एफआईआर तक दर्ज कर दी गई।

सवाल यह नहीं है कि किताब लीक हुई या नहीं, सवाल यह है कि अगर उसमें कुछ भी गलत नहीं है तो सरकार उसे लेकर इतनी घबराई क्यों दिख रही है? अगर सब कुछ साफ है तो बहस से भागने और किताब के नाम से कांपने की क्या जरूरत है? राहुल गांधी का यह कहना कि “हमें गिरफ्तार करके जेल में डाल दो” कोई भावनात्मक बयान भर नहीं है, बल्कि यह उस हताशा और पीड़ा की अभिव्यक्ति है जो आज विपक्ष के हर सांसद के भीतर है। जब संसद में बोलने का अधिकार भी सरकार की मर्जी से तय होगा, तो फिर लोकतंत्र और तानाशाही में फर्क ही क्या रह जाएगा?

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