भारत के सबसे बड़े नटवरलाल की कहानी संजय शर्मा की जुबानी

मामा-भांजे ने हड़पे हजारों करोड़ और डकार तक नहीं ली

  • ईडी/सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों की पकड़ से किलोमीटरों दूर
  • मुकेश अंबानी, केतन पारिख, कैरी पैकर और सुखराम के साथ बिजनेस डील के दस्तावेज
  • लेकिन ईडी/सीबीआई से दूर बजा रहे हैं चैन की बंसी

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। 4PM के संपादक संजय शर्मा 6 महीनों की कड़ी मेहनत और हजारो दस्तावेजों को खंगालने के बाद आज भारत के कारपोरेट गलियारों में भ्रष्टाचार कर हजारो करोड़ रूपयों को डकार जाने वाले ऐसे मामा-भांजे के रहस्य से पर्दा उठा रहे हैं जिन्हें घोटलेबाजों का शहनंशाह भी कहा जाए तो कम हैं। यह कहानी है महेन्द्र नाहटा और उनके भांजे विनय मालू की। एक ऐसा नेटवर्क जिसने भारत के टेलीकाम और निवेश जगत में अपनी गहरी उपस्थिति दर्ज कराई। और इस कहानी के केंद्र में कहीं न कहीं भारत के सबसे शक्तिशाली उद्योगपतियों में से एक मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाला वह दौर भी जुड़ता है जब भारत का टेलीकाम सेक्टर एक क्रांति के मुहाने पर खड़ा था। महेन्द्र नाहटा और विनय मालू की कहानी केवल दो नटवरलालों की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब भारत की अर्थव्यवस्था बदल रही थी और कुछ लोग इस बदलाव के केंद्र में थे। यह कहानी यह भी बताती है कि कारपोरेट दुनिया में ताकत कैसे बनती है। और कैसे कायम रहती है। इनके काले चिट्ठे यदि लिखें जाएं तो हजारो पेज कम पड़ जाएंंगें 1500 शब्दों में इनकी कहानी लिखना नामुमकिन हैं। यदि आप मामा भांजे के पूरे गणित को समझना चाहते है तो इस लिंक https://youtu.be/eBtMTin-EJQ?si=l}pVAjHHztiw-jjx पर जाकर संपादक संजय शर्मा के इस वीडियो को जरूर देखें ।

मामा भांजे की कमाल की जोड़ी

  • सुखराम भ्रष्टाचारों के राजा के साथ नाम आया
  • सेसेक्स का अपराधी केतन पारिख के साथ नाम आया
  • सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर रंजीत सिन्हा की डायरी में इनका नाम 98 बार आया
  • मुकेश अंबानी ने इन्ही लोगों के जरिये एनडीटीवी की डील की और शेयर ट्रांसफर हुए।
  • 2008-2009 के बीच हुए यूनीटेक टेलीकॉम घोटाला में भी इनका नाम आया।

सुखराम से लेकर केतन पारिख तक

1990 से लेकर वर्ष 2000 तक भारत में जितनी भी भ्रष्टाचारी गतिविधिया हुई उसमें इन मामा भाजे का इन्वालमेंट सीधा बताया जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन सिंह कहते हैं कि 1987 में हिमाचल प्रदेश में एक कंपनी बनाई गयी एचसीएफएल और इसके डायरेक्टर बने महेन्द्र नाहटा। कंपनी टेलीकाम सेक्टर में काम करने के लिए बनाई गयी थी। हिमाचल में रजिस्ट्रेशन था। कंपनी बनने के 13 साल बाद कैरी पैकर एक हजार पचास करोड़ रूपये का सीधे निवेश कर 10 परसेंट कि हिस्सेदारी हासिल कर लेते हैं। सोचने की बात है कि जिस कपंनी की हैसियल 400 करोड़ रूपये भी नहीं थी। उसकी कंपनी में सीधे एक विदेशी ने हजारों करोड़ रूपये का निवेश किया।

मौन हैं सेबी के अधिकारी

आर्थिक मामलों के जानकार राजीव रंजन सिंह कहते हैं कि यदि कोई एक हजार की चोरी करता है तो उसे पुलिस जेल में डाल देती है लेकिन हजारो करोड़ रूपये की चोरी करने वाले इन मामा भांजे पर कोई केस नहीं बनाता। यह लोग हर बार फ्राड करते हैं और थोड़ा सा जुर्माना लगा कर इनका मामला सेटल कर दिया जाता है। वह कहते हैं कि ताआज्जुब की बात है कि घोटालों की जद में आये तमाम भ्रष्टाचारी जेल गये। मुकदमें हुए लेकिन यह मामा-भांजे आज भी आजाद घूम रहे हैं कभी दुबई कभी लंदन जब चाहते हैं जहां चाहते हैं वहां जाते हैं।

अरबों की धनराशि दांव पर

1990 का दशक भारत की अर्थव्यवस्था के लिए उदारीकरण का दौर था। लाइसेंस खुल रहे थे निवेश आ रहा था और टेलीकॉम सेक्टर में भविष्य के अरबों रुपये दांव पर लगे थे। इसी दौर में हिमाचल की एक कंपनी एचएफसीएल अचानक सुर्खियों में आ गई। यह कंपनी केवल टेलीकाम उपकरण नहीं बना रही थी बल्कि वह उस भविष्य की नींव रख रही थी जिसमें मोबाइल फोन हर हाथ में होने वाला था। एचएफसीएल का उदय केवल कारोबारी सफलता की कहानी नहीं था। यह उस दौर का प्रतीक था जब बाजार सरकार और निवेशक तीनों एक नए आर्थिक ताने-बाने में जुड़ रहे थे। कंपनी ने तेजी से पूंजी जुटाई, बड़े विदेशी निवेश आकर्षित किए और भारत के टेलीकाम विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौरान भारत में टेलीकाम लाइसेंस, शेयर ट्रांसफर निवेश संरचना और कॉरपोरेट गठजोड़ को लेकर कई सवाल भी उठे। कई कारोबारी घरानों के बीच साझेदारी और प्रतिस्पर्धा दोनों चल रही थीं। रिलांयस जैसे बड़े समूह टेलीकॉम सेक्टर में अपनी जगह बना रहे थे और इस पूरी प्रक्रिया में कई छोटे-बड़े कारोबारी नेटवर्क भी उभर रहे थे। महेन्द्र नाहटा और विनय मालू का नाम इसी कारोबारी नेटवर्क के संदर्भ में चर्चा में आया है। इन दोनों लोगों का कारोबारी विस्तार भारत से बाहर दुबई, लंदन और सिंगापुर तक फैला बताया जाता है। निवेश टेलीकाम, इंफ्रास्ट्रक्चर और अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग। इन सभी क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति ने उन्हें कारपोरेट भारत के प्रभावशाली खिलाडिय़ों में शामिल कर दिया। यह कहानी केवल दो व्यक्तियों की नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है जहां कारपोरेट ताकत, राजनीतिक माहौल और आर्थिक अवसर तीनों मिलकर एक ऐसा जाल बनाते हैं जिसमें कुछ नाम सुर्खियों में आते हैं और कुछ हमेशा पर्दे के पीछे रह कर चैन की बंसी बजाते रहते हैं और यह लोग महेन्द्र नाहटा और विनय मालू जैसे लोग होते हैं।

किसका वरदहस्त है मामा-भांजे पर

मामा-भांजे का काम करने का सेट पैर्टन हैं। यह लोग पहले कंपनी बनाते हैं। कंपनी में रैजूलेशन पास करते हैं पैसा लाने की। फिर यह विदेश से पैसा लाते हैं, फिर देश और उसके बाद बैंक के पास लोन लेने चले जाते हैं। यह लोग अपने पास से एक भी रूपया नहीं लगाते। इसके बाद अपनी प्रोमेटर कंपनी में पैसों को भेज देते हैं। यह कंपनियां सिंगापुर, हांगकांग आदि में होती है। जिस कंपनी के लिए इन्होंने निवेश अर्जित किया लोन लिया वह कंपनी खोखली हो जाती है। उसके बाद डायरेक्टर के पद से इस्तीफा दे देते हैं और अपने नीचे के व्यक्ति को डायरेक्टर बना कर बिठा देते है। और कपंनी बंद कर दिवालिया घोषित कर देते हैं।

पीएमओ में हिमाचल कैडर का अधिकारी और मुकेश अंबानी

सूत्रों की माने तो विनय मालू अक्सर पीएमओ में तैनात हिमाचल कैडर के एक अधिकारी का नाम लेकर कहते सुनाई दिये हैं कि उनकी मदद वहां से हो रही है कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। महेन्द्र नाहटा मुकेश अंबानी की कंपनी रिलांयस इंडस्ट्री में उच्च पद पर काम कर रहे हैं और यूपी उनके अधिकार क्षेत्र में हैं कहते हैं कि रिलांयस में नाहटा की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन सिंह रहस्य की परतों से पर्दा हटाते हुए बताते हैं कि किस तरह से महेन्द्र नाहटा मुकेश अंबानी की आंख, नाक कान बने हुए हैं। वह कहते हैं कि इंफोटल नाम की कंपनी को 4जी का लाइसेंस मिलता है। यह कंपनी महेन्द्र नाहटा की कपंनी थी। इसके बाद इस कंपनी में पांच हजार करोड़ से ज्यादा की रकम मुकेश अंबानी डाल देते हैं। इससे महेन्द्र नाहटा के शेयर एक परसेंट और मुकेश अंबानी के शेयर कंपनी में 99 परसेंट तक पहुंच गये सीधे शब्दों में कहा जाए तो 4जी का लाइसेंस तो महेन्द्र नहाटा को मिलता है लेकिन बैक डोर से इसके मालिक मुकेश अंबानी बन जाते हैं।

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