4PM को डराने की एक और कोशिश जमींदोज

अदालत का स्पष्ट संदेश कानून राजनीतिक हथियार नहीं

  • धमकियां, मुकदमें, ट्रोलिंग सब धराशाई 4PM न झुका है न झुकेगा
  • बीजेपी अल्संख्यक मोर्चा के तथाकथित जिला प्रभारी ने 4पीएम के खिलाफ दायर किया था मुकदमा
  • सत्ता के समर्थन में मुकदमे करना बना एक नया राजनीतिक फैशन

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। 4पीएम न डरा है और न ही इसे डराया जा सकता है। 4पीएम न ही झुका है और न ही इसे झुकाया जा सकता है। पाठकों एक बार फिर 4पीएम को उसकी बेबाक खबरों के कारण बीजेपी अल्पसंख्या मोर्चा के एक तथाकथित पदाधिकारी द्वारा अदालत में घसीटा गया और बेसिर पैर के आरोप लगाये गये। लेकिन पदाधिकारी एक न चली और अदालत ने उनके आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने सत्ता समर्थकों द्वारा मुकदमों को हथियार बनाकर विरोध की आवाज को दबाने की कोशिशों की असलियत को बेनकाब कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह 4पीएम के विरूद्ध दायर इस मुकदमा न केवल निरर्थक है बल्कि इसमें कोई वास्तविक कारण-ए-कार्रवाई भी मौजूद नहीं है।

लोकतंत्र में आलोचना अपराध नहीं, अधिकार है

लोकतंत्र का मतलब ही यह है कि जनता और मीडिया सरकार से सवाल पूछ सकें। प्रधानमंत्री कोई राजा नहीं हैं बल्कि जनता के सेवक हैं। संवैधानिक संस्थाएं आलोचना से ऊपर नहीं हैं। अगर सरकार या संस्थाओं की आलोचना को अपराध बना दिया जाएगा तो लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा। यह फैसला इस बात की पुष्टि करता है कि अदालतें अभी भी लोकतंत्र की अंतिम रक्षा पंक्ति हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसे मुकदमे दायर करने की जरूरत क्यों पड़ती है? अगर सरकार और उसके समर्थक अपने काम और नीतियों पर भरोसा करते हैं तो उन्हें आलोचना से डरने की जरूरत क्यों है? क्यों पत्रकारों, यूट्यूबरों और व्हिसलब्लोअर्स को अदालतों में घसीटा जाता है? क्या यह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है या फिर उसकी कमजोरी का?

बीजेपी पदाधिकारी बन गया संवैधानिक संस्थाओं का ठेकेदार

इस मुकदमे की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस मुकदमे को दायर करने वाला व्यक्ति खुद को भारतीय जनता पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा का जिला प्रभारी बता रहा था। उसने आरोप लगाया कि 4पीएम न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड, गूगल एलएलसी, मेटा प्लेटफार्मस् इनकारपोरेशन और एक्स कार्प जैसे प्लेटफार्म पर ऐसे वीडियो प्रकाशित किए गए जिनसे प्रधानमंत्री, चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई राजनीतिक कार्यकर्ता स्वयं प्रधानमंत्री या संवैधानिक संस्थाओं का कानूनी प्रतिनिधि बन सकता है? अदालत ने साफ कहा नहीं। अदालत ने पाया कि वादी ने ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि उसे पीएम नरेंद्र मोदी या चुनाव आयोग या किसी संवैधानिक संस्था की ओर से मुकदमा दायर करने का अधिकार दिया गया है। यह मुकदमा कानून नहीं बल्कि राजनीतिक भावना और व्यक्तिगत निष्ठा के आधार पर दायर किया फिजूल का अरोप था।

खतरनाक प्रवृत्ति पर न्यायपालिका की कड़ी टिप्पणी

यह फैसला सिर्फ एक मुकदमे की अस्वीकृति नहीं है बल्कि यह उस खतरनाक प्रवृत्ति पर न्यायपालिका की कड़ी टिप्पणी है जिसमें राजनीतिक कार्यकर्ता खुद को राष्ट्र और संवैधानिक संस्थाओं का स्वयंभू संरक्षक घोषित कर देते हैं और फिर आलोचकों को अदालत के जरिए डराने की कोशिश करते हैं। अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के ऐतिहासिक फैसले टी. अरविंदानदम बनाम टी.वी. सत्यपाल का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोई मुकदमा पहली नजर में ही निराधार और दुर्भावनापूर्ण दिखता है तो उसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर देना चाहिए। यह टिप्पणी केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है।

अदालत का स्पष्ट संदेश ‘कानून राजनीतिक हथियार नहीं है’

न्यायाधीश शैलेश कुमार सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वादी ने ऐसा कोई तथ्य प्रस्तुत नहीं किया जिससे यह साबित हो कि उसके किसी व्यक्तिगत कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ है। यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह बताती है कि अदालतें अब यह समझने लगी हैं कि मुकदमे केवल न्याय के लिए नहीं बल्कि उत्पीडऩ के लिए भी दायर किए जा सकते हैं। कोर्ट ने यह भी पाया कि वादी की शिकायत मुख्य रूप से पीएम और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर थी न कि उसके अपने व्यक्तिगत नुकसान को लेकर। यानी यह मुकदमा राजनीतिक निष्ठा के लिए दायर किया गया था।

सत्ता के समर्थन में मुकदमे करना एक नया चलन

पिछले कुछ वर्षों में यह एक खतरनाक ट्रेंड बन गया है कि जैसे ही कोई पत्रकार, यूट्यूबर या सामाजिक कार्यकर्ता सरकार या प्रधानमंत्री की आलोचना करता है तो अचानक कोई न कोई बीजेपी कार्यकर्ता अदालत पहुंच जाता है। यह मुकदमे अक्सर व्यक्तिगत मानहानि के नहीं होते बल्कि राष्ट्र, संविधान, और प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा के नाम पर दायर किए जाते हैं। अब यह सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र में प्रधानमंत्री या सरकार की आलोचना करना अपराध है? अगर नहीं तो फिर ऐसे मुकदमे दायर किये जाते हैं? जबकि सच्चाई यह है कि इन मुकदमों का उद्देश्य न्याय नहीं बल्कि जनहित में कार्य करने वाले व्यक्ति/संस्था का उत्पीडऩ करना होता है। यह मुकदमे एक कानूनी हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं ताकि पत्रकारों, यूट्यूबरों और व्हिसलब्लोअर्स को डराया जा सके उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पर मजबूर किया जा सके और उनकी आवाज को कमजोर किया जा सके।

व्हिसलब्लोअर्स और पत्रकारों के खिलाफ मुकदमों की बाढ़

केन्द्र में बीजेपी सरकार के आने और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद ऐसे मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। पत्रकारों पर मुकदमे दर्ज करना, यूट्यूब चैनलों को नोटिस भेजना और सोशल मीडिया पोस्ट पर एफआईआर दर्ज करना अब यह सब अब आम बात हो चुकी है। यह एक नया माडल है आलोचना करो, मुकदमा झेलो। यह लोकतंत्र नहीं बल्कि भय का वातावरण है। व्हिसलब्लोअर्स जो सत्ता की गलतियों को उजागर करते हैं उन्हें देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी और अपराधी साबित करने की कोशिश की जाती है। लेकिन इस बार अदालत ने इस प्रवृत्ति को पहचान लिया। यह फैसला उन लोगों के लिए एक करारा झटका है जिन्होंने मुकदमों को एक राजनीतिक हथियार बना लिया है। यह एक स्पष्ट संदेश है कि अदालतें राजनीतिक भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि कानून और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेंगी। यह फैसला बताता है कि अदालतें सत्ता के दबाव में नहीं बल्कि संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं।

लोकतंत्र की जीत है मुकदमे का फैसला

लखनऊ की इस अदालत का फैसला केवल एक तकनीकी कानूनी आदेश नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा का फैसला है। यह फैसला बताता है कि अदालतें अभी भी सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ खड़ी हैं। यह फैसला उन सभी पत्रकारों, यूट्यूबरों और व्हिसलब्लोअर्स के लिए उम्मीद की किरण है जो सच बोलने की कीमत चुका रहे हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह फैसला सत्ता को यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में मुकदमे नहीं बल्कि जवाबदेही चलती है। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं अधिकार है।

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