Bhupen Borah के इस्तीफा वापस लेने से बौखलाए CM Himanta Biswa Sarma
भाजपा के तेज तर्रार नेता और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की बौखलाहट उठे हैं और वो मानने को तैयार ही नहीं है कि कांग्रेस ने उनका दिया ऑफर ठुकरा दिया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भाजपा के तेज तर्रार नेता और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की बौखलाहट उठे हैं और वो मानने को तैयार ही नहीं है कि कांग्रेस ने उनका दिया ऑफर ठुकरा दिया.
जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चहेते कहे चाने वाले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने मीडिया के सामने इस बात को मानने से साफ इनकार कर दिया है……तो आखिर कांग्रेस के किस नेता ने भाजपा के पार्टी ज्वाइन करने के ऑपर को किया रिजेक्ट…जिससे मीडिया के सामने बौखला उठे सीएम हिमंता बिस्वा सरमा.
असम की राजनीति में इन दिनों जो सियासी ड्रामा चल रहा है…उसने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि…आखिर किसे किसकी ज्यादा चिंता है?…असम कांग्रेस के पूर्व प्रमुख भूपेन बोरा का इस्तीफ़ा…फिर उसका वापस लिया जाना और उसके बाद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का बयान…इन सब ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है….
दरअसल, बीते कल असम में कांग्रेस नेता भूपेन बोरा ने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था….इस कदम को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं…एक ओर विपक्षी खेमे में हलचल थी…तो दूसरी ओर सत्ताधारी दल की ओर से भी बयानबाज़ी शुरू हो गई…लेकिन कुछ ही समय बाद पूरा मामला ही पलट गया…असम कांग्रेस प्रभारी ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये साफ किया कि…भूपेन बोरा ने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया है और वो संगठन में अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे…यानी जो मामला कांग्रेस के भीतर का था…वह सुलझ भी गया…लेकिन यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया…
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि…उन्हें नहीं लगता कि भूपेन बोरा ने इस्तीफ़ा वापस लिया है…उन्होंने ये भी बताया कि उन्होंने भूपेन बोरा से फोन पर बात की है और उन्हें शाम 7 बजे अपने घर बुलाया है…इतना ही नहीं, उन्होंने खुलकर कहा कि वे चाहते हैं कि भूपेन बोरा BJP में शामिल हों…क्योंकि उनके अनुसार वे असम में कांग्रेस के आखिरी हिंदू नेता हैं….
सीएम हिमंता मानने को तैयार ही नहीं है कि भूपेन बोरा ने उनका ऑफर रिजेक्ट करके कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को दिया गया अपना इस्तीफा वापस ले लिया है…बस यहीं से सवाल खड़ा होता है कि…जब कांग्रेस प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर साफ कर चुके थे कि…इस्तीफ़ा वापस ले लिया गया है….तो फिर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को नहीं लगता….क्यों लग रहा था?…क्या ये महज जानकारी की कमी थी…या फिर राजनीतिक रणनीति?….
तो इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि…सीएम हिमंता ने भूपेन बोरा को BJP जॉइन करने का सीधा ऑफर दिया था…लेकिन जब ये ऑफर एक्सेप्ट नहीं हुआ…तो उसके बाद मुख्यमंत्री साहब बौखला उठे कि…क्योंकि उनकी कांग्रेस को तोड़ने की रणनीति जो फेल हो गई थी…तभी तो उनका बयान काफी तीखा और असहज नजर आया…यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि…अगर कोई नेता अपने दल में रहना चाहता है…तो उसमें इतनी बेचैनी क्यों?…क्या किसी विपक्षी नेता का अपने दल में बने रहना इतना डरा देने जैसा है?….
क्योंकि जब सीएम हिमंता कहते हैं कि…वो चाहते हैं कि भूपेन बोरा BJP में आएं…क्योंकि वो कांग्रेस के आखिरी हिंदू नेता हैं…तो ये बयान कहीं न कहीं खुद कई सवालों को जन्म देता है…और सवाल उठता है कि क्या राजनीति अब पूरी तरह धार्मिक पहचान के चश्मे से देखी जाएगी?…क्या किसी नेता की पहचान उसके काम, उसके संगठनात्मक कौशल और उसकी विचारधारा से नहीं….बल्कि सिर्फ उसके धर्म से तय होगी?…
यानी मामला तो कांग्रेस के भीतर का था…लेकिन बेचैनी सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के चेहरे पर दिखाई दे रही थी…क्योंकि, भूपेन बोरा का इस्तीफ़ा देना और वापस लेना….ये पूरी तरह कांग्रेस का आंतरिक मामला था….पार्टी ने अपनी प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया और उसे सबके सामने भी रखा…लेकिन सीएम हिमंता की ओर से जिस तरह लगातार बयान दिए गए…उससे ऐसा लगा मानो ये मामला उनके लिए खुद की प्रतिष्ठा का सवाल बन गया हो…अगर वास्तव में मुख्यमंत्री को लगता था कि…इस्तीफ़ा वापस नहीं लिया गया है…तो वो पहले आधिकारिक पुष्टि कर सकते थे…लेकिन सीधे ये कहना कि वो चाहते हैं कि बोरा BJP में शामिल हों…ये साफ संकेत देता है कि…मामला सिर्फ जानकारी का नहीं…बल्कि राजनीतिक अवसर का था…
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का ये कहना कि…भूपेन बोरा असम में कांग्रेस के आखिरी हिंदू नेता हैं…एक बड़ा राजनीतिक मैसेज देता है…ये बयान सीधे तौर पर कांग्रेस को एक खास धार्मिक पहचान में सीमित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है…ऐसे में सवाल उठे कि…क्या ये एक्सेप्टेबल है कि BJP की राजनीति अब विपक्ष को भी धार्मिक आधार पर तोड़ने की कोशिश कर रही है?….और क्या ये संदेश है कि जो नेता किसी खास धर्म से हैं….उन्हें BJP में आ जाना चाहिए?…….इस बयान से ये भी सवाल उठता है कि क्या असम की राजनीति में अब मुद्दे….जैसे बेरोज़गारी, महंगाई, बाढ़ और बुनियादी ढांचा…दूसरे पायदान पर चले गए हैं और धर्म आधारित पहचान ही मेन हथियार बन चुका है?….
इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि…जब किसी नेता को BJP में शामिल होने का ऑफर दिया जाता है और वो उसे स्वीकार नहीं करता…तो उसके बाद सत्ताधारी दल की भाषा बदल जाती है…पहले सम्मान और स्वागत की बात होती है….लेकिन मना करने के बाद सवाल और तंज शुरू हो जाते हैं….भूपेन बोरा के मामले में भी कुछ ऐसा ही दिखाई दिया….जहां पहले उन्हें BJP में शामिल होने का न्योता और फिर सार्वजनिक मंच से बयान कि इस्तीफ़ा वापस नहीं लिया गया है…ये संकेत देता है कि शायद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को उम्मीद थी कि…वो इस मौके का फायदा उठा लेंगे…लेकिन, जब ऐसा नहीं हुआ…तो राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई…
जो कि कहीं न कहीं ये दिखाता है कि शायद भूपेन बोरा की ओर से भाजपा का ऑफर एक्सेप्ट न करने की वजह से सीएम हिमंता के अंदर आत्मविश्वास की कमी हो गई है…एक मजबूत सरकार और आत्मविश्वासी मुख्यमंत्री आमतौर पर विपक्ष के आंतरिक मामलों में इस तरह सार्वजनिक दखल नहीं देते…वो अपने काम और नीतियों पर फोकस करते हैं….लेकिन यहां जिस तरह बार-बार बयान दिए गए…उससे ये माना जा रहा है कि…विपक्ष के एक नेता का निर्णय भी सत्ता पक्ष को असहज कर रहा है….अगर सरकार मजबूत है….तो विपक्ष के एक नेता का इस्तीफ़ा देना या वापस लेना इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन गया?…..
आम जनता के लिए ये पूरा मामला कई संकेत देता है…पहला कि राजनीति में दल बदल को सामान्य बनाने की कोशिश…दूसरा कि धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक समीकरण गढ़ना और तीरसा…विपक्ष को कमजोर करने के लिए सार्वजनिक बयानबाज़ी का इस्तेमाल…ऐसे में जनता ये भी देख रही है कि जब भूपेन बोरा ने BJP में जाने से इनकार किया…तो उसके बाद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की बौखलाहट साफ नजर आई…इससे ये आम जनता के बीच संदेश गया कि ऑफर स्वीकार होता तो शायद कहानी कुछ और होती…
लोकतंत्र में हर नेता को ये अधिकार है कि…वो अपनी पार्टी में रहे या छोड़े…ये उसका व्यक्तिगत और राजनीतिक निर्णय होता है…लेकिन अगर किसी निर्णय को लेकर दबाव, बयानबाज़ी या धार्मिक पहचान का सहारा लिया जाए…तो ये एक Healthy राजनीति का संकेत नहीं माना जा सकता…भूपेन बोरा ने अगर इस्तीफ़ा दिया और फिर वापस लिया…तो ये कांग्रेस की आंतरिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है…लेकिन इसे लेकर मुख्यमंत्री का इस तरह सक्रिय होना ये दिखाता है कि…अब मामला सिर्फ एक इस्तीफ़े का नहीं…बल्कि राजनीतिक गणित का था….
इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि…आखिर ज्यादा बेचैनी किसे है?…कांग्रेस को….जिसने अपना मामला सुलझा लिया?….या फिर सत्ता पक्ष को…जिसे उम्मीद थी कि विपक्ष का एक बड़ा चेहरा उनके खेमे में आ जाएगा?….क्योंकि जब ऑफर ठुकरा दिया गया…तो बयानबाज़ी तेज हो गई…इससे ये माना जा रहा है कि…सीएम हिमंता इससे असहज हो गए थे…
असम की जनता अब ये देख रही है कि क्या राजनीति विकास और मुद्दों पर होगी…या फिर धार्मिक पहचान और दल बदल की रणनीतियों पर…भूपेन बोरा का इस्तीफ़ा और वापसी भले ही एक राजनीतिक घटना हो…लेकिन उस पर आई प्रतिक्रियाओं ने ये साफ कर दिया है कि असम की राजनीति में अंदरखाने बहुत कुछ चल रहा है…ऐसे में आखिर में सवाल वही है कि…अगर सब कुछ ठीक था….नॉर्मल था….तो सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के चेहरे पर इतनी बेचैनी क्यों दिखी?



