गुजरात में ‘Marriage Act 2006’ पर सियासी बवाल | क्या निजता में दखल देगी BJP?

गुजरात में ‘Marriage Act 2006’ में प्रस्तावित संशोधन को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है... विपक्ष का आरोप है कि...  

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात सरकार ने फरवरी 2026 में एक ऐसा प्रस्ताव पेश किया है.. जो पूरे देश में बहस का विषय बन गया है.. गुजरात रजिस्ट्रेशन ऑफ मैरिजेज एक्ट.. 2006 में संशोधन के तहत अब शादी का पंजीकरण कराने के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य होगी.. अगर कोई जोड़ा शादी रजिस्टर कराना चाहता है.. तो उन्हें आवेदन के साथ माता-पिता के संपर्क विवरण देना होगा.. और यह बताना होगा कि उन्होंने अपने माता-पिता को शादी के बारे में सूचित किया है या नहीं..

रजिस्ट्रार को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह आवेदन मिलने के 10 दिनों के भीतर माता-पिता को व्हाट्सऐप.. एसएमएस या अन्य माध्यम से सूचना भेजे.. इसके बाद 30 दिनों की सत्यापन अवधि होगी.. जिसमें दस्तावेजों की जांच की जाएगी.. और फिर ही मैरिज सर्टिफिकेट जारी होगा.. वहीं यह प्रस्ताव विधानसभा में उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी ने पेश किया.. जो इसे महिलाओं की सुरक्षा और लव जिहाद जैसे मामलों से बचाव का कदम बता रहे हैं.. लेकिन आलोचक इसे वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला मानते हैं.. जो संविधान के खिलाफ है.. यह गुजरात को पहला ऐसा राज्य बना सकता है.. जहां सभी मैरिज रजिस्ट्रेशन में माता-पिता को सूचना देना अनिवार्य होगा..

वहीं इस प्रस्ताव की शुरुआत समझने के लिए हमें गुजरात की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर नजर डालनी होगी.. आपको बता दें कि गुजरात में भाजपा की सरकार लंबे समय से है.. और वह सामाजिक मुद्दों पर सख्त रुख अपनाती रही है.. 2021 में ही गुजरात ने लव जिहाद विरोधी कानून बनाया था.. जो अंतर-धार्मिक विवाहों पर जांच का प्रावधान करता है.. वहीं अब यह नया संशोधन उसी दिशा में एक कदम आगे लगता है.. उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी ने विधानसभा में कहा कि राज्य में लव जिहाद जैसे मामले बढ़ रहे हैं..

जहां कुछ लोग अपना नाम बदलकर लड़कियों को फंसाते हैं.. उन्होंने पंचमहाल जिले के दो गांवों का उदाहरण दिया.. जहां कोई मुस्लिम परिवार नहीं है.. लेकिन वहां से सैकड़ों निकाहनामा जारी हुए हैं.. जिसको लेकर सांघवी का कहना है कि मौजूदा नियमों का दुरुपयोग भागकर शादी करने वालों द्वारा किया रहा है.. इसलिए माता-पिता को सूचित करना जरूरी है..

ताकि धोखाधड़ी रोकी जा सके.. आपको बता दें कि यह प्रस्ताव विधानसभा के नियम 44 के तहत पेश किया गया.. जिसे सार्वजनिक महत्व का मुद्दा बताया गया.. सरकार का कहना है कि यह बदलाव सामाजिक संगठनों की मांग पर आधारित है.. जो सनातन परंपराओं की रक्षा करना चाहते हैं.. लेकिन क्या वाकई ऐसी कोई बड़ी मांग थी.. अब तक कोई बड़ा आंदोलन या प्रदर्शन इस मुद्दे पर नहीं देखा गया..

वहीं अगर सरकार के तर्कों को और गहराई से समझें.. तो हर्ष सांघवी ने इसे महिलाओं की सुरक्षा से जोड़ा है.. उनका कहना है कि कई मामलों में लड़कियां धोखे का शिकार होती हैं.. जहां पुरुष अपना नाम या पहचान छिपाते हैं.. ऐसे में माता-पिता को सूचित करने से परिवार लड़की को सलाह दे सकता है.. और जरूरी जांच हो सकती है.. उदाहरण के तौर पर, बनासकांठा, नवसारी और मेहसाणा जैसे जिलों में फर्जी दस्तावेजों से शादियां रजिस्टर होने की शिकायतें आई हैं.. सरकार का मानना है कि यह नियम संपत्ति, दहेज.. और जबरदस्ती से जुड़े उत्पीड़न को भी रोकेगा.. साथ ही, यह सांस्कृतिक आक्रमण को रोकने का कदम है.. जैसा कि सांघवी ने कहा कि प्यार से किसी को आपत्ति नहीं..

लेकिन अगर कोई सलीम सुरेश बनकर लड़की को फंसाएगा.. तो उसे छोड़ा नहीं जाएगा.. यह बयान सीधे लव जिहाद की थ्योरी से जुड़ता है.. जो दक्षिणपंथी समूहों द्वारा प्रचारित की जाती है.. हालांकि, केंद्र सरकार और अदालतों ने लव जिहाद को आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है.. फिर भी गुजरात में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से गर्म है.. कुछ सामाजिक संगठन, जैसे पटेल और ठाकोर समुदाय, पहले से ही ऐसे नियम लागू कर चुके हैं.. खेड़ा जिले के नंद गांव में ग्राम सभा ने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी पर सामाजिक बहिष्कार का फरमान जारी किया है.. पटेल सेंटर ने मांग की है कि 30 साल से कम उम्र वालों के लिए माता-पिता के हस्ताक्षर अनिवार्य हो.. और कोर्ट मैरिज दुल्हन के इलाके में ही हो..

लेकिन इस प्रस्ताव की आलोचना भी कम नहीं है.. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह नियम लव मैरिज, खासकर अंतर-धार्मिक या अंतर-जातीय विवाहों के लिए बाधा बनेगा.. आलोचक कहते हैं कि यह वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है.. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन.. और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है.. जिसमें जीवनसाथी चुनने की आजादी शामिल है..

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि दो वयस्कों की सहमति से शादी में परिवार या राज्य का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.. उदाहरण के तौर पर 2018 के हदिया केस में अदालत ने कहा कि वयस्क महिला अपनी मर्जी से शादी कर सकती है.. भले ही परिवार विरोध करे.. इसी तरह 2017 के पुट्टास्वामी फैसले में निजता को मौलिक अधिकार माना गया.. अब अगर माता-पिता को अनिवार्य सूचना दी जाएगी.. तो परिवार से दबाव, हिंसा या ऑनर किलिंग की आशंका बढ़ सकती है.. गुजरात में पहले से ही अंतर-जातीय जोड़ों को परेशान करने के मामले सामने आते रहे हैं.. एक दलित व्यक्ति ने बताया कि उसकी दरबार समुदाय की महिला से शादी के बाद उन्हें 50 बार घर बदलना पड़ा.. और स्थिर नौकरी नहीं मिली..

 

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