नफरती भाषा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त | क्या BJP नेताओं पर होगी बड़ी कार्रवाई?
देश में बढ़ती नफरती भाषा और भड़काऊ बयानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है.. सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः देश में बढ़ती नफरती भाषा और भड़काऊ बयानों को लेकर.. सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है.. हालिया सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर.. समाज में विभाजन फैलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती.. कोर्ट ने चिंता जताई कि इस तरह के बयान सामाजिक सौहार्द.. और कानून व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं.. न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि नफरती भाषण पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई जरूरी है.. ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा हो सके.. अदालत की टिप्पणी के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है.. वहीं अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि.. संबंधित मामलों में आगे क्या कदम उठाए जाते हैं.. और क्या इससे सार्वजनिक विमर्श की भाषा में बदलाव आएगा..
बता दें कि भारतीय जनता पार्टी नफरती भाषण देने के मामले में टॉप है.. नफरती भाषण देने के मामले में चाहे मोदी, योगी, हिमंता विस्वा सरमा, गिरिराज सिंह सहित तमाम नेताओं ने रिकार्ड तोड़ दिया है.. वहीं अब सुप्रीम कोर्ट के फैंसले का भारतीय जनता पार्टी पर कोई असर पड़ेगा.. क्योंकि बीजेपी नेताओं का जहरीला बयान देने का इतिहास रहा है.. और सबसे ज्यादा जहरीला बयान असम के मुख्यमंत्री हिमंता विस्ला सरमा देते रहें है.. लेकिन कभी भी कोर्ट ने कोई एक्शन नहीं लिया.. आपको बता दें कि बीजेपी के नेता चुनाव के समय ज्यादा नफरती भाषण देते हैं.. और टॉप पर है..
आपको बता दें कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी व्यक्ति.. चाहे वह सरकारी हो या गैर-सरकारी, भाषण, मीम, कार्टून या किसी भी तरह की.. विजुअल कला के माध्यम से किसी समुदाय को बदनाम या अपमानित नहीं कर सकता.. यह संविधान के खिलाफ है और ऐसा करना पूरी तरह से गलत माना जाएगा.. कोर्ट ने विशेष रूप से मंत्रियों और उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को चेतावनी दी.. कि उन्हें धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी समुदाय को निशाना नहीं बनाना चाहिए.. यह टिप्पणी हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के भाषणों से जुड़े विवाद के संदर्भ में और भी उचित हो जाती है.. सुप्रीम कोर्ट ने सरमा के खिलाफ हेट स्पीच की शिकायत वाली याचिकाओं पर सीधे सुनवाई करने से इनकार कर दिया.. और याचिकाकर्ताओं को गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने को कहा.. जानकारी के मुताबिक यह फैसला 19 फरवरी को आया.. जब कोर्ट एक नेटफ्लिक्स फिल्म के टाइटल से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहा था..
वहीं यह सब एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) से शुरू हुआ.. जो नेटफ्लिक्स की फिल्म घूसखोर पंडित के टाइटल पर आपत्ति जताते हुए दाखिल की गई थी.. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि पंडित शब्द ब्राह्मण समुदाय से जुड़ा है.. जो पुजारी को दर्शाता है.. और इसे घूसखोर (रिश्वतखोर) के साथ जोड़ना समुदाय को अपमानित करता है.. जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की.. सुनवाई के दौरान, फिल्म के निर्माताओं ने टाइटल बदलने.. और प्रोमोशनल सामग्री से हटाने पर सहमति जताई.. जिसके बाद कोर्ट ने मामले को बंद कर दिया.. लेकिन जस्टिस भुयान ने अलग से अपना फैसला लिखा.. जिसमें उन्होंने संविधान की मूल भावना पर जोर दिया.. और उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है..
लेकिन इसका इस्तेमाल किसी समुदाय को नीचा दिखाने के लिए नहीं किया जा सकता.. उन्होंने संविधान की प्रस्तावना का जिक्र किया.. जिसमें भाईचारे को बुनियादी उद्देश्य बताया गया है.. जस्टिस भुयान ने कहा कि यह संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है कि.. कोई भी, चाहे राज्य का व्यक्ति हो या गैर-राज्य का, भाषणों, मीम्स, कार्टून्स या विजुअल आर्ट्स के माध्यम से किसी समुदाय को अपमानित करे.. यह टिप्पणी सिर्फ फिल्म के टाइटल तक सीमित नहीं थी.. बल्कि व्यापक रूप से लागू होती है.. जिसमें सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोग भी शामिल हैं..
आपको बता दें कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उच्च पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी ज्यादा है.. जस्टिस भुयान ने कहा कि मंत्रियों जैसे लोग, जो संवैधानिक शपथ लेते हैं.. उन्हें विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए.. वे किसी समुदाय को धर्म, जाति या भाषा के आधार पर निशाना नहीं बना सकते.. क्योंकि यह संविधान की भावना का उल्लंघन है.. उन्होंने अनुच्छेद 51ए(ई) का हवाला दिया.. जो हर नागरिक का कर्तव्य बताता है कि वह सभी लोगों के बीच सद्भाव और भाईचारे को बढ़ावा दे..
जस्टिस ने इसे संवैधानिक धर्म कहा.. यानी एक ऐसा कर्तव्य जो हर व्यक्ति को निभाना चाहिए.. और उन्होंने कहा कि साथी नागरिकों के प्रति सम्मान और आदर की भावना रखना.. चाहे उनकी जाति, धर्म या भाषा कुछ भी हो.. यह हम सबका संवैधानिक कर्तव्य है.. यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न सिर्फ सरकारी अधिकारियों पर लागू होता है.. बल्कि गैर-सरकारी लोगों, जैसे कलाकारों, लेखकों या सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं पर भी.. कोर्ट ने साफ कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया नहीं जाना चाहिए.. लेकिन अगर यह किसी समुदाय को अपमानित करती है.. तो उस पर रोक लगनी चाहिए..
आपको बता दें कि यह टिप्पणी असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मामले से सीधे जुड़ी हुई लगती है.. हाल ही में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत की अगुवाई वाली बेंच ने सरमा के खिलाफ हेट स्पीच की याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया… याचिकाकर्ताओं में सीपीआई(एम), सीपीआई और अन्य शामिल थे.. जिन्होंने आरोप लगाया कि सरमा ने मुस्लिम समुदाय, खासकर बंगाली मूल के मुसलमानों के खिलाफ नफरत भरे भाषण दिए.. एक याचिका में एक एआई जनरेटेड वीडियो का जिक्र था..
जो असम बीजेपी के सोशल मीडिया हैंडल से पोस्ट किया गया था.. जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया.. जिसमें सरमा को मुसलमानों पर गोली चलाते दिखाया गया था.. याचिकाकर्ताओं ने एफआईआर दर्ज करने और स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाने की मांग की.. लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह मामला गुवाहाटी हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार में आता है.. और याचिकाकर्ताओं को पहले वहां जाना चाहिए.. चीफ जस्टिस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक युद्ध का मैदान नहीं है.. चुनाव के समय हर मुद्दे को यहां लाना गलत है.. और उन्होंने हाईकोर्ट्स की अथॉरिटी को कमजोर करने की कोशिश पर नाराजगी जताई.. और कहा कि हाईकोर्ट्स इन मुद्दों को बेहतर तरीके से हैंडल कर सकते हैं..
बता दें कि असम मुख्यमंत्री के भाषणों का विवाद काफी पुराना है.. सरमा ने कई मौकों पर मिया समुदाय को निशाना बनाया है.. और उन्होंने कहा था कि ‘मिया’ लोगों को परेशान किया जाना चाहिए.. जैसे रिक्शा का किराया कम देकर, ताकि वे असम छोड़ दें.. और उन्होंने कहा कि जो भी तरीके से परेशान कर सकते हो, करो… तभी वे असम छोड़ेंगे.. हिमंता बिस्वा सरमा और बीजेपी सीधे मिया के खिलाफ हैं.. ‘मिया’ शब्द असम में बंगाली बोलने वाले मुसलमानों के लिए इस्तेमाल होता है.. जो पूर्वी बंगाल से आए थे..
सरमा का कहना है कि उनके भाषण संवैधानिक हैं.. और वे अवैध घुसपैठियों के खिलाफ बोलते हैं.. लेकिन आलोचक इसे मुस्लिम विरोधी बताते हैं.. फरवरी 2026 में असम बीजेपी ने एक वीडियो पोस्ट किया.. जिसमें सरमा को स्कल कैप पहने लोगों पर गोली चलाते दिखाया गया.. जो मुसलमानों का प्रतीक माना जाता है.. वीडियो डिलीट कर दिया गया और एक सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर को निकाल दिया गया.. लेकिन विवाद बढ़ गया.. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह वीडियो मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को उकसाता है.. और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है..
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि कोई अच्छा कारण नहीं है कि.. यह मामला सीधे यहां सुना जाए.. चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि हाईकोर्ट्स संवैधानिक कोर्ट्स हैं.. और उनके पास हमसे ज्यादा पावर हैं.. हर मुद्दे को यहां लाना हाईकोर्ट्स को कमजोर करता है.. उन्होंने चुनाव के समय राजनीतिक मुकदमों की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई.. और कहा कि चुनाव आते ही सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक बैटलग्राउंड बन जाता है.. कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से अपील की कि अगर याचिकाकर्ता वहां जाते हैं.. तो मामले की जल्द सुनवाई करें.. वरिष्ठ वकील एएम सिंघवी ने याचिका की तरफ से कहा कि यह ‘पैन-इंडिया’ मुद्दा है.. और पूरा धर्म निशाने पर है.. लेकिन कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ही सही जगह है..



