सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा अधिकार, दत्तक माताओं को मिलेगा मातृत्व अवकाश

कोर्ट ने कहा कि जन्म देने वाली माताओं के समान ही गोद लेने वाली माताओं को भी मातृत्व लाभ का अधिकार है, भले ही बच्चे की उम्र कुछ भी हो.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने गोद लेने वाली माताओं के मातृत्व अवकाश पर अहम फैसला सुनाया है.

कोर्ट ने कहा कि जन्म देने वाली माताओं के समान ही गोद लेने वाली माताओं को भी मातृत्व लाभ का अधिकार है, भले ही बच्चे की उम्र कुछ भी हो. कोर्ट ने केंद्र से पितृत्व अवकाश नीति लाने पर भी विचार करने का आग्रह किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे को गोद लेने वाली महिला को को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा है कि गोद लेने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि गोद लेने वाली महिलाओं को जन्म देने वाली माताओं के समान ही मातृत्व लाभ मिलने करने का अधिकार है.

सुप्रीम कोर्ट ने का कहना है कि 3 महीने से ज्यादा उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिला को मैटरनिटी लीव देने से इनकार नहीं किया जा सकता. इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश नीति लाने पर विचार करने का आग्रह किया. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि मातृत्व संरक्षण एक मूलभूत मानवाधिकार है.

गोद लेने वाली महिला को मिले मातृत्व अवकाश’

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 मार्च) को एक कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया. यह प्रावधान गोद लेने वाली माताओं के लिए मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) को सिर्फ उन माताओं तक सीमित रखता था, जो तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेती हैं.

कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो, गोद लेने वाली सभी माताओं को गोद लेने की तारीख से 12 हफ़्ते की छुट्टी का अधिकार होगा. कोर्ट ने कहा कि जन्म देने वाली मां की तरह बच्चा गोद लेने वाली महिला को भी मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020’ की धारा 60(4) के तहत उम्र के आधार पर किया गया वर्गीकरण भेदभावपूर्ण था और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता था. साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि मैटरनिटी लीव का मकसद इस बात पर निर्भर नहीं करता कि कोई बच्चा किस तरह से परिवार में आता है.

कोर्ट ने कहा कि एक मां में कोई फर्क नहीं किया जा सकता. चाहे वह तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को घर लाए या ज़्यादा उम्र के बच्चे को गोद ले. कोर्ट ने आगे कहा कि प्रजनन की आज़ादी का अधिकार सिर्फ़ जैविक जन्म तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह माता-पिता होने की संवैधानिक समझ का विस्तार करता है जिसमें गोद लेना भी शामिल है.

पैटरनिटी लीव पर विचार करे केंद्र सरकार’

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि वह एक सामाजिक कल्याण उपाय के तौर पर पैटरनिटी लीव (पितृत्व अवकाश) शुरू करने पर विचार करे. इसके जरिए कोर्ट ने देखभाल के मामले में ज्यादा लिंग-तटस्थ और समावेशी दृष्टिकोण की जरूरत का संकेत दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के हितों पर ज़ोर देते हुए कहा कि बड़े बच्चों को, खासकर उन बच्चों को जिन्हें संस्थागत देखभाल से गोद लिया जाता है, अक्सर नए परिवार में भावनात्मक रूप से घुलने-मिलने और ढलने में ज़्यादा समय लगता है. सबसे ज़रूरी बात बच्चे का सबसे अच्छा हित ही होनी चाहिए जिसमें बच्चे को नए परिवार में घुलने-मिलने के लिए ज़रूरी समय भी शामिल है.

वकील हमसानंदिनी नंदुरी की याचिका पर फैसला

सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला कर्नाटक की वकील हमसानंदिनी नंदुरी की एक याचिका पर आया है. उन्होंने उस प्रावधान को चुनौती दी थी, जो पहले मैटरनिटी बेनिफ़िट एक्ट, 1961 में था और बाद में 2020 के कोड में भी शामिल किया गया था. उन्होंने इसे मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया था. नंदुरी की याचिका में, जिसकी पैरवी वकील बानी दीक्षित ने की थी, यह भी बताया गया था कि भारत का गोद लेने का ढांचा शायद ही कभी तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेने की इजाज़त देता है, जिससे उम्र की सीमा वाला यह फ़ायदा ज़्यादातर मामलों में बेमानी हो जाता है.

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