ताबड़तोड़ मिसाइलों से बंकर में छिपे नेतन्याहू, ईरान के कलस्टर बमों से इजराइल में भारी तबाही
ईरान के 'चाणक्य' कहे जाने वाले अली लारीजानी की शहादत ने तेहरान के सब्र का बांध तोड़ दिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: ईरान के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले अली लारीजानी की शहादत ने तेहरान के सब्र का बांध तोड़ दिया है।
खबर आ रही है कि पिछले कुछ घंटों में ईरान ने इज़राइल पर एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 100 से ज़्यादा मिसाइलें दाग दी हैं। तेल अवीव की रात पटाखों से नहीं, बल्कि ईरान की ‘फतह’ मिसाइलों और क्लस्टर बमों से दहक रही है। लेकिन तमाशा सिर्फ सरहद पर नहीं है, तमाशा तो वॉशिंगटन के व्हाइट हाउस में हो रहा है।
ट्रंप के अपने सिपहसालार उनका साथ छोड़ रहे हैं। धड़ाधड़ इस्तीफों की झड़ी लग चुकी है। ट्रंप ईरान से ज्यादा अपने ही देश में बुरा फँसते नजर आ रहे हैं। अली लारीजानी की शहादत के बाद कैसे ईरान एक्शन में आया है और कैसे ट्रंप ईरान के साथ जंग को लेकर अमेरिका में घिर चुके हैं,
ईरान की सरकारी मीडिया के अनुसार, सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की शहादत के बाद सबसे शक्तिशाली हस्तियों में से एक के रूप में उभरे अली लारीजानी ने भी शहादत का जाम पिया है। वैसे तो इज़राइल सुबह से ही यह ऐलान कर रहा था, लेकिन ईरान की सरकारी एजेंसियों ने देर से इस खबर की पुष्टि की है। इज़राइल के रक्षा मंत्री इसराइल काट्ज़ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह ऐलान किया था कि अमेरिका-इज़राइल के ईरान पर युद्ध के बीच रात भर चले हमले में 67 वर्षीय लारीजानी की मौत हो गई।
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव लारीजानी को आखिरी बार शुक्रवार को राजधानी तेहरान में अल-कुद्स दिवस परेड के दौरान सार्वजनिक रूप से देखा गया था। वह खामेनेई के बाद इज़राइल द्वारा मारे गए सबसे उच्च स्तरीय ईरानी अधिकारी हैं। दशकों तक, लारीजानी ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान का शांत और व्यावहारिक चेहरा थे—एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने 18वीं सदी के प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कांट पर किताबें लिखीं और पश्चिम के साथ परमाणु समझौतों पर बातचीत की। लेकिन अली खामेनेई के बाद 1 मार्च को सुरक्षा प्रमुख का रुख पूरी तरह बदल गया।
अमेरिका-इज़राइल के हवाई हमलों में खामेनेई और रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के कमांडर मोहम्मद पाकपुर की मौत के ठीक 24 घंटे बाद, सरकारी टेलीविजन पर आते हुए लारीजानी ने एक जोशीला संदेश दिया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था, “अमेरिका और ज़ायोनी शासन (इज़राइल) ने ईरानी राष्ट्र के दिल में आग लगा दी है। हम उनके दिलों को जला देंगे। हम ज़ायोनी अपराधियों और बेशर्म अमेरिकियों को उनके कृत्यों पर पछतावा करवाएंगे।” हालांकि अब वे खुद शहीद हो चुके हैं, लेकिन ईरान अपने सेना प्रमुख की शहादत पर उबल पड़ा है।
कल तक जो इज़राइल तेहरान में घुसकर अली लारीजानी को मारने का दावा कर रहा था, आज उसे छुपने की जगह नहीं मिल रही है। ईरान ने अपनी पूरी सैन्य ताकत इज़राइल के सीने पर उतार दी है। ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, इज़राइल के कफर-कासेम इलाके में मिसाइलों की ऐसी बारिश हुई है कि वहाँ का एयर डिफेंस सिस्टम ‘आयरन डोम’ खिलौना साबित हुआ।
इतना ही नहीं, तेल अवीव पर क्लस्टर बमों के गिरने की खबरें हैं। ये वो हथियार हैं जो आसमान में फटते हैं और फिर मौत की सैकड़ों छोटी गोलियां बरसाते हैं। नेतन्याहू को लग रहा था कि वे ईरान के लीडर्स को निशाना बनाकर जंग जीत लेंगे, लेकिन उन्होंने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है। आज इज़राइल की सड़कों पर दहशत है, और यह दहशत उस गुरूर का नतीजा है जो नेतन्याहू और ट्रंप ने मिलकर पाला था।
इज़रायली मीडिया के मुताबिक, ईरान के ताज़ा मिसाइल हमले के बाद मध्य इज़राइल के कफर-कासेम शहर में कम से कम चार जगहों पर मिसाइलें गिरीं। चैनल 12 की रिपोर्ट में कहा गया कि इन हमलों से संपत्ति को काफी नुकसान पहुँचा है। एक जगह पर दो लोगों को घबराहट और सदमे की स्थिति में इलाज दिया गया। इससे पहले खबर आई थी कि पास के रमत गन इलाके में छर्रे लगने से दो लोगों की मौत हो गई थी।
वहीं दूसरी ओर ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा है कि तेल अवीव पर किया गया हमला अली लारीजानी की हत्या का बदला था। फार्स समाचार एजेंसी के अनुसार, आईआरजीसी ने दावा किया कि उसकी मिसाइलों ने इज़राइल के कब्जे वाले इलाकों के अंदर 100 से ज्यादा सैन्य और सुरक्षा ठिकानों को निशाना बनाया। आईआरजीसी ने यह भी कहा कि यह हमला इसलिए संभव हुआ क्योंकि इज़राइल की बहु-स्तरीय और उन्नत रक्षा प्रणाली को भेद दिया गया।
इससे पहले इज़राइल की आपातकालीन सेवाओं ने बताया था कि तेल अवीव में गिरने वाले छर्रों से एक पुरुष और एक महिला की मौत हो गई। ईरान के टॉप सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी की मौत के बाद ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक इंटरव्यू में कहा कि लारीजानी जैसी बड़ी शख्सियत की मौत से ईरान की सरकार या सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अराघची ने कहा कि मुझे समझ में नहीं आता कि अमेरिका और इज़राइल अभी तक यह बात क्यों नहीं समझ पाए कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का राजनीतिक ढांचा बहुत मजबूत है; यहाँ राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संस्थान पूरी मजबूती से कायम हैं।
एक ओर जहाँ ईरान अपने सैन्य प्रमुख अली लारीजानी के मारे जाने का बदला ले रहा है, तो वहीं दूसरी ओर सात समंदर पार अमेरिका में ट्रंप का किला ढह रहा है। ट्रंप साहब को लग रहा था कि वे इज़राइल के लिए अमेरिका को जंग में झोंक देंगे और पूरी दुनिया उनके पीछे खड़ी होगी। लेकिन हुआ इसके उलट! ट्रंप के सबसे भरोसेमंद अधिकारी अब उनका साथ छोड़ रहे हैं।
पहले समीरा मुंशी ने अपना रास्ता अलग किया, और अब नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के डायरेक्टर जो केंट ने इस्तीफा देकर ट्रंप के मुँह पर तमाचा जड़ा है। जो केंट ने साफ कहा कि— “मेरी अंतरात्मा इस जंग की इजाजत नहीं देती।” केंट ने जो खुलासा किया है वो रोंगटे खड़े करने वाला है। उन्होंने कहा कि ईरान से अमेरिका को कोई खतरा नहीं था, यह पूरी जंग सिर्फ और सिर्फ इज़राइल के दबाव में शुरू की गई है।
जब देश का टेररिज्म चीफ ही यह कह दे कि जंग फर्जी है, तो ट्रंप के पास क्या मुँह बचेगा? 45 वर्षीय जो केंट नेता बनने से पहले एक सैनिक थे, जिन्होंने इराक में अमेरिकी नेतृत्व वाले युद्ध सहित 11 युद्ध अभियानों को पूरा किया है। उनकी पहली पत्नी, शैनन केंट, जो अमेरिकी नौसेना में क्रिप्टोलॉजिक तकनीशियन थीं, 2019 में सीरिया में एक आत्मघाती बम हमले में मारी गई थीं।
सेना छोड़ने के बाद, केंट ने केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CIA) के लिए एक अर्धसैनिक अधिकारी के रूप में काम किया। नई सरकार में ट्रंप ने उन्हें ‘राष्ट्रीय आतंकवादी विरोधी कमेटी’ का डायरेक्टर नियुक्त किया था, लेकिन अब मात्र आठ महीने बाद ही उनका इस्तीफा आ गया है। इस इस्तीफे ने न सिर्फ पूरे अमेरिका में हंगामा मचा दिया है बल्कि पूरी दुनिया में ट्रंप पर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि ट्रंप ने खुद ही पूरी दुनिया और अमेरिका के सामने उन्हें ‘देशभक्त’ और ‘राष्ट्रभक्त’ कहकर पुकारा था। अब जब उन्होंने इस्तीफा दे दिया है, तो लोग ट्रंप की उन्हीं बातों पर सवाल उठा रहे हैं।
ट्रंप की ‘अकेले चलो’ वाली नीति ने अमेरिका को दुनिया में अलग-थलग कर दिया है। ट्रंप ने अपने दोस्तों से मदद मांगी थी, लेकिन जवाब क्या मिला? जापान ने मना कर दिया, ऑस्ट्रेलिया ने हाथ पीछे खींच लिए, और फ्रांस ने तो यहाँ तक कह दिया कि जब तक जंग है, वे अपना एक भी जहाज़ नहीं भेजेंगे। यह ट्रंप की कूटनीतिक हार है।
आज अमेरिका के अंदर लोग पूछ रहे हैं कि हमारे सैनिकों का खून दूसरों की ज़मीन पर क्यों बहे? ट्रंप ने वादा किया था कि वे अमेरिका को महान बनाएंगे, लेकिन आज वे देश को ऐसी दलदल में ले आए हैं जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं दिख रहा। ट्रंप आज ईरान में नहीं, बल्कि वॉशिंगटन की सड़कों पर और अपने ही दफ्तर में बुरी तरह फँस चुके हैं।
ऐसे में तस्वीर बिल्कुल साफ है। एक तरफ वो ज़िद है जो बेगुनाहों का खून बहाकर अपनी कुर्सी बचाना चाहती है, और दूसरी तरफ वो गुस्सा है जो अब किसी भी हद तक जाने को तैयार है। ट्रंप और नेतन्याहू की जोड़ी ने दुनिया को जिस तबाही के मुहाने पर खड़ा किया है, उसका अंजाम खुद उनके लिए बहुत बुरा होने वाला है। क्या इस्तीफा दे रहे अधिकारियों के दबाव में यह युद्ध रुकेगा? क्या इज़राइल इन 100 मिसाइलों का बोझ सह पाएगा? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या लारीजानी की मौत की खबर इज़राइल का आखिरी धोखा साबित होगी?



