संजय राउत की किताब ‘अनलाइकली पैराडाइज’ से राजनीतिक विस्फोट

  • मुंबई में कपिल सिब्बल, अरविंद केजरीवाल, संजय शर्मा, दिग्विजय सिंह, डेरेक ओब्रायन और संजय सिंह की मौजूदगी में शानदार लांचिग
  • अनलाइकली पैराडाइज का प्रहार- किताब बनी शस्त्र और मंच बना महाभारत का रणक्षेत्र
  • संजय राउत का एलान : डरने वालों के लिए नहीं लिखी गई यह किताब

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश की राजधानी में शिवसेना यूबीटी नेता और सांसद संजय राउत की पुस्तक अनलाइकली पैराडाइज का विमोचन किया गया। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, 4 पीएम के संपादक संजय शर्मा के साथ अन्य प्रमुख व्यक्तियों की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष महत्व प्रदान किया। यह कोई साधारण पुस्तक विमोचन नहीं था। यह उस महाभारत का शंखनाद था जिसमें शब्दों को हथियार बनाकर सियासत के कुरुक्षेत्र में उतरा गया हो।
जी हां नई दिल्ली की जमीन पर जब अनलाइकली पैराडाइज का अनावरण हुआ तो यह महज एक किताब नहीं रह गयी बल्कि यह चुनौती बन गयी, यह सवाल बन गयी और सत्ता के गलियारों में गूंजता हुआ एक साहसिक एलान बन गयी। पुस्तक विमोचन के अवसर पर संजय राउत ने मंच से जो कहा उसने पूरे माहौल को तल्ख बना दिया। उन्होंने कहा कि यह किताब उन लोगों के बीच लॉन्च हो रही है जो किसी से डरते नहीं है। जो सच को सच कहने की ताकत रखते हैं। मंच पर मौजूद चेहरे कपिल सिब्बल, अरविंद केजरीवाल और वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा यह सिर्फ अतिथि नहीं थे बल्कि इस कथा के पात्र थे। हर एक की मौजूदगी अपने आप में एक संदेश थी कि यह किताब सत्ता के खिलाफ खड़े होने वालों की आवाज है। राउत ने अपने अंदाज में कहा कि यह किताब उन सच्चाइयों को सामने लाती है जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है। उन्होंने संजय शर्मा की तारीफ करते हुए कहा कि आज के दौर में सच छापना सबसे बड़ा साहस है। किताब की लांचिग किसी साहित्यिक आयोजन की तरह शांत नहीं थी। यह एक राजनीतिक विस्फोट था। हर लाइन में दम था हर बयान में संदेश और हर मुस्कान के पीछे छिपी थी एक रणनीति जो साफ जाहिर हो रही थी।

डरने वालों में से नहीं

आज जब किताबें सिर्फ पढऩे के लिए नहीं बल्कि सोच बदलने के लिए लिखी जा रही हैं तब अनलाइकली पैराडाइज उसी सिलसिले की अगली कड़ी बनकर उभरी है। संजय राउत की अनलाइकली पैराडाइज किताब विमोचन के बाद से ट्रेंड कर रही है और चर्चाओं में यह किसी भी दूसरी किताब को पीछे छोड़ चुकी है। संजय राउत जो अपने बेबाक अंदाज के लिए जाने जाते हैं ने इस किताब के जरिए एक बार फिर यह साबित किया कि वे सिर्फ नेता बल्कि बेहतरीन लेखक भी है। कार्यक्रम में कपिल सिब्बल की मौजूदगी ने इसे कानूनी और वैचारिक धार दी वहीं अरविंद केजरीवाल की उपस्थिति ने इसे जन राजनीति से जोड़ दिया। यह एक ऐसा मंच बन गया जहां विपक्ष की कई धाराएं एक साथ दिखीं।

सच की परपंरा को आगे बड़ा रही है अनलाइकली पैराडाइज

राजनीति और किताबों का रिश्ता नया नहीं है लेकिन हाल के वर्षों में यह और ज्यादा मजबूत हुआ है। पूर्व सेना प्रमुख नारवाणे की किताब ने जिस तरह से सुर्खिया बंटोरी थी उसने यह साबित कर दिया कि किताबें सिर्फ पन्नों का संग्रह नहीं बल्कि सियासत का हथियार भी हैं। नारवाणे की किताब ने सत्ता सेना और रणनीति के कई ऐसे पहलुओं को सामने लायी जिन पर पहले कभी खुलकर चर्चा नहीं हुई थी। और अब अनलाइकली पैराडाइज उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है।

सिर्फघटनाओं का विवरण नहीं है अनलाइकली पैराडाइज

किताब की बात करें तो यह सिर्फ घटनाओं का विवरण नहीं बल्कि एक दृष्टिकोण है। एक ऐसा नजरिया जो सत्ताधारी सोच को चुनौती देता है। यह वही दौर है जहां किताबें अब सिर्फ लाइब्रेरी में नहीं रहतीं वह संसद के बाहर टीवी स्टूडियो में और सोशल मीडिया के रणक्षेत्र में लड़ाई लड़ती हैं। हाल के वर्षों में कई किताबों ने राजनीतिक हलचल मचाई है चाहे वह नेताओं की आत्मकथाएं हों या सत्ता के अंदरूनी खेल को उजागर करने वाली किताबें। अनलाइकली पैराडाइज भी उसी कड़ी में एक नया विस्फोट है।

सिस्टम के खिलाफ आवाज है यह किताब : केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी ने इस आयोजन को सीधे जनता से जोड़ दिया। विमोचन के अवसर पर उन्होंने बोलते हुए कहा कि आज राजनीति में पारदर्शिता की सबसे ज्यादा जरूरत है और ऐसी किताबें उस दिशा में एक कदम हैं। केजरीवाल ने इस किताब को सिस्टम के खिलाफ आवाज बताया। उन्होंने कहा कि जब सिस्टम जवाब नहीं देता तब किताबें सवाल बनकर सामने आती हैं। उनका यह बयान साफ करता है कि यह किताब सिर्फ अतीत नहीं बल्कि वर्तमान की राजनीति को भी प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

साहस का दस्तावेज है किताब : कपिल सिब्बल

कपिल सिब्बल इस मंच पर सिर्फ एक अतिथि नहीं थे। वह उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जो सवाल पूछने से डरती नहीं। कपिल सिब्बल ने अपने भाषण में कहा कि आज के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे बड़ी चुनौती के दौर से गुजर रही है। सिब्बल ने इस किताब को साहस का दस्तावेज बताया। उनका कहना था कि जब सत्ता के खिलाफ बोलना मुश्किल हो जाए तब किताबें ही सच का सबसे बड़ा माध्यम बनती हैं। उन्होंने यह भी इशारा किया कि लोकतंत्र में असहमति को दबाना खतरनाक संकेत है। और ऐसे समय में इस तरह की किताबें लोकतंत्र को जीवित रखने का काम करती हैं।

सच छापना सबसे मुश्किल काम : संजय शर्मा

4पीएम के संपादक संजय शर्मा ने मंच से बोलते हुए कहा कि आज के दौर में सच को शब्द देना जितना जरूरी है उतना ही जोखिम भरा भी हो गया है। आज सच छापना सबसे मुश्किल काम है लेकिन यही सबसे जरूरी भी है। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि सच लिखने के चलते आप को कब असहज स्थिति का सामना करना पड़ जाए कहा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि मुकदमें/धमकियां मिलना तो आम बात है। आज के दौर में सच के साथ खड़ा होना मौत को दावत देना जैसा हो गया है। कभी ईडी कभी सीबीआई तो कभी कोई दूसरी जांच एजेंसी सीधे धमकी देने पर उतारू हैं। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष और निर्भीक लेखन लगातार चुनौतियों का सामना कर रहा है। संजय शर्मा ने विस्तार से बताया कि इस किताब को तैयार करने की प्रक्रिया आसान नहीं रही।

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