बंगाल की सियासत में बवाल
ममता का सीधा वार , अब निशाने पर चुनाव आयोग के साथ सुरक्षा बल

- लोकतंत्र की रक्षा या सत्ता की साजिश?
- क्या बंगाल में निष्पक्ष चुनाव सिर्फ एक भ्रम बनकर रह गया है?
- ममता का बिगुल अब चुप नहीं बैठेंगे
- एक दिन के लिए बूथ बचा लो पांच साल शांति मिलेगी
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। लोकतंत्र अब यह शब्द किताबों में जितना पवित्र दिखता है जमीन पर उतना ही संदिग्ध होता जा रहा है। और पश्चिम बंगाल में तो मानो लोकतंत्र अब बैलेट से नहीं बल्कि बैलेट को कंट्रोल करने वाली ताकतों से तय हो रहा है।
सीएम ममता बनर्जी ने इस बार कोई हल्का आरोप नहीं लगाया है उन्होंने चुनाव आयोग के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव को निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी निभाने पहुंचे सशस्त्र सुरक्षा बलों पर गंभीर आरोप लगाये हैं। उनके आरोप बताते हैं कि मामला कितना गहरा और कितना खतरनाक हो चुका है।
ममता की कठिन हो गई राह
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीति कभी आसान नहीं रही। वह उन नेताओं में से हैं जिन्होंने सत्ता विरासत में नहीं पाई बल्कि सड़कों पर संघर्ष कर के हासिल की। कांग्रेस से निकलकर अपनी पार्टी बनाना वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाना यह सब किसी साधारण नेता के बस की बात नहीं थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी राह और कठिन हो गई। एक तरफ केंद्र की भाजपा सरकार दूसरी तरफ राज्य की जमीनी चुनौतियां ममता हमेशा दो मोर्चों पर लड़ती नजर आईं। बीजेपी का बंगाल में उभार उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बना। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही बंगाल की राजनीति में ध्रुवीकरण तेज हुआ। हिंसा, आरोप प्रत्यारोप, और एजेंसियों की एंट्री सब कुछ तेजी से बदलने लगा। ममता के लिए सबसे बड़ा संकट यह रहा कि उन्हें सिर्फ विपक्ष से नहीं बल्कि सिस्टम से भी लडऩा पड़ा। सीबीआई, ईडी, और अब चुनाव आयोग हर मोर्चे पर उन्होंने खुद को घिरा हुआ पाया। उनके कई करीबी नेताओं पर कार्रवाई हुई। पार्टी के भीतर भी असंतोष के सुर उठे। लेकिन इसके बावजूद ममता ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी छवि एक लड़ाकू नेता की बनाई जो झुकती नहीं टकराती है।
ममता की लड़ाई बंगाल की नहीं बल्कि विचार की
आज जब देश की राजनीति में बड़े-बड़े चेहरे सत्ता के सामने झुकते नजर आते हैं, ममता बनर्जी एक अलग तस्वीर पेश करती हैं। वह सवाल पूछती हैं टकराती हैं और सबसे बड़ी बात डरती नहीं हैं। उनके आरोपों को सिर्फ राजनीति कहकर खारिज करना आसान है लेकिन उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि अगर एक चुनी हुई मुख्यमंत्री बार बार सिस्टम पर सवाल उठा रही है तो कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ जरूर है। ममता की लड़ाई सिर्फ बंगाल की नहीं बल्कि उस विचार की है जिसमें राज्यों की स्वायत्तता, लोकतंत्र की निष्पक्षता और जनता का अधिकार शामिल है। उनका यह कहना कि एक दिन के लिए बूथ बचा लो पांच साल शांति मिलेगी यह सिर्फ एक लाइन नहीं बल्कि लोकतंत्र का सार है। बंगाल आज एक प्रयोगशाला बन चुका है जहां यह तय होगा कि लोकतंत्र कितना मजबूत है और संस्थाएं कितनी निष्पक्ष। और इस जंग में ममता बनर्जी सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं बल्कि एक योद्धा हैं जो आखिरी सांस तक लडऩे को तैयार है। अगर लोकतंत्र को बचाने की कोई आखिरी उम्मीद बची है तो वह शायद ऐसे ही नेताओं में है जो सवाल पूछने की हिम्मत रखते हैं। और बंगाल में आज वही हिम्मत ममता बनर्जी के रूप में खड़ी दिखायी दे रही है।
ब्यूरोक्रेट्स और पुलिस अधिकारियों के ट्रांसफर पर भी आपत्ति
उन्होंने कमीशन पर पश्चिम बंगाल से ब्यूरोक्रेट्स और पुलिस अधिकारियों को बिना पहले से बताए दूसरे राज्यों में ट्रांसफर करने बदलने और डेपुटेशन देने के लिए भी हमला किया। सीएम ममता बनर्जी ने कहा कि मैं पश्चिम बंगाल की चुनी हुई मुख्यमंत्री हूं लेकिन इसके बावजूद मेरे अधिकारियों को बिना मुझे पहले से बताए ट्रांसफर कर दिया गया। अब राज्य में जरूरी और इमरजेंसी एडमिनिस्ट्रेटिव कामों की जिम्मेदारी कौन लेगा? खाना कौन देगा? बाढ़ या तूफान जैसी कुदरती आफतों से कौन निपटेगा? अगर भाजपा ऐसे कामों से मुझे कुचलने की सोच रही है तो वह गलत है। उन्होंने एसआईआर को लेकर कहा कि यह शर्म की बात है कि पश्चिम बंगाल के नागरिकों को इतने सालों बाद अब अपनी नागरिकता का सबूत देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों को खास तौर पर लॉजिकल डिसकम्पेसी नोटिस भेजे गए थे और उन्हें यकीन है कि पश्चिम बंगाल में एनआरसी अगला एजेंडा होगा लेकिन जब तक मैं जिंदा हूं ऐसा नहीं होने दूंगी। मैं एक भी व्यक्ति को डिटेंशन कैंप में नहीं जाने दूगी ।
साधारण नहीं हैं आरोप
ममता का आरोप साधारण नहीं है। वह कहती हैं कि सुरक्षा बल जिन पर निष्पक्षता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है अब बीजेपी के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। झंडा उठाए घूम रहे हैं यह सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि एक ऐसा आरोप है जो सीधे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। सोचिए अगर सुरक्षा बल ही पक्षपाती हो जाएं तो आम वोटर किस पर भरोसा करेगा? किसके सामने अपनी उंगली उठाएगा? लोकतंत्र का सबसे पवित्र दिन मतदान अगर डर दबाव और शक के साए में हो तो फिर लोकतंत्र का अर्थ ही क्या रह जाता है? ममता बनर्जी का यह हमला अचानक नहीं है। यह उस लंबे संघर्ष की अगली कड़ी है जिसमें वह खुद को दिल्ली की ताकत के खिलाफ खड़ा बताती रही हैं। चुनाव आयोग के फैसलों पर सवाल अधिकारियों के ट्रांसफर पर नाराजगी और अब सीएपीएफ पर आरोप। यह सब मिलकर एक बड़ी कहानी बुनते हैं। लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी है। क्या यह सिर्फ राजनीतिक रणनीति है? या वाकई बंगाल में कुछ ऐसा हो रहा है जिसे देश की जनता से छुपाया जा रहा है?
सीएपीएफ पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने उठाए सवाल
चुनाव आयोग के बाद अब केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय बल भी कमीशन की तरह ही पश्चिम बंगाल में भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहा है। सीएम ममता बनर्जी ने उत्तरी बंगाल में एक के बाद एक तीन रैलियों को संबोधित किया। एक रैली में उन्होंने राज्य में पहले से तैनात सीएपीएफ कंपनियों पर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि भाजपा के खिलाफ हर वोट चुनाव आयोग के खिलाफ बदला होगा जिसने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए लोगों को परेशानी दी है। उन्होंने आगे कहा कि वह सीएपीएफ का बहुत सम्मान करती हैं लेकिन अब उन्होंने देखा कि पश्चिम बंगाल में वे भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं और भाजपा के झंडे भी ले जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल की महिलाओं को इस बार मतदान के दिनों में सुबह से ही पोलिंग बूथ की सुरक्षा के लिए खास पहल करनी होगी। अगर आप पश्चिम बंगाल में पांच साल के लिए शांति चाहते हैं तो आपको एक दिन के लिए बूथ की सुरक्षा करनी होगी और बाहरी लोगों को चुनावी गड़बड़ी से रोकना होगा। आपके घर में जो कुछ भी है उसे लेकर सड़कों पर उतरें।
चुनाव आयोग से पंगे के बाद अब सुरक्षा बलों पर हमला
ममता बनर्जी का चुनाव आयोग से टकराव कोई नया नहीं है। लेकिन इस बार मामला और गंभीर हो गया है। उन्होंने आयोग पर आरोप लगाया कि वह बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर लोगों को परेशान कर रहा है। उनका कहना है कि सालों से यहां रह रहे लोगों से अचानक नागरिकता के सबूत मांगे जा रहे हैं। खासकर आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। ममता ने इसे सीधे-सीधे एनआरसी की तैयारी बताया। उनका बयान जब तक मैं जिंदा हूं किसी को डिटेंशन कैंप नहीं जाने दूंगी एक मजबूत राजनीतिक संदेश है। लेकिन असली विस्फोट तब हुआ जब उन्होंने सीएपीएफ पर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बल बीजेपी के झंडे लेकर घूम रहे हैं और एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। यह आरोप सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि संस्थागत संकट की ओर इशारा करता है। अगर सुरक्षा बलों की निष्पक्षता पर सवाल उठता है तो चुनाव की पूरी प्रक्रिया संदिग्ध हो जाती है। ममता का गुस्सा अधिकारियों के ट्रांसफर को लेकर भी है। उनका कहना है कि बिना राज्य सरकार को बताए अधिकारियों को हटाया जा रहा है जिससे प्रशासनिक कामकाज प्रभावित हो रहा है।




