अमेरिका की हलचल के बीच होर्मुज पर एक्टिव हुआ ईरान, खर्ग आईलैंड की सुरक्षा पर फोकस

ईरान ने खर्ग में अमेरिकी सैनिकों के उतरने से पहले कौन सा 'मौत का जाल' बिछाया है और भारत ने कैसे ईरानी गैस भारतीय मुद्रा में खरीदकर ईरान का साथ दिया है?

4पीएम न्यूज नेटवर्क: कहावत है कि ‘सिर मुड़ाते ही ओले पड़े’, मौजूदा समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। इस बार उनको ‘ज़ोर का झटका धीरे से’ नहीं, बल्कि बहुत तेज़ी से लगने वाला है। खबर आ रही है कि ट्रंप प्रशासन ईरान के सबसे बड़े आर्थिक स्रोत, यानी खर्ग आईलैंड पर कब्ज़ा करने के लिए अपने जांबाज मरीन और 82nd एयरबोर्न डिवीजन को उतारने की तैयारी कर रहा है।

लेकिन ईरान कोई गाज़ा या लेबनान नहीं है, जिसे ये ट्रंप-नेतन्याहू की सनकी जोड़ी आसानी से निगल जाएगी। खबर है कि ईरान ने अमेरिकी सैनिकों के उतरने से पहले ही ऐसा मास्टर प्लान तैयार किया है कि व्हाइट हाउस की सिट्टी-पिट्टी गुम होना तय है। ऐसे में भारत ने बड़ा दिल दिखाते हुए एक ओर जहाँ ईरानी गैस भारतीय रुपयों में खरीदी है, और ईरान के साथ खड़ा हुआ दिखाई देने लगा है तो वहीं खर्ग को लेकर ईरान का नया नियम भी बनने को तैयार है।

ईरान ने खर्ग में अमेरिकी सैनिकों के उतरने से पहले कौन सा ‘मौत का जाल’ बिछाया है और भारत ने कैसे ईरानी गैस भारतीय मुद्रा में खरीदकर ईरान का साथ दिया है?  अब अमेरिका-ईरान जंग होर्मुज पर फोकस हो चुकी है। वजह यह है कि पूरी दुनिया में तेल और गैस को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। भारत में सड़क से लेकर सदन तक हंगामा है और पूरी दुनिया ट्रंप और नेतन्याहू के सनकी फैसलों की निंदा कर रही है। कल जो ट्रंप खुद को ‘शांति का दूत’ बताते थे, अब उनके हाथ पूरी तरह खून में सने हुए हैं। इस बीच उनका ‘सुपरपावर’ वाला गुरुर ईरान ने ऐसा निकाला है कि 27 दिन बीत जाने के बाद भी वे ईरान का बाल बांका नहीं कर सके हैं।

होर्मुज पर ईरान का सबसे बड़ा केंद्र खर्ग आईलैंड है। यह वो छोटा सा द्वीप है जहाँ से ईरान का 90 प्रतिशत कच्चा तेल निर्यात होता है। ट्रंप को लगता है कि अगर इस द्वीप पर कब्ज़ा कर लिया, तो ईरान की गर्दन उनके हाथ में होगी और वे होर्मुज खुलवा लेंगे। लेकिन CNN की रिपोर्ट रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने पिछले कुछ हफ्तों में इस द्वीप को एक ‘अभेद्य किले’ में बदल दिया है। यहाँ सिर्फ सैनिक नहीं, बल्कि कंधे से दागे जाने वाले मिसाइल सिस्टम (MANPADS) और घातक एयर डिफेंस तैनात किए गए हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात जानते हैं क्या है? ईरान ने आईलैंड के चारों तरफ एंटी-पर्सनल और एंटी-आर्मर बारूदी सुरंगों का जाल बिछा दिया है। यानी अगर ट्रंप के सैनिक वहां ज़मीन पर उतरते हैं, तो उनका पहला कदम ही उनके जीवन का आखिरी कदम होगा। वे सीधे मौत के जाल में उतरेंगे।

रिटायर्ड अमेरिकी एडमिरल जेम्स स्टैवरिडिस ने खुद वाशिंगटन को चेतावनी दी है कि ईरानी बेहद चालाक और निर्दयी हैं, वे अमेरिकी सैनिकों को ज़्यादा से ज़्यादा नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेंगे। ट्रंप साहब, ये वियतनाम से भी बुरा साबित होगा। हालांकि अमेरिका जो सेना उतारने के चक्कर में है, वो पैराशूट से उतरने में बहुत ट्रेंड है और कुछ ही घंटों में किसी भी देश पर कब्ज़ा कर सकती है, लेकिन ईरान की सेना को हल्के में लेना ट्रंप को भारी पड़ सकता है।

एक ओर जहाँ ईरान का प्लान खर्ग में उतरने वाले सैनिकों को तुरंत खत्म कर देने का है, तो वहीं दूसरी ओर ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने सोशल मीडिया पर सीधा ट्रंप को ललकारा है। उन्होंने लिखा कि “जनरलों ने जो नुकसान किया है, उसे अब ये मामूली सैनिक ठीक नहीं कर पाएंगे। हमारे इरादे परखने की कोशिश मत करो।”

गालिबाफ का इशारा साफ़ है कि अगर अमेरिका ने खर्ग पर कब्ज़ा करने की जुर्रत की, तो ईरान सिर्फ अपनी रक्षा नहीं करेगा, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिका के हर सैन्य ठिकाने को ‘कब्रिस्तान’ बना देगा। खाड़ी के अरब देशों ने भी अमेरिका के कान खींच दिए हैं। उन्हें डर है कि अगर खर्ग पर हमला हुआ, तो ईरान उनके तेल के कुओं और इंफ्रास्ट्रक्चर को भी राख कर देगा। नेतन्याहू, जो कल तक तालियां बजा रहे थे, आज उन्हें समझ आ रहा है कि ये आग उनके अपने घर तक पहुँचने वाली है।

खर्ग का एक बड़ा मामला यह भी है कि चीन और रूस के युद्धपोत पहले से ही खर्ग के आसपास तैनात हैं। क्योंकि दोनों देशों की तेल सप्लाई यहीं से होती है, तो यह बात भी पूरी तरह साफ़ है कि अगर खर्ग को नुकसान पहुँचा, तो ये दोनों देश हर हाल में अमेरिका के खिलाफ खड़े होंगे।

खासतौर से चीन के तेल का एक बहुत बड़ा हिस्सा यहीं से आता है और चीन पहले से ही इसको लेकर एक्टिव है। चीन के अकेले ही 42 से ज़्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियां हिंद महासागर से लेकर फारस की खाड़ी में तैनात हैं। ऐसे में खर्ग वाला दांव कहीं न कहीं ट्रंप को भारी पड़ सकता है।

एक ओर जहाँ खर्ग पर कब्ज़ा करने के लिए ट्रंप लालायित हैं, तो वहीं दूसरी ओर होर्मुज पर ईरान और बड़ा गेम खेलने जा रहा है। होर्मुज वो जगह है जहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुज़रता है। ईरान ने यहाँ एक नया और सख्त कानून लाने का मन बना लिया है।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सरकारी टीवी पर आकर जो कहा, उसने बाज़ार में आग लगा दी है। उन्होंने कहा कि “होर्मुज सबके लिए बंद नहीं है, यह दोस्तों के लिए खुला है, लेकिन दुश्मनों के लिए यहाँ से एक बूंद तेल भी नहीं गुज़रने दिया जाएगा।” ईरान ने साफ़ कर दिया है कि भारत, रूस और चीन जैसे देशों के लिए रास्ता खुला है, क्योंकि वे दोस्त हैं। लेकिन अमेरिका, इज़राइल और उनके पिट्ठू देशों के जहाज़ों को गुज़रने देने का कोई कारण नहीं है। ट्रंप साहब, आप दुनिया को ‘फ्री नेविगेशन’ का पाठ पढ़ाते थे, अब ईरान ने आपके ही रास्ते में दीवार खड़ी कर दी है।

हालांकि इस तनाव के बीच भारत ने जो किया है, वो ट्रंप के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा है और ‘फादरलैंड’ वाले नेतन्याहू को भी झटका लगना तय है। क्योंकि साल 2019 के बाद पहली बार भारत ने ईरान से रसोई गैस का बड़ा कार्गो खरीदा है। यह वो कार्गो था जो चीन जाने वाला था, लेकिन भारत की कूटनीति ने इसे अपनी ओर मोड़ लिया। सबसे बड़ी बात जानते हैं क्या है?

भारत इस गैस का भुगतान भारतीय रुपये में कर रहा है! यह डॉलर की बादशाहत पर सबसे बड़ा तमाचा है। ट्रंप पाबंदियों का डर दिखाते रहे, लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए, देर से ही सही, लेकिन ईरान का हाथ थाम लिया। भारतीय नौसेना ने ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ के तहत अपने 5 बड़े जंगी जहाज़ तैनात कर दिए हैं ताकि भारत आने वाले एलपीजी (LPG), एलएनजी (LNG) और तेल के जहाज़ों को कोई आंच न आए।

अब सवाल यह है कि क्या रसोई गैस के दाम सस्ते होंगे? दोस्तों, भारत अपनी ज़रूरत का 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है। ईरान से दूरी कम है, लॉजिस्टिक्स सस्ता है और पेमेंट रुपये में हो रहा है। अगर यह सप्लाई जारी रही, तो IOC, BPCL और HPCL जैसी कंपनियों की लागत कम होगी और आने वाले वक्त में आपकी रसोई का बजट सुधर सकता है। यह है मोदी सरकार की वो कूटनीति, जिसने ट्रंप के ‘सैंक्शंस’ को रद्दी का टुकड़ा बना दिया।

जैसा कि जगज़ाहिर है कि बेंजामिन नेतन्याहू ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए ट्रंप को इस जंग में घसीटा है। लेकिन अब इज़राइल की हालत पतली है। ‘आयरन डोम’ अब ईरानी मिसाइलों के आगे हांफने लगा है। इज़राइल के अंदर महंगाई चरम पर है और लोग बंकरों में रहने को मजबूर हैं।

नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका ईरान पर ज़मीनी हमला करे, लेकिन अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ जानते हैं कि ईरान के अंडरग्राउंड ‘मिसाइल सिटीज़’ और सुसाइड ड्रोन्स का सामना करना नामुमकिन है। ट्रंप एक तरफ सुलह की चिट्ठियां पाकिस्तान के ज़रिए भेज रहे हैं, और दूसरी तरफ हमले कर रहे हैं। यह ‘दोगली नीति’ अब नहीं चलेगी।

हकीकत यह है कि ट्रंप और नेतन्याहू इस जंगी दलदल में बुरी तरह फंस चुके हैं। ईरान झुकने का नाम नहीं ले रहा और भारत जैसे देश अब डॉलर की धौंस में आने को तैयार नहीं हैं। खर्ग आईलैंड पर बिछाया गया ईरान का बारूदी जाल और होर्मुज पर उसका नया कानून, अमेरिका की ‘सुपरपावर’ वाली छवि को मिट्टी में मिला रहा है।

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