ट्रंप के खिलाफ अमेरिका में ऐतिहासिक प्रोटेस्ट, 50 राज्यों में इतने जगहों पर प्रदर्शन, 80 लाख से ज्यादा लोग शामिल

व्हाइट हाउस की दीवारें हिल गई हैं। उधर, यूरोप में ‘नो किंग्स’ (No Kings) आंदोलन ने ट्रंप की नींद उड़ा दी है।

4pm न्यूज नेटवर्क: जब ज़ुल्म हद से बढ़ जाता है, तो तबाही का रास्ता खुद-ब-खुद साफ़ होने लगता है। आज 29 मार्च 2026 की ये तारीख इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में लिखी जाएगी। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की जोड़ी ने पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की आग में झोंक दिया है, तो दूसरी तरफ खुद अमेरिका के अंदर ‘ज्वालामुखी’ फट पड़ा है।

बड़ी खबर ये है कि अमेरिका के 50 राज्यों में 3500 जगहों पर ऐतिहासिक प्रोटेस्ट (Protest) शुरू हो गए हैं। करीब 80 लाख लोग सड़कों पर हैं और नारा एक ही है— “ट्रंप की हवस की जंग बंद करो!”

व्हाइट हाउस की दीवारें हिल गई हैं। उधर, यूरोप में ‘नो किंग्स’ (No Kings) आंदोलन ने ट्रंप की नींद उड़ा दी है। लेकिन तबाही रुकी नहीं है, बल्कि ईरान के वॉटर प्लांट पर अमेरिका और इज़राइल ने कायराना हमला किया है। क्या ये ईरान को प्यासा मारने की साजिश है?

ट्रंप साहब को लगता था कि वे ईरान पर बम बरसाएंगे और अमेरिका की जनता उन्हें ‘हीरो’ मानेगी। लेकिन पासा उल्टा पड़ गया है। आज अमेरिका का कोना-कोना ट्रंप विरोधी नारों से गूँज रहा है। 50 राज्यों में फैले इस विरोध प्रदर्शन ने वियतनाम वॉर की यादें ताज़ा कर दी हैं। 80 लाख लोग—जिनमें छात्र, मज़दूर और पूर्व सैनिक शामिल हैं—वे पूछ रहे हैं कि हमारे टैक्स का पैसा निर्दोष ईरानियों के खून में क्यों बहाया जा रहा है?

अमेरिका में ईरान युद्ध और ट्रंप की नीतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं। ‘नो किंग’ आंदोलन के तहत पूरे अमेरिका में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। आयोजकों के मुताबिक, सभी 50 राज्यों में 3200 से ज़्यादा प्रदर्शन आयोजित किए गए, जिनमें बड़े शहरों के साथ छोटे कस्बों में भी भारी भागीदारी रही। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह आंदोलन इस साल का तीसरा बड़ा विरोध प्रदर्शन है और इसमें लाखों लोगों के शामिल होने का अनुमान है। न्यूयॉर्क से लेकर छोटे शहरों तक फैले इन प्रदर्शनों से साफ़ है कि युद्ध और इमिग्रेशन नीति को लेकर लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर, यूरोप में भी ‘नो किंग्स’ प्रोटेस्ट ने ट्रंप को ‘आधुनिक तानाशाह’ करार दे दिया है। लोग कह रहे हैं कि हमें लोकतंत्र चाहिए, किसी ‘पागल राजा’ का हुक्म नहीं। ट्रंप साहब, आप दुनिया जीतने निकले थे, लेकिन अपने ही देश में हार गए हैं। आपकी सत्ता की चूलें हिल चुकी हैं। हालांकि, पूरी दुनिया में ट्रंप के खिलाफ इतने प्रोटेस्ट का फिलहाल कोई खास असर व्हाइट हाउस पर नहीं दिख रहा। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एबिगेल जैक्सन ने इन प्रदर्शनों को ‘वामपंथी फंडिंग नेटवर्क’ का नतीजा बताया।

एपी (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि इनमें असली जनसमर्थन बहुत कम है। जैक्सन के मुताबिक— “इन ‘ट्रंप डिरेंजमेंट थेरेपी सेशंस’ में सिर्फ वे रिपोर्टर दिलचस्पी लेते हैं जो इनको कवर करने के लिए पैसे लेते हैं।” राष्ट्रीय रिपब्लिकन कांग्रेस कमेटी ने भी इसकी कड़ी आलोचना की। प्रवक्ता मौरीन ओटूल ने कहा— “ये ‘हेट अमेरिका’ रैलियां हैं, जहाँ वामपंथ के सबसे हिंसक और विकृत सपने माइक पर आते हैं।”

व्हाइट हाउस न सिर्फ इन प्रदर्शनों के विरोध में है, बल्कि ईरान के साथ उसने बहुत ही कायराना हरकत की है। वैसे तो युद्ध के भी कुछ नियम होते हैं, लेकिन ट्रंप और नेतन्याहू के लिए नियम नाम की कोई चीज़ नहीं है। खबर आई है कि अमेरिकी और इज़रायली फाइटर जेट्स ने ईरान के एक अहम वॉटर प्लांट को निशाना बनाया है। ट्रंप साहब— ये आपकी और आपकी सेना की नीच हरकत है।

आप फौज से नहीं लड़ पा रहे, तो अब आम लोगों का पानी बंद कर रहे हैं? राफेल ग्रॉसी ने पहले ही परमाणु खतरे की चेतावनी दी थी, और अब ये ‘वॉटर वॉर’। ये सीधे तौर पर ‘वॉर क्राइम’ है। सवाल यह है कि ट्रंप और नेतन्याहू—क्या गाज़ा को श्मशान बनाकर आपका मन नहीं भरा, जो अब ईरान के मासूम बच्चों को प्यासा मारना चाहते हैं? लेकिन याद रखिएगा, ये प्यास एक दिन आपके साम्राज्य को पी जाएगी।

एक ओर जहाँ नेतन्याहू आग लगा रहे हैं, वहीं हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान अब ‘फायर ब्रिगेड’ की भूमिका में आ गया है। आज इस्लामाबाद में एक बहुत बड़ी बैठक हो रही है। पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र—ये तीन देश मिलकर एक ऐसा शांति प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं जो नेतन्याहू की अकड़ ढीली कर देगा।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और विदेश मंत्री ने साफ़ कर दिया है कि अगर ये जंग नहीं रुकी, तो पूरा एशिया इसकी चपेट में आएगा। पाकिस्तान इस वक्त ईरान और अमेरिका के बीच उस ‘पुल’ का काम कर रहा है जिसकी ज़रूरत दुनिया को सबसे ज़्यादा है। अब सवाल ये है कि क्या ट्रंप पाकिस्तान की बात मानेंगे, या अपने अहंकार में सुलह को लेकर ‘उछल-कूद’ मचा रहे पाकिस्तान को भी किनारे लगा देंगे?

पाकिस्तान जो भी कोशिशें सुलह-समझौते को लेकर कर रहा है, उसको अमली जामा पहनाए जाने की संभावनाएं बहुत कम हैं। क्योंकि जंग का दायरा अब लगातार बढ़ता जा रहा है। जिस तरह से अरब देशों के समर्थन में यूक्रेन उतर पड़ा है, उसे देखकर लगता है कि देर-सबेर ही सही, लेकिन महाजंग में रूस की एंट्री होना तय है।

इस महाजंग में एक और खतरनाक मोड़ आ गया है। अचानक यूक्रेन ने इस जंग में अमेरिका का साथ देने का ऐलान कर दिया है। जेलेंस्की को लगता है कि वे ट्रंप को खुश करके अपना मतलब निकाल लेंगे, लेकिन वे भूल रहे हैं कि अगर रूस इस मामले में एक्टिव हुआ, तो यूक्रेन का नक्शा ही मिट जाएगा। पुतिन ने पहले ही कह दिया है कि अगर किसी ने ईरान की संप्रभुता से खिलवाड़ किया, तो रूस हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेगा।

यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने बड़ा दावा किया है कि रूस ने ईरान के हमले से पहले खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सैटेलाइट तस्वीरें ली थीं। जेलेंस्की के मुताबिक, 24 और 25 मार्च को सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस समेत कई अहम ठिकानों की तस्वीरें कैप्चर की गईं। उन्होंने यह भी कहा कि कुवैत एयरपोर्ट, कतर और तुर्किये के सैन्य बेस और तेल ठिकानों की भी इमेजिंग की गई।

जेलेंस्की ने आरोप लगाया कि रूस की यह जानकारी ईरान के हमलों में इस्तेमाल हो सकती है। ऐसे में अगर मामला बढ़ा, तो जंग में सीधे रूस-चीन ही नहीं, बल्कि नाटो देशों की एंट्री भी हो सकती है, क्योंकि अमेरिका, नाटो देश और यूक्रेन पहले से रूस के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं।

इस सबके बीच, होर्मुज स्ट्रेट को ‘ट्रंप स्ट्रेट’ बनाने के लिए अमेरिकी जंगी जहाज़ ‘यूएसएस त्रिपोली’ (USS Tripoli) 3500 कमांडोज़ को लेकर मिडिल ईस्ट पहुँच चुका है। खबर है कि ये कमांडोज़ ईरान के खार्ग द्वीप (Kharg Island) पर उतरने की फिराक में हैं।

ट्रंप साहब, खार्ग पर पैर रखना मतलब मौत के कुएँ में कूदना है। ईरान के 10 लाख लड़ाके आपके इन 3500 सैनिकों का इंतज़ार नरक के दरवाज़े पर कर रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या ट्रंप अपनी सेना उतारते हैं या फिर उसे सिर्फ ‘शो-पीस’ बनाकर रखते हैं।

ट्रंप ने 10 दिन के सीज़फायर का वादा किया था, लेकिन शायद यह दावा पूरा नहीं हुआ। क्योंकि कल जो ईरान के न्यूक्लियर प्लांटों पर हमले हुए हैं और वॉटर प्लांटों पर हमले में भी अमेरिका का हाथ बताया जा रहा है, उससे हकीकत कुछ और ही दिखती है। ऐसे में एक तरफ ट्रंप दुनिया के सामने झूठी दिलासा दे रहे हैं कि वे बातचीत को तैयार हैं और जंग रोक दी है, तो वहीं दूसरी ओर इज़राइल और अपनी सेना के ज़रिए हमले भी करवा रहे हैं। ट्रंप की कलई पूरी तरह से खुल गई है।

अमेरिका में एक साथ सड़कों पर 80 लाख लोगों का उतरना इस बात का बड़ा सबूत है कि अमेरिका में ट्रंप की लोकप्रियता का ग्राफ तेज़ी से गिर रहा है और उनकी सत्ता भी हिल सकती है। अब तक दो बार जंग रोके जाने को लेकर अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में प्रपोज़ल आ चुका है। ट्रंप सिर्फ कुछ वोटों के अंतर से ही ये प्रस्ताव गिरा पा रहे हैं। जिस तरह से पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे हैं, अगर कुछ सांसद भी पलटे तो पूरा खेल पलट सकता है। ऐसे में ट्रंप कहीं न कहीं बुरी तरह फँसे हुए हैं।

कि 29 मार्च 2026 की ये सुबह एक तरफ खौफनाक है, तो दूसरी तरफ उम्मीद भी जगाती है। खौफ—ट्रंप और नेतन्याहू के पागलपन का, और उम्मीद—उन 80 लाख लोगों की जो शांति के लिए सड़कों पर हैं। जंग कभी किसी समस्या का हल नहीं रही, ये सिर्फ तबाही लाती है।

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