रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का आरोप, कहा- अमेरिका-इजराइल नहीं चाहते शांति

कतर, यूएई और सऊदी अरब मिलकर अमेरिका को इस जंग के खर्चे के तौर पर 200 बिलियन डॉलर यानी करीब 16 लाख करोड़ रुपए देने पर मजबूर किए गए हैं।

4pm न्यूज नेटवर्क: ईरान से गद्दारी कर अमेरिका और इज़राइल की गोद में खेलने वाले अरब देशों को ज़ोर का झटका लगा है। आज की ये तारीख इतिहास में ‘महा-वसूली’ के दिन के तौर पर दर्ज होने जा रही है। एक तरफ ईरान के साथ जंग को 32 दिन बीत चुके हैं, लेकिन शांति की कोई गुंजाइश नज़र नहीं आ रही, और अब डोनाल्ड ट्रंप ने वो नया दांव खेल दिया है जिससे खाड़ी देशों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई है।

व्हाइट हाउस से बड़ी खबर आ रही है कि कतर, यूएई और सऊदी अरब मिलकर अमेरिका को इस जंग के खर्चे के तौर पर 200 बिलियन डॉलर यानी करीब 16 लाख करोड़ रुपए देने पर मजबूर किए गए हैं। यानी कि जंग अमेरिका की, गलतियाँ ट्रंप की, लेकिन हर्जाना अरब शेखों का! उधर, इज़राइल के जंगबाज़ पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने एक ऐसा खूनी कानून पास कर दिया है जिससे 10,000 फिलिस्तीनियों की गर्दन पर फांसी का फंदा लटक गया है। हैरानी की बात यह है कि ईरान में फांसी का विरोध करने वाले ट्रंप की आवाज़ अब इस पर नहीं निकल रही है। हालांकि, इस सबके बीच रूस एक्टिव हुआ है और कुछ ऐसा कह दिया है जिससे हड़कंप मच गया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने क्या कुछ कहा है और कैसे अब जंग का खर्चा ईरान से गद्दारी करने वाले अरब देशों के सिर आ गया है,

अमेरिका-ईरान जंग 32वें दिन में पहुँचने वाली है। अभी तक ट्रंप जो ईरान को वेनेजुएला समझने की भूल कर रहे थे, अब उनकी आँखों से पर्दा उठना शुरू हो चुका है। 32 दिन बीत जाने के बाद उन्हें यह जानकारी हो चुकी है कि ईरान से मुकम्मल जंग लड़ने के लिए अभी भी कम से कम दो-तीन महीने का समय और चाहिए। इसके बावजूद यह तय नहीं है कि सत्ता में परिवर्तन हो पाएगा या नहीं।

इसको लेकर सिर्फ ट्रंप ही नहीं बल्कि पेंटागन भी परेशान है, क्योंकि एक ओर भारी खर्चा हो रहा है तो दूसरी ओर बिना मतलब सैनिकों की जान जोखिम में है। इस जंग का परिणाम क्या होगा, यह किसी को नहीं पता। पेंटागन पहले ही पैसे की कमी का रोना रो चुका है। जंग के लिए अलग से फंड अलॉट किए जाने की डिमांड हो चुकी है, लेकिन अभी तक कांग्रेस से यह बजट पास नहीं हुआ है। ऐसे में जंग आगे कैसे चलेगी, इसके लिए ट्रंप ने एक बार फिर अरब देशों को ‘बलि का बकरा’ बनाने की तैयारी शुरू कर दी है।

ईरान के खिलाफ जंग लड़ना अमेरिका का अपना प्लान था। हालांकि कुछ दावों के मुताबिक इसमें इज़राइल का बड़ा रोल है, लेकिन अब तक जो बातें सामने आई हैं, उनमें यह पूरी तरह साफ़ है कि जंग का फैसला अमेरिका का अपना था। उसने इज़राइल के कंधे पर बंदूक रखकर चलाई और अब वह इस युद्ध में पूरी तरह शामिल है। ऐसे में उसके ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ पर बेशुमार पैसा खर्च हो रहा है। पहले पांच हफ्तों में ही अमेरिका के 35 अरब डॉलर से ज़्यादा खर्च हो चुके हैं, यानी हर दिन करीब 1 अरब डॉलर (लगभग 8,300 करोड़ रुपये) का बिल बन रहा है।

अमेरिकी रक्षा विभाग ‘पेंटागन’ का कहना है कि उनकी मिसाइलों और समुद्री जहाजों के परिचालन में बहुत पैसा लग रहा है। अब अमेरिका चाहता है कि यह सारा पैसा अरब देश चुकाएं। उन्होंने 1990-91 के पुराने युद्ध की मिसाल दी है, जब कुवैत और सऊदी अरब ने अमेरिका के युद्ध का सारा खर्चा उठाया था। जानकारों का मानना है कि इस बार युद्ध का कुल खर्च 200 अरब डॉलर यानी 16 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर जा सकता है, जिसे चुकाने का दबाव अरब देशों पर डाला जा रहा है।

व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलिन लेविट ने 30 मार्च को प्रेस ब्रीफिंग के दौरान कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप इस विचार में दिलचस्पी रखते हैं कि ईरान से जुड़े युद्ध या सैन्य कार्रवाई की लागत में अरब देश भी योगदान दें। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन आने वाले समय में इस विषय पर ट्रंप की ओर से और स्पष्ट बयान सामने आ सकते हैं।

देखा जाए तो इस युद्ध से उन अरब देशों को भी अच्छा-खासा नुकसान हुआ है, जिन पर यह बोझ डालने की तैयारी चल रही है। जब ईरान ने सऊदी अरब, दुबई और बहरीन जैसे अपने पड़ोसी देशों पर हमले शुरू किए, तो इसका गहरा आर्थिक असर देखने को मिला। सुख-शांति के साथ-साथ कमाई के ज़रिए भी जाते रहे। बहरीन की ‘सितरा’, यूएई की ‘रुवैस’ और सऊदी अरब की ‘रास तनुरा’ जैसी बड़ी तेल रिफाइनरियां पूरी तरह बंद हो गईं।

इतना ही नहीं, इतिहास में पहली बार सेना ने उन डेटा सेंटरों पर भी हमला किया जहाँ इंटरनेट और अमेज़न जैसी कंपनियों का सारा काम चलता है। इससे पूरी दुनिया में इन देशों की तकनीक और सुरक्षा को लेकर डर बैठ गया है और टूरिज़्म की तो कमर ही टूट गई है। युद्ध की वजह से खाड़ी के सभी देशों ने अपना हवाई क्षेत्र (Airspace) बंद कर दिया, जिसका मतलब था कि कोई भी हवाई जहाज़ वहाँ से नहीं गुज़र सकता था। यह सब रमज़ान के दौरान हुआ, जब बहुत से लोग वहाँ घूमने या इबादत के लिए जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, इस वजह से इन देशों को करीब 40 अरब डॉलर (लगभग 3.3 लाख करोड़ रुपये) का घाटा हुआ है।

दुनिया का सबसे व्यस्त माना जाने वाला दुबई एयरपोर्ट भी अनिश्चित काल के लिए बंद करना पड़ा। इसके साथ ही, कतर जैसा देश जो दुनिया को गैस सप्लाई करता है, उसे भी अपने कारखाने बंद करने पड़े। इन क्षतिग्रस्त कारखानों और बंदरगाहों को फिर से ठीक करने में ही कम से कम 25 अरब डॉलर का खर्चा आएगा। बैंकों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह युद्ध अप्रैल के आखिर तक चला, तो कुवैत और कतर जैसे देशों की कमाई में 14 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ सकती है।

सच तो यह है कि अरब देशों के लिए यह पैसा दे पाना बहुत मुश्किल है। इसके तीन बड़े कारण हैं: पहला तो यह कि वे खुद इस युद्ध में बुरी तरह बर्बाद हो चुके हैं, उनके कारखाने बंद हैं और कमाई रुक गई है। दूसरा कारण है होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता बंद होना; यह वह समुद्री रास्ता है जहाँ से इनका सारा तेल विदेशों में बिकने जाता है। अब आगे क्या होगा, यह बड़ा सवाल है, लेकिन फिलहाल बहरीन, सऊदी अरब, यूएई और कतर बुरी तरह फंसे हुए हैं। इन देशों में इतनी भी हिम्मत नहीं है कि ट्रंप को मना कर सकें, लेकिन जिस तरह से ईरान ने इन्हें भयंकर नुकसान पहुँचाया है, अब ये अपने नुकसान की भरपाई करेंगे या अमेरिका के नुकसान को कवर करेंगे? यह इन देशों के सामने बड़ा संकट है।

ट्रंप साहब का सीधा तर्क है— “हम आपकी हिफाज़त के लिए ईरान से लड़ रहे हैं, तो खज़ाना भी आप ही खोलिए।” लेकिन हकीकत यह है कि ट्रंप अपनी रणनीतिक नाकामियों का ठीकरा अरब मुल्कों पर फोड़ रहे हैं। उन्होंने होर्मुज को हल्के में लिया, ईरान की ताकत को कम आँका और अब जब अमेरिकी इकोनॉमी हिचकोले खा रही है, तो उन्हें ‘शेखों की तिजोरी’ याद आ रही है। सवाल यह है कि क्या ये 16 लाख करोड़ रुपए तो सिर्फ शुरुआत है? असल बिल तो इतना बड़ा होगा कि अरब देशों की आने वाली नस्लें भी उसे चुकाते-चुकाते थक जाएंगी।

ऐसे में जहाँ एक तरफ ट्रंप पैसों की वसूली में लगे हैं, वहीं उनके जोड़ीदार नेतन्याहू ने इंसानियत का गला घोंट दिया है। 30 मार्च की देर रात इज़रायली संसद ने एक ऐसा कानून पास किया है जो पूरी दुनिया के लिए ‘डेथ वारंट’ है। इस कानून के तहत, इज़रायली नागरिकों या सैनिकों पर हमले के आरोपी फिलिस्तीनियों को अब फांसी की सज़ा दी जाएगी। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि इज़रायली कालकोठरियों में बंद करीब 10,000 फिलिस्तीनियों पर अब इस कानून की तलवार लटक रही है। नेतन्याहू साहब, क्या गाज़ा को श्मशान बनाना काफी नहीं था? अब आप अदालतों को कसाईखाना बनाने पर उतारू हैं? यूएन चीख रहा है, एमनेस्टी इंटरनेशनल गुहार लगा रहा है, लेकिन ट्रंप और नेतन्याहू की जोड़ी को सिर्फ मासूमों के खून की महक पसंद आ रही है।

इस पूरे तमाशे के बीच रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने दुनिया को आईना दिखा दिया है। लावरोव ने साफ़ लफ़्ज़ों में कहा है कि अमेरिका और इज़राइल कभी शांति नहीं चाहते; इनका असल मकसद मिडिल ईस्ट को बाँटना और उस पर राज करना है। लावरोव ने पोल खोल दी है कि अमेरिका ‘डिवाइड एंड रूल’ की पॉलिसी पर चल रहा है। वे चाहते हैं कि अरब और ईरान आपस में लड़ते रहें, ताकि अमेरिकी हथियार बिकते रहें और डॉलर की साख बनी रहे। लावरोव ने चेतावनी दी है कि अगर यह परमाणु सनक और ‘फांसी वाला कानून’ नहीं रुका, तो रूस हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठेगा। क्या पुतिन की यह चुप्पी किसी बड़े तूफ़ान का संकेत है?

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