CM नीतीश की निगाह अब PM की कुर्सी पर, JDU की शर्त ने बढ़ाया सस्पेंस

बिहार की राजनीति में काफी दिनों से यह दावा तैर रहा है कि नीतीश कुमार 12 या 13 अप्रैल को इस्तीफा दे सकते हैं। पहले वे 10 तारीख को राज्यसभा की सदस्यता की शपथ लेंगे, फिर वापस पटना आकर 12 या 13 तारीख को राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा सौंप सकते हैं।

4pm न्यूज नेटवर्क: बिहार की सियासत के ‘महागुरु’ यानि कि नीतीश कुमार अब दिल्ली में डेरा डाल चके हैं। । अभी तक जो पीएम साहब और उनके ‘चाणक्य’ यह समझ रहे हैं कि उन्होंने नीतीश कुमार को बिहार से हटाकर बड़ा गेम कर दिया है, तो यह उनकी बड़ी भूल साबित हो सकती है।

खेल सिर्फ पटना में नहीं, बल्कि दिल्ली में भी हो सकता है, क्योंकि काफी दिनों से नीतीश कुमार की नज़र पीएम की कुर्सी पर है। ऐसे में न सिर्फ पीएम साहब को, बल्कि चाणक्य जी को भी ज़ोर का झटका लग सकता है। एक बड़ी खबर सामने आई है कि इस बार पटना के बजाय दिल्ली में जेडीयू की हाई-लेवल मीटिंग होने जा रही है, वो भी नीतीश कुमार के इस्तीफे से पहले। ऐसे में यह सुगबुगाहट तेज़ है कि कहीं नीतीश कुमार ने सीएम की कुर्सी छोड़कर पीएम की कुर्सी के लिए तो बड़ा गेम नहीं खेला? क्या ऐसा सच में हो सकता है और क्यों अचानक दिल्ली में जेडीयू की हाई-लेवल मीटिंग बुलाई गई है?

बिहार की राजनीति में काफी दिनों से यह दावा तैर रहा है कि नीतीश कुमार 12 या 13 अप्रैल को इस्तीफा दे सकते हैं। पहले वे 10 तारीख को राज्यसभा की सदस्यता की शपथ लेंगे, फिर वापस पटना आकर 12 या 13 तारीख को राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा सौंप सकते हैं। लेकिन अब इसमें एक बड़ा अपडेट सामने आया है कि 10 अप्रैल को राज्यसभा की शपथ से पहले नीतीश कुमार ने 9 तारीख को दिल्ली में जेडीयू की हाई-लेवल मीटिंग बुला ली है। 9 अप्रैल को होने वाली इस बैठक को बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह बैठक केवल औपचारिक चर्चा नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य की सत्ता का खाका खींचने के लिए बुलाई गई है। इस दौरान पार्टी नेतृत्व यह तय करेगा कि नीतीश कुमार के बाद बिहार की कमान किसके हाथों में सौंपी जाएगी और गठबंधन का स्वरूप क्या होगा? निशांत कुमार को कैसे एडजस्ट किया जाए? दिल्ली में होने वाली इस बैठक में जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह (राजीव रंजन सिंह) सहित पार्टी के सभी शीर्ष रणनीतिकार शामिल होंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद इस मंथन की सदारत (नेतृत्व) करेंगे, जहाँ पार्टी के भविष्य और संगठनात्मक मजबूती पर गंभीर विचार-विमर्श किया जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले ‘उत्तराधिकार’ की योजना स्पष्ट करना चाहते हैं। बैठक का मुख्य एजेंडा बिहार में संभावित सत्ता परिवर्तन और मुख्यमंत्री पद के लिए नए विकल्पों पर चर्चा करना है। पार्टी चाहती है कि नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति में भी राजनीतिक संतुलन बना रहे। कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से संभावित इस्तीफे और राज्यसभा जाने की चर्चाओं के बीच, अगले मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम मुहर लगनी है।

बिहार में भाजपा और जेडीयू के गठबंधन वाली नई सरकार के गठन और कैबिनेट की रूपरेखा पर इस बैठक में विस्तार से चर्चा होगी। नीतीश कुमार के राष्ट्रीय राजनीति में जाने के बाद जेडीयू के अस्तित्व और संगठन को मजबूत बनाए रखने के लिए वरिष्ठ नेताओं के साथ मंथन होगा। कुछ दावे ऐसे भी हैं कि ‘सीएम ट्रांसफर’ के बाद बेहतर समन्वय (Coordination) सुनिश्चित करना और किसी भी किस्म की राजनीतिक अस्थिरता को रोकना मुख्य एजेंडा है।

नीतीश कुमार की राज्यसभा शपथ ने बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा को हवा दी है। दिल्ली में होने वाली यह बैठक नीतीश कुमार के इस्तीफे से ठीक पहले आयोजित की जा रही है। ऐसे में जेडीयू नेतृत्व यह सुनिश्चित करना चाहता है कि सहयोगी दलों के साथ तालमेल और संगठन की पकड़ किसी भी परिस्थिति में कमजोर न हो। लेकिन इस सबके बीच बिहार में ‘सीएम फेस’ को लेकर हलचल मची है। जेडीयू विधायक यह पहले से ही साफ कर चुके हैं कि वे किसी भी कीमत पर सीएम का पद दूसरे दल को नहीं देना चाहते। ऐसे में जेडीयू प्रवक्ता के आवास पर लगे नए पोस्टर ने पूरा हंगामा खड़ा कर रखा है। पोस्टर में नीतीश कुमार और उनके बेटे निशांत कुमार की तस्वीर के साथ लिखी लाइन— “विरासत मजबूत, भविष्य दमदार, निशांत तैयार”—अब चर्चा का बड़ा विषय बन चुकी है।

जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार के सरकारी आवास पर लगे इस पोस्टर को कई मायनों में अहम माना जा रहा है। पोस्टर में नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत और निशांत कुमार को उससे जोड़ते हुए एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की गई है। खास बात यह है कि यह पोस्टर ऐसे समय में सामने आया है, जब बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें तेज़ हैं। पोस्टर में ‘तीर’ (जेडीयू का चुनाव चिन्ह) का भी ज़िक्र है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर निशांत कुमार को भविष्य के नेतृत्व के रूप में ‘प्रोजेक्ट’ किया जा रहा है।

बहुत से दावे इस तरह के हैं कि नीतीश कुमार जो बैठक दिल्ली में 9 तारीख को कर रहे हैं, उसका मकसद न सिर्फ निशांत को सेट करना है, बल्कि दिल्ली की सियासत में भी बराबर की साझेदारी करनी है। क्योंकि भले ही जेडीयू के पास मोदी सरकार के कई अहम मंत्रालय हैं, लेकिन सच यह है कि देश की राजनीति में जेडीयू कहीं मजबूती से खड़ी दिखाई नहीं देती। केंद्र में जो जेडीयू के लीडर हैं, वे मोदी के मंत्रियों के आगे दब जाते हैं, लेकिन नीतीश के आने से यह कमी पूरी हो सकती है। वैसे यह भी माना जा रहा है कि नीतीश कुमार को मंत्री पद मिल सकता है, लेकिन नीतीश की पहली प्राथमिकता अब निशांत को लेकर है।

दूसरी ओर, कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार अब बिहार की सरहदों से बाहर निकलना चाहते हैं। राज्यसभा जाना इस बात का इशारा है कि वे केंद्र की राजनीति में एक बड़ी भूमिका तलाश रहे हैं। चर्चा तो यहाँ तक है कि वे खुद को पीएम पद के विकल्प या किसी बड़े राष्ट्रीय ओहदे के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं। और यह कोई पहली बार नहीं है, बल्कि पिछले चुनाव से पहले भी नीतीश ने यह दांव चला था, लेकिन तब उनका यह दांव फेल हो गया था और फिर से उन्हें वापस एनडीए में जाना पड़ा था।

लेकिन इस बार नीतीश कुमार दिल्ली जाने से पहले अपने घर को महफूज़ (सुरक्षित) करना चाहते हैं। जेडीयू चाहती है कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी पार्टी के भीतर कोई बगावत न हो और जिस तरह नीतीश कुमार ने पार्टी को एकजुट कर रखा है, निशांत भी उसे वैसे ही एकजुट रखें। इसीलिए निशांत कुमार को ‘निरंतरता’ (Continuity) के तौर पर पेश किया जा रहा है।

जेडीयू इसे वंशवाद नहीं, बल्कि विरासत की मजबूती कह रही है। ऐसे में बिहार की राजनीति इस वक्त कांच की तरह नाज़ुक है। एक तरफ बीजेपी है जो बिहार में अपना मुख्यमंत्री चाहती है, तो दूसरी तरफ जेडीयू है जो अपनी शर्तों पर समझौता करना चाहती है। 9 अप्रैल की बैठक में गठबंधन के स्वरूप और नई कैबिनेट की रूपरेखा पर भी मुहर लगनी है।

क्या बीजेपी निशांत कुमार के उभार को खामोशी से स्वीकार कर लेगी? क्या चिराग पासवान और सम्राट चौधरी जैसे नेता इस नए समीकरण में फिट बैठेंगे? यह जेडीयू के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति है। अगर नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी तय करने में चूक हुई, तो जेडीयू का वजूद खतरे में पड़ सकता है।

बिहार एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ से ‘नीतीश युग’ की विदाई और ‘निशांत युग’ की आहट सुनाई दे रही है। नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना सिर्फ एक पद का बदलाव नहीं, बल्कि बिहार की सत्ता का पूरा गियर बदलने जैसा है। 9 अप्रैल का फैसला तय करेगा कि बिहार की बागडोर किसके हाथ में जाएगी और क्या नीतीश कुमार दिल्ली फतह करने में कामयाब होंगे? क्या निशांत कुमार वाकई ‘दमदार भविष्य’ साबित होंगे या यह दांव उल्टा पड़ जाएगा?

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