चुनाव आयोग की बीच बैठक में आईएएस अनुराग यादव की छुट्टी क्या निष्पक्षता पर ब्रेक ?

  • सीईसी ज्ञानेश कुमार ने की कार्रवाई, पश्चिम बंगाल चुनाव में बतौर ऑब्जर्वर की मिली थी जिम्मेदारी
  • इससे पहले चुनाव आयोग के ट्वीट पर मच चुका था बवाल
  • सीईसी ज्ञानेश कुमार पर विपक्षी पार्टियां गर्म टीएमसी और सपा की तरफ से सवालों की बौछार

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश की सबसे संवेदनशील और निष्पक्ष मानी जाने वाली संस्थाओं में से एक चुनाव आयोग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। वजह बनी है एक ऐसी घटना जिसने नौकरशाही और संवैधानिक संस्थाओं के रिश्तों पर नया विवाद खड़ा कर दिया है। उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव आईएएस अनुराग यादव को पश्चिम बंगाल चुनाव में बतौर ऑब्जर्वर की जिम्मेदारी से हटाए जाने की खबर ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। यह फैसला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ एक वर्चुअल मीटिंग में हुई तीखी झड़प के बाद लिया गया है।

क्या पहले से निशाने पर थे अनुराग यादव?

सोशल मीडिया पर इस खबर के आम होने के बाद यह खबर तेजी से फैली और बहस शुरू हो गयी। सोशल मीडिया यूजर अनिल यादव ने इस घटना को उनकी जाति से जोड़कर सवाल पूछा है कि क्या अनुराग यादव पहले से सीईसी के निशाने पर थे। सपा नेता मनोज यादव कहते हैं कि अनुराग जी एक सक्षम अधिकारी है। वर्षों का अनुभव और उच्च पदों पर आसीन रह चुके अनुराग यादव पर जो आरोप लगाये जा रहे हैं वह गलत हैं। मनोज यादव कहते हैं कि अनुराग यादव पहले से निशाने पर थे क्योंकि सभी को पता है कि अनुराग यादव के रहते गलत काम हो ही नहीं सकता। वह गलत नहीं कर सकते। शायद यही कारण राह कि उन्हें बहाने से हटाया गया।

सवाल का जवाब नहीं दे पाने का आरोप

मीटिंग के दौरान अनुराग यादव से उनके निर्वाचन क्षेत्र में मतदान केंद्रों की संख्या से जुड़े कुछ बुनियादी सवाल पूछे गए थे लेकिन वे सटीक जानकारी देने में विफल रहे। इस पर सीईसी ज्ञानेश कुमार ने उनकी आलोचना की। चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि एक पर्यवेक्षक आयोग की आंख और कान होता है। यदि कोई अधिकारी जमीन पर कई दिन बिताने के बाद भी मतदान केंद्रों की संख्या जैसी बुनियादी जानकारी की पुष्टि नहीं कर पाता तो इससे पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। आज की इस बैठक में कूच बिहार के संवेदनशील मतदान केंद्रों के मुद्दे पर भी चर्चा की गई। बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने ऐसे क्षेत्रों में निषेधाज्ञा लागू करने की संभावना का सुझाव दिया। इलेक्शन कमीशन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मुख्य सचिव ने प्रत्येक जिले के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हर मतदान केंद्र पर न्यूनतम सुनिश्चित सुविधाएं उपलब्ध हों।

शांत चेहरा सख्त निर्णय प्रशासनिक दक्षता का नाम है अनुराग यादव

भारतीय प्रशासनिक सेवा में कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं जो सुर्खियों से ज्यादा सिस्टम की नसों में बहते नजर आते हैं। अनुराग यादव की छवि शांत संयमित लेकिन निर्णायक अधिकारी के तौर पर मानी जाती है। उत्तर प्रदेश कैडर से आईएएस अधिकारी अनुराग यादव की पहचान केवल पदों से नहीं बल्कि कार्यशैली से बनी है। अनुराग यादव ने अपने प्रशासनिक करियर में जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक कई अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं। झांसी के जिलाधिकारी के रूप में उनका कार्यकाल यह दर्शाता है कि वह जमीनी प्रशासन की बारीकियों को समझने वाले अधिकारी रहे हैं। जहां फैसले कागज पर नहीं बल्कि जनता के बीच जाकर लिए जाते हैं। वर्तमान में प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत हैं। अनुराग यादव की कार्यशैली का सबसे बड़ा पहलू है संतुलन। वह न तो अनावश्यक आक्रामकता के पक्षधर दिखते हैं न ही ढीले ढाले प्रशासन के। यही कारण है कि उन्हें कई संवेदनशील पदों पर तैनात किया जाता है जहां फैसले केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक संतुलन को भी साधते हो। एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में उनकी पहचान एक ऐसे प्रशासक की बनती है जो दबाव में भी निर्णय लेने से पीछे नहीं हटता।

चुनाव आयोग की छवि पर सवाल?

पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर पहले से ही चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे थे। विपक्ष खासकर तृणमूल कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही थी कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी है। दो दिन पहले ही आयोग द्वारा किए गए एक ट्वीट में टीएमसी का नाम आने पर भी विवाद भड़क उठा था। उस विवाद की आंच अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि यह नया टकराव सामने आ गया जैसे किसी सुलगती आग पर किसी ने पेट्रोल छिड़क दिया हो। यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है कि क्या एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को इस तरह अचानक हटाना प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा था या फिर यह किसी ऊपर से आए दबाव का नतीजा? क्या यह केवल अनुशासन का मामला है या फिर असहमति की आवाज को दबाने का एक और उदाहरण? सिस्टम के गलियारों में फुसफुसाहट तेज है। क्या अब संवैधानिक संस्थाएं भी लाइन में रहने का दबाव महसूस कर रही हैं? और अगर हां तो लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत का क्या होगा जहां असहमति को भी जगह मिलनी चाहिए? इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत की चुनावी राजनीति अब केवल वोटों की लड़ाई नहीं रही बल्कि यह संस्थाओं की विश्वसनीयता की भी जंग बन चुकी है। और इस जंग में हर एक घटना हर एक टकराव लोकतंत्र की सेहत का आईना बनता जा रहा है।

क्या है घटना

इलेक्शन कमीशन की फुल बेंच वर्चुअल मीटिंग के दौरान आज पश्चिम बंगाल में बतौर पार्यवेक्षक तैनात किये गये आईएएस अधिकारी अनुराग यादव की छुट्टी कर दी गयी। उन पर आरोप लगाया गया कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त के पूछे गये सवालों का जवाब नहीं दे पाये। जबकि अनुराग यादव ने मुख्य चुनाव आयुक्त के लहजे और सवाल पूछने के ढंग पर आपत्ति जाहिर की थी। इसी बात पर बहस गर्म हो गयी और मुख्य चुनाव आयुक्त का पारा चढ़ गया और उनसे घर जाने के लिए कह दिया गया। इस पर आईएएस अनुराग ने जवाब देते हुए कहा कहा कि आप हमारे साथ ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते। हमने इस सेवा में अपने 25 साल दिए हैं। आप इस तरह से बात नहीं कर सकते। अनुराग यादव और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच तीखी बहस के बाद बैठक में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया जिसके बाद अन्य मुद्दों पर चर्चा फिर से शुरू हुई। मुख्य चुनाव आयुक्त ने अनुराग यादव को तत्काल प्रभाव से सामान्य पर्यवेक्षक के पद से हटा दिया। हालांकि चुनाव आयुक्त दफ्तर के सूत्रों ने कहा कि अनुराग यादव को उनके विद्रोही रवैये के कारण नहीं बल्कि पेशेवर अक्षमता के कारण पद से हटाया गया है।

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