इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा! वेंस बोले- हम बिना किसी समझौते के लौट रहे हैं

इस्लामाबाद के जिस आलीशान होटल में पिछले 21 घंटों से हाई-लेवल नेगोशिएशन (बातचीत) चल रही थी, वहाँ आज सन्नाटा पसरा है। जेडी वेंस, जो ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति का हौवा दिखाकर ईरान पर दबाव बनाने आए थे, ईरान ने एक ही झटके में उनके उस दबाव वाले खेल को नेस्तनाबूद कर दिया है।

4pm न्यूज नेटवर्क: आखिरकार वही हुआ जिसका अंदेशा पूरी दुनिया को पहले से ही था। ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ वाली खोखली नीति को ईरान ने सिरे से ठुकरा दिया है और इसका सीधा नतीजा ये निकला है कि इस्लामाबाद में चल रही 21 घंटे की मैराथन वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई है। अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने ऐलान किया है कि वे बिना किसी समझौते के वापस अमेरिका लौट रहे हैं।

जैसे ही वार्ता के बेनतीजा होने की खबरें आम हुईं, ट्रंप ने होर्मुज में हिमाकत करने की एक नाकाम कोशिश की। अमेरिका के एक नहीं, बल्कि दो-दो युद्धपोत होर्मुज में दाखिल होने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन ईरान की सिर्फ एक ‘अंतिम चेतावनी’ ने अमेरिकी युद्धपोतों के रुख मोड़ दिए। हालांकि, वार्ता बेनतीजा होने के पीछे 4 अहम वजहें बताई जा रही हैं। इन चार वजहों से न सिर्फ अमेरिका भाग रहा है, बल्कि अब ट्रंप सीधे तौर पर चीन को धमकियां देने लगे हैं। इस्लामाबाद वार्ता क्यों नाकाम रही और वो कौन से चार मुद्दे हैं जिन पर अमेरिका बुरी तरह डरा हुआ है,

इस्लामाबाद के जिस आलीशान होटल में पिछले 21 घंटों से हाई-लेवल नेगोशिएशन (बातचीत) चल रही थी, वहाँ आज सन्नाटा पसरा है। जेडी वेंस, जो ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति का हौवा दिखाकर ईरान पर दबाव बनाने आए थे, ईरान ने एक ही झटके में उनके उस दबाव वाले खेल को नेस्तनाबूद कर दिया है। ईरान का साफ कहना है कि बातचीत एकतरफा या एक-ध्रुवीय (Unipolar) शर्तों पर नहीं होगी, बल्कि न्याय की कसौटी पर होगी। लेकिन वेंस तो किसी ‘तुर्रम खां’ की तरह अपनी शर्तें थोपना चाहते थे और ईरान ने उन्हें हकीकत का आईना दिखा दिया है।

वेंस अब मुँह लटकाए वॉशिंगटन रवाना हो रहे हैं। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा है कि फिलहाल कोई समझौता मुमकिन नहीं हो सका। हालांकि, उन्होंने अपना चेहरा बचाने के लिए ये ज़रूर जोड़ा कि नेगोशिएशन का चैनल अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है और पाकिस्तान की मध्यस्थता आगे भी जारी रहेगी। कुछ दावे इस तरह से भी सामने आए हैं कि 10 दिन बाद फिर से वार्ता हो सकती है, हालांकि अभी इस पर न तो व्हाइट हाउस और न ही ट्रंप का कोई आधिकारिक बयान आया है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर बात बिगड़ी कहाँ? ईरान का सीधा आरोप है कि अमेरिका कभी सुलह चाहता ही नहीं था।

तेहरान ने दावा किया है कि ट्रंप प्रशासन पहले दिन से ही बातचीत छोड़ने का ‘बहाना’ खोज रहा था। अमेरिका चाहता था कि ईरान अपनी मिसाइलें सरेंडर कर दे और होर्मुज की चाबी ट्रंप को सौंप दे—जो कि कतई नामुमकिन था। ईरान की सख्त और वाजिब शर्तों ने वेंस के पसीने छुड़ा दिए और आखिर में तथाकथित सुपरपावर को ‘नो डील’ के साथ वापस जाना पड़ा।

हर बार की तरह ट्रंप ने इस बार भी अपनी वही पुरानी धोखेबाजी और पलटने वाली फितरत दिखाई है। बातचीत टूटने के तुरंत बाद ट्रंप चुपके से होर्मुज फतेह करने निकल पड़े। दो युद्धपोत अचानक होर्मुज की ओर मोड़ दिए गए। अपनी ‘ईगो’ (अहंकार) को संतुष्ट करने के लिए ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिकी युद्धपोतों को आगे बढ़ने का आदेश दिया। ट्रंप की इस ताज़ा हरकत का मकसद ईरान को डराना था, लेकिन बाजी पूरी तरह पलट गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने होर्मुज खाली करने के संबंध में शनिवार को एक ट्वीट किया। उधर संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह बंदरगाह के पास देखा गया खतरनाक अमेरिकी युद्धपोत होर्मुज की तरफ बढ़ने लगा। ईरान के अधिकारियों ने फौरन इस्लामाबाद में मौजूद अपने स्पीकर गालिबाफ और विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची के पास इसकी सूचना भेजी। ईरान की कड़ी चेतावनी के बाद अमेरिकी युद्धपोत को पीछे हटना पड़ा। ईरानी सशस्त्र बल आईआरजीसी (IRGC) ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिकी युद्धपोत होर्मुज की ओर एक कदम भी आगे बढ़ता है, तो उसे महज़ 30 मिनट के भीतर निशाना बनाया जाएगा। इस धमकी का वो असर हुआ कि युद्धपोत चुपचाप दुम दबाकर लौट गया।

सूत्रों के अनुसार, ईरानी सेना ने इस पोत की हर गतिविधि पर पैनी नज़र रखते हुए इसे होर्मुज स्ट्रेट की ओर बढ़ते हुए ट्रैक किया। इसके बाद इस्लामाबाद में चल रही बातचीत के बीच पाकिस्तानी मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिका को सख्त संदेश भेजा गया। चेतावनी में स्पष्ट कहा गया कि आगे बढ़ने की स्थिति में सीधी सैन्य कार्रवाई की जाएगी। अंतरराष्ट्रीय अमेरिकी मीडिया आउटलेट ‘ब्लूमबर्ग’ ने ईरानी समाचार एजेंसी ‘फ़ार्स’ के हवाले से बताया कि इस चेतावनी के बाद अमेरिकी पोत ने अपनी दिशा बदल ली और वापस लौट गया।

ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने रेडियो संदेश के ज़रिए ऐसी चेतावनी जारी की कि पेंटागन के कमांडरों के हाथ-पाँव फूल गए। ईरान ने दो-टूक कहा कि अगर एक इंच भी सरहद पार की, तो ये युद्धपोत समंदर की गहराई में नज़र आएगा। नतीजा ये हुआ कि अमेरिकी युद्धपोत को उल्टे पांव वापस लौटना पड़ा। यह न सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ट्रंप की करारी हार है, बल्कि ये पूरी दुनिया को संदेश है कि अब होर्मुज का सुल्तान सिर्फ और सिर्फ ईरान है।

अल-जजीरा’ के एक्सपर्ट्स और कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, 4 मुख्य मुद्दों पर बात पूरी तरह अटक गई। इसमें सबसे पहला मामला ‘होर्मुज कंट्रोल’ का है। अमेरिका चाहता था कि ईरान इस सामरिक रास्ते को ‘इंटरनेशनल वाटर्स’ मानकर अपनी निगरानी कम करे और यहाँ अमेरिकी सेना को एंट्री दे, लेकिन ईरान ने साफ कहा कि “ये हमारा घर है, यहाँ पहरा हमारा ही रहेगा।” दूसरी बड़ी बात ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। अमेरिका की डिमांड है कि ईरान अपने न्यूक्लियर रिसर्च को पूरी तरह फ्रीज कर दे।

ईरान इस पर बहुत हद तक तैयार भी था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम को सौंपना तो नहीं चाहता, लेकिन इस बात की लिखित गारंटी दे सकता है कि वह परमाणु बम नहीं बनाएगा। हालांकि, ईरान इसके बदले चाहता है कि उस पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने की लिखित गारंटी अमेरिका भी दे—और इसी से अमेरिका भाग रहा है। क्योंकि अमेरिका जानता है कि जैसे ही ईरान पर से पाबंदियां हटेंगी, वह कुछ ही सालों में अमेरिका के बराबर खड़ा हो जाएगा।

इस्लामाबाद टॉक रद्द होने की तीसरी और सबसे अहम वजह ईरान की ‘फ्रीज’ संपत्तियां हैं। ईरान चाहता है कि इन संपत्तियों को बिना किसी शर्त के बहाल किया जाए। पहले खबर आई थी कि ये बहाल हो गई हैं, लेकिन बाद में व्हाइट हाउस प्रशासन अपनी बात से पलट गया। चौथी वजह ये है कि ईरान ने लेबनान सीज़फायर को लेकर सख्त शर्त रखी है।

ईरान का कहना है कि लेबनान पर इज़राइली हमले तुरंत रोके जाएं। चूंकि इज़राइल ने हमले रोकने से साफ इनकार कर दिया है, तो ईरान ने भी अमेरिका की धौंस मानने से मना कर दिया है। ऐसे में ईरान ने चौतरफा ट्रंप और वेंस को उन्हीं के सवालों में उलझा दिया और वेंस को यह कहकर भागना पड़ा कि बातचीत में कोई डील नहीं हो सकी। जबकि कड़वी सच्चाई ये है कि डील नहीं हो पाने के पीछे अमेरिका की बदनियती का ज्यादा हाथ था।

इस्लामाबाद में असफल वार्ता के बाद ईरान की तरफ से बड़ा आरोप सामने आया है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल के करीबी सूत्रों ने कहा है कि अमेरिका बातचीत से निकलने के लिए महज़ एक ‘बहाना ढूंढ रहा था’। ‘फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी’ के मुताबिक, अमेरिका को सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि बचाने के लिए बातचीत का नाटक करना था, लेकिन वह अपनी नाजायज़ मांगें कम करने को तैयार नहीं था। सूत्रों ने यह भी साफ कर दिया कि फिलहाल ईरान की अगले दौर की बातचीत की कोई योजना नहीं है। इस बयान से साफ है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक टकराव अब और गहरा गया है।

इधर इस्लामाबाद में शिकस्त मिली, तो ट्रंप ने अपना गुस्सा चीन पर निकालना शुरू कर दिया। डोनाल्ड ट्रंप ने बीजिंग को खुली धमकी दी है कि अगर चीन ने ईरान को नए डिफेंस सिस्टम या हथियार भेजे, तो अंजाम बहुत बुरा होगा। ट्रंप ने चीन पर कड़े आर्थिक टैरिफ और पाबंदियों का डर दिखाया है। ‘एक्सियोस’ और ‘सीएनएन’ समेत कई न्यूज़ एजेंसियों की रिपोर्ट्स सामने आई थीं, जिनमें बताया गया था कि चीन ईरान को आधुनिक डिफेंस सिस्टम, समंदर में लड़ने वाले मिसाइल लॉन्चर और कई अहम हथियार दे सकता है। जैसे ही वार्ता खत्म हुई है, महायुद्ध की आशंका के बीच ट्रंप की सिट्टी-पिट्टी गुम है और वे सीधे चीन पर अपना रौब जमाने लगे हैं।

लेकिन ट्रंप साहब शायद भूल गए हैं कि चीन और ईरान के बीच 25 साल का रणनीतिक समझौता है। चीन को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान के तेल की ज़रूरत है और ईरान को अमेरिकी दादागिरी रोकने के लिए चीन के हथियारों की। ट्रंप की ये धमकी महज़ एक हताश नेता की ‘गीदड़भभकी’ नज़र आती है, क्योंकि ड्रैगन को डराना अब अमेरिका के बस की बात नहीं रही। चीन पहले ही कह चुका है कि वह किसी भी देश के आपसी व्यापार में अमेरिकी दखल बर्दाश्त नहीं करेगा।

हालांकि, अमेरिका-ईरान की बातचीत फेल होने से पूरी दुनिया एक बार फिर दहशत में है। ईरान के लोग भी मुस्तैद हैं। दुनिया के अन्य देशों पर महंगाई और तेल संकट का साया दोबारा जंग शुरू होने के डर से गहरा सकता है। लेकिन इस पूरे मंज़र में एक आदमी है जो बेहद खुश है—वो है बेंजामिन नेतन्याहू। नेतन्याहू की ‘खूनी कुर्सी’ इसी बात पर टिकी है कि जंग जारी रहे। अगर इस्लामाबाद में समझौता हो जाता, तो नेतन्याहू को सीधे जेल जाना पड़ता।

इसीलिए इज़राइल ने पिछले 24 घंटों में लेबनान पर हमले और तेज़ कर दिए ताकि माहौल इतना खराब हो जाए कि सुलह की कोई गुंजाइश ही न बचे। और वो ट्रंप, जो खुद को सुपर पावर बताते हैं, वे नेतन्याहू के सामने ‘भीगी बिल्ली’ बन गए हैं। ट्रंप एक तरफ शांति का ढोंग रच रहे हैं और दूसरी तरफ लेबनान में मासूमों का कत्लेआम मूकदर्शक बनकर देख रहे हैं। यह वही दोगलापन है जिसने पाकिस्तान की मध्यस्थता को नाकाम कर दिया। ट्रंप ने साबित कर दिया है कि वे ‘ग्रेट डीलममेकर’ नहीं, बल्कि ‘ग्रेट वॉर-मेकर’ हैं।

ऐसे में साफ है कि इस्लामाबाद वार्ता का बेनतीजा होना दुनिया को एक बड़े संकट की तरफ धकेल रहा है। जेडी वेंस खाली हाथ लौट रहे हैं, लेकिन वे अपने पीछे बारूद की गंध छोड़ जा रहे हैं। ईरान अब और भी सख्त रुख अपनाएगा और होर्मुज की घेराबंदी अब और भी कड़ी होगी।

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