संसद का विशेष सत्र और सियासी भूकंप ?

  • राहुल गांधी का आरोप सत्ता पर कब्जा करने की साजिश
  • लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण विधेयक पेश, सांसदों में हुई तीखी बहस
  • संसद के विशेष सत्र में संविधान संशोधन विधेयक बिल पेश किया गया
  • महिला आरक्षण बिल पर भिड़े अमित शाह और अखिलेश, ओम बिरला को करना पड़ा हस्तक्षेप

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश की राजनीति इस वक्त किसी शांत झील की तरह नहीं बल्कि उस ज्वालामुखी की तरह दिख रही है जिसकी सतह भले स्थिर हो लेकिन भीतर लावा उबल रहा हो। संसद का विशेष सत्र शुरू होने से ठीक पहले जयराम रमेश का राजनीतिक भूकंप वाला बयान इस उबलते माहौल में बारूद का काम कर रहा है। और सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई आने वाले समय में कोई बड़ा संवैधानिक टकराव आने वाला है या फिर यह विपक्ष की रणनीतिक चेतावनी है? दरअसल आज से शुरू हो रहे इस विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर चर्चा प्रस्तावित है । यह वही कानून है जिसे देश महिला आरक्षण के नाम से जानता है। लेकिन इस बार मामला सिर्फ महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है। विपक्ष को शक है कि इसके साथ साथ कुछ और बड़े विधेयक भी पेश किए जा सकते हैं जिनमें संविधान संशोधन जैसे गंभीर कदम शामिल हो सकते हैं। यही वजह है कि जयराम रमेश ने साफ शब्दों में कह दिया कि देश तैयार रहे क्योंकि सियासत की जमीन हिलने वाली है। यही नहीं संसद के विशेष सत्र में संविधान संशोधन विधेयक 2026, बिल को भी पेश किया जा चुका हैं।

तकनीकी नहीं राजनीतिक है आरोप

राहुल गांधी का यह आरोप सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि बेहद राजनीतिक है। वह कह रहे हैं कि जब देश में जाति आधारित जनगणना की मांग जोर पकड़ रही है तब सरकार पुराने आंकड़ों के सहारे नया राजनीतिक नक्शा बनाना चाहती है। इसका सीधा असर पिछड़े वर्गों, दलितों और आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। यानी जो सवाल अब तक सामाजिक न्याय का था, वह अब सीधे सत्ता के संतुलन का सवाल बन गया है।

हिलने वाली है सियासत की जमीन

यह बयान यूं ही हवा में नहीं आया। इसके पीछे वह गहरी आशंकाएं है कि सत्ता पक्ष के संसद इस विशेष सत्र का इस्तेमाल केवल कानून पारित करने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक समीकरणों को स्थायी रूप से बदलने के लिए कर सकते हैं। और यहीं से भूकंप की असली व्याख्या शुरू होती है। यह भूकंप भूगोल का नहीं लोकतंत्र के ढांचे का हो सकता है। इसी कड़ी में राहुल गांधी का हमला और भी धारदार है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन और गेरीमैंडरिंग के जरिए सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। उनका कहना है कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल कर नई राजनीतिक सीमाएं तय करना एक सोची समझी रणनीति हो सकती है जिससे भविष्य के चुनावों में फायदा उठाया जा सके।

उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सीटों का संतुलन बदल सकता है

जयराम रमेश का भूकंप दरअसल कई स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। पहला यह संसद के भीतर तीखी टकराहट का संकेत है जहां हर विधेयक पर जोरदार विरोध होगा बहस होगी और संभव है कि कार्यवाही बाधित भी हो। दूसरा यह सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक राजनीतिक आंदोलन के तेज होने का इशारा है। और तीसरा यह उस व्यापक नैरेटिव की शुरुआत हो सकती है जिसमें विपक्ष सरकार को संविधान के साथ खिलवाड़ करने वाली ताकत के रूप में पेश करेगा। अगर इसे थोड़ा और गहराई से समझें तो यह भूकंप दरअसल 2026-2029 की राजनीति की नींव हिला सकता है। परिसीमन की प्रक्रिया जो लंबे समय से टलती रही है अगर अब तेज होती है तो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सीटों का संतुलन बदल सकता है। इससे न सिर्फ राज्यों की राजनीतिक ताकत प्रभावित होगी बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का समीकरण भी बदल सकता है। यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी का सत्ता पर कब्जा वाला आरोप फिट बैठता है। वह कह रहे हैं कि यह सिर्फ कानून बनाने की प्रक्रिया नहीं बल्कि भविष्य की राजनीति को अपने पक्ष में ढालने की कोशिश है। और अगर ऐसा है तो यह विपक्ष के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन सकती है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम दिलचस्प मोड़ पर

यहां नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। एक ओर यह महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने का वादा करता है जिस पर लगभग सभी राजनीतिक दल सहमत हैं। लेकिन दूसरी तरफ इस अधिनियम को लागू होने की शर्तें जैसे नयी जनगणना और परिसीमन इसे तत्काल प्रभाव से लागू होने से रोक रही हैं। विपक्षी राजनीतिक दलों का आरोप है कि यह कानून अभी नहीं कभी नहीं वाली स्थिति पैदा कर सकता है। मोदी सरकार के लिए यह सत्र एक अवसर भी है और परीक्षा भी। अवसर इसलिए कि वह महिला सशक्तिकरण के बड़े एजेंडे को आगे बढ़ा सकती है और परीक्षा इसलिए कि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संतुलन के साथ छेड़छाड़ के रूप में पेश करने में जुटा है।

अलग-अलग दावे, अलग-अलग पहलू

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सरकार और उसके समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक फैसले को टालना भी उचित नहीं है और परिसीमन व जनगणना जैसी प्रक्रियाएं संवैधानिक अनिवार्यता हैं। उनके लिए यह सुधार की दिशा में उठाया गया कदम है न कि साजिश। यानी एक ही कदम दो पूरी तरह अलग कहानियां। एक तरफ सशक्तिकरण दूसरी तरफ सत्ता का केंद्रीकरण। एक तरफ संविधान का पालन दूसरी तरफ संविधान की आड़ में खेल। संसद का यह विशेष सत्र अब सिर्फ एक औपचारिक बैठक नहीं रह गया है। यह उस अखाड़े में बदल चुका है जहां शब्द हथियार हैं आरोप ढाल हैं और हर बयान एक नई राजनीतिक लकीर खींच रहा है। जयराम रमेश का राजनीतिक भूकंप कोई अचानक आने वाली घटना नहीं बल्कि उस प्रक्रिया का नाम है जो धीरे धीरे जमीन को कमजोर करती है और फिर एक दिन सब कुछ हिला देती है। यह भूकंप आएगा या नहीं यह महज कुछ घंटों में ही साफ हो जाएग। लेकिन इतना तय है कि उसकी आहट ने ही सियासत को बेचैन कर दिया है। और जब सियासत बेचैन होती है तो लोकतंत्र की धड़कन तेज हो जाती है कभी उम्मीद में कभी आशंका में।

स्टालिन ने काले कपड़े पहनकर बिल की कॉपी में लगाई आग

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने गुरुवार सुबह प्रस्तावित परिसीमन विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उसकी एक कॉपी भी जलाई। स्टालिन ने राज्य भर में परिसीमन विरोधी आंदोलन शुरू करने के लिए काला झंडा भी फहराया। एक्स पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा, परिसीमन को लेकर तमिलनाडु भर में विरोध की भावना फैल जाए। फासीवादी भाजपा का अहंकार चूर-चूर हो जाए। उस समय, तमिलनाडु में हिंदी के विरोध में जो आग भड़की थी, उसने दिल्ली को भी झुलसा दिया था। हमारी वह आग तभी शांत हुई, जब दिल्ली ने हार मान ली। उन्होंने आगे लिखा, आज मैंने उस काले कानून की एक प्रति जलाकर विरोध की एक और आग जलाई है, जो तमिल लोगों को उनकी अपनी ही धरती पर शरणार्थी बना देता है। यह आग भी पूरे द्रविड़ क्षेत्र में फैल जाएगी।

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