अमेरिकी नाकाबंदी तोड़ने में चीनी टैंकर फेल, वापस लौटने को मजबूर

होर्मुज की लहरों पर जो खेल खेला जा रहा है, वह अब खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुका है। अमेरिकी नाकेबंदी को तोड़ने की कोशिश में निकला एक चीनी तेल टैंकर नाकाम रहा और उसे मजबूरन 'बैक' होना पड़ा है।

4pm न्यूज नेटवर्क: दुनिया की सियासत इस वक्त बारूद के उस ढेर पर बैठी है जिसमें चिंगारी लगाने का काम डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू कर दिया है।

होर्मुज की लहरों पर जो खेल खेला जा रहा है, वह अब खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुका है। अमेरिकी नाकेबंदी को तोड़ने की कोशिश में निकला एक चीनी तेल टैंकर नाकाम रहा और उसे मजबूरन ‘बैक’ होना पड़ा है। इससे न सिर्फ मामला भड़क उठा है, बल्कि चीन और अमेरिका अब सीधे आमने-सामने आ गए हैं।

हैरानी की बात तो ये है कि एक तरफ ट्रंप के सिपहसालार जेडी वेंस कह रहे हैं कि ट्रंप ईरान के साथ एक मज़बूत समझौता चाहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ ट्रंप की नौसेना चीन के जहाज़ों पर बंदूकें तान रही है। आईएमएफ (IMF) ने चेतावनी दे दी है कि ट्रंप की इस ज़िद से वैश्विक अर्थव्यवस्था को जो ज़ख्म मिलने थे, वे मिल चुके हैं; लेकिन यदि अभी भी हालात सामान्य नहीं हुए, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।

ओमान की खाड़ी से जो खबरें आ रही हैं, वे किसी भी आज़ाद मुल्क के लिए चिंता का सबब हैं। चीन का एक विशाल तेल टैंकर, जो ईरान से कच्चा तेल लेकर अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहा था, उसे अमेरिकी जंगी जहाज़ों ने घेर लिया। ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी नौसेना ने ऐसी नाकेबंदी की है कि चीनी टैंकर को अपनी कोशिश छोड़नी पड़ी और वह वापस लौट गया।

यह सिर्फ एक व्यापारिक जहाज़ का वापस लौटना नहीं है, बल्कि ट्रंप का पूरी दुनिया को यह संदेश है कि अब समंदर में अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं, बल्कि उनकी मर्जी चलेगी। ट्रंप ने जिस तरह से चीन के व्यापार को निशाना बनाया है, उसने बीजिंग को आगबबूला कर दिया है। ट्रंप चाहते हैं कि चीन को तेल की सप्लाई रोककर उसे घुटनों पर लाया जाए, लेकिन वे भूल रहे हैं कि चीन जैसी महाशक्ति ज़्यादा दिनों तक यह अपमान बर्दाश्त नहीं करेगी। ट्रंप की यह ‘समुद्री गुंडागर्दी’ किसी भी पल बड़े युद्ध में तब्दील हो सकती है।

हालांकि इस बीच, ट्रंप प्रशासन ने एक और सनसनीखेज दावा किया है। एक रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि ईरान, चीनी जासूसी सैटेलाइट्स की मदद से अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है। दावा है कि चीन ने ईरान को अपनी सैटेलाइट तकनीक दी है ताकि वह अमेरिकी नौसेना की लोकेशन ट्रैक कर सके।

फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने इस सैटेलाइट के जरिए मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने 2024 के अंत में चीन से ‘टीईई-01बी’ (TEE-01B) सैटेलाइट हासिल किया था। इस सैटेलाइट के जरिए ईरानी सैन्य अधिकारियों ने अमेरिकी ठिकानों की निगरानी की। रिपोर्ट में बताया गया कि मार्च में ड्रोन और मिसाइल हमलों से पहले और बाद में इन ठिकानों की तस्वीरें ली गईं।

इनमें सऊदी अरब का प्रिंस सुल्तान एयर बेस, जॉर्डन के सैन्य ठिकाने और बहरीन में अमेरिकी नेवल बेस के आसपास के इलाके शामिल हैं। इस डील के तहत ईरान को बीजिंग की एक सैटेलाइट सर्विस कंपनी के ग्राउंड स्टेशनों तक भी पहुंच मिली, जिससे उसे डेटा हासिल करने और कंट्रोल करने में मदद मिली। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर चीन ईरान को सैन्य सहायता देता है, तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।

इस दावे के पीछे की सच्चाई क्या है? चीन ने साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया है कि वह ईरान को कोई सैन्य मदद नहीं दे रहा है। असल में, ट्रंप यह सैटेलाइट वाला डर इसलिए फैला रहे हैं ताकि वे चीन पर और भी कड़े प्रतिबंध लगा सकें और दुनिया की नज़र में चीन को एक विलेन की तरह पेश कर सकें। ट्रंप की यह पुरानी आदत रही है कि जब भी वे किसी मोर्चे पर नाकाम होते हैं, वे एक नया हौवा खड़ा कर देते हैं। बिना किसी पुख्ता सबूत के चीन और ईरान के बीच सैन्य सांठगांठ की खबरें फैलाना ट्रंप की उस चाल का हिस्सा है, जिससे वे अपनी ‘वॉर पॉलिसी’ को सही ठहरा सकें।

जब ट्रंप युद्ध की बात कर रहे हैं, तब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ट्रंप की बोलती बंद करने वाला दांव चला है। रूस ने होर्मुज संकट पर बातचीत की वकालत करते हुए ईरान के परमाणु रुख का पुरज़ोर समर्थन किया है। रूस ने एक बार फिर अपना वह पुराना और मुकम्मल प्रस्ताव दोहराया है कि वह ईरान के समृद्ध यूरेनियम को संभालने और उसकी निगरानी के लिए तैयार है।

पुतिन का यह कदम ट्रंप के लिए किसी ज़ोरदार तमाचे से कम नहीं है। ट्रंप पूरी दुनिया में यह चिल्ला रहे हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने के करीब है, लेकिन रूस ने प्रस्ताव देकर साबित कर दिया कि मसले का हल मिसाइलों से नहीं, बल्कि टेबल पर बैठकर निकलता है। रूस ने साफ़ कर दिया है कि वह ईरान को अकेला नहीं छोड़ेगा। पुतिन का यह संदेश ट्रंप के उस अहंकार को तोड़ने के लिए काफी है, जिसमें वे खुद को दुनिया का इकलौता थानेदार समझते हैं।

हालांकि ट्रंप की धमकियों के बीच ईरान ने अब एक ऐसा बिल पेश किया है जिसने व्हाइट हाउस के होश उड़ा दिए हैं। ईरान ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका से 270 अरब डॉलर के नुकसान का मुआवज़ा माँगा है। ईरान का कहना है कि ट्रंप की नाजायज़ आर्थिक पाबंदियों, समुद्री नाकेबंदी और धमकियों की वजह से उनकी अर्थव्यवस्था को जो ज़ख्म लगे हैं, उसकी पाई-पाई का हिसाब ट्रंप को देना होगा।

संयुक्त राष्ट्र में ईरान के प्रतिनिधि ने कहा कि हमलों में क्षेत्रीय देशों की भूमिका रही है, इसलिए उन्हें भी इसकी कीमत चुकानी चाहिए। ईरान सरकार की प्रवक्ता फातमेह मोहाजेरानी के मुताबिक, 28 फरवरी से शुरू हुए युद्ध के बाद देश को सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 270 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। यह जानकारी उन्होंने रूस की न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में दी।

संयुक्त राष्ट्र में ईरान के दूत ने आरोप लगाया कि पांच क्षेत्रीय देशों की ज़मीन का इस्तेमाल ईरान पर हमले करने के लिए किया गया, इसलिए इन देशों को भी मुआवजा देना चाहिए। ईरान ने मुआवजा वसूलने के लिए ‘होर्मुज स्ट्रेट’ से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव भी दिया है। इस बीच अमेरिका के साथ संभावित बातचीत की तैयारी भी चल रही है। हालांकि, क्षेत्रीय देशों की मध्यस्थता के बावजूद ईरान अपने रुख पर सख्त बना हुआ है।

यह मुआवज़ा सिर्फ एक रकम नहीं है, बल्कि ट्रंप के खिलाफ ईरान का बदला है। ईरान ने साफ़ कर दिया है कि अब वे ट्रंप की धौंस में नहीं आने वाले। जहाँ ट्रंप सोचते थे कि वे ईरान को भिखारी बना देंगे, वहाँ ईरान ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक अपराधी बनाकर खड़ा कर दिया है। ट्रंप ने पिछले सालों में जो ‘इकोनॉमिक टेररिज्म’ किया है, ईरान अब उसका पूरा हर्जाना माँग रहा है।

ट्रंप के जूनियर, यानी उपराष्ट्रपति पद के दावेदार जेडी वेंस कह रहे हैं कि “ट्रंप ईरान के साथ एक मज़बूत समझौता चाहते हैं।” वेंस साहब, यह कैसा समझौता है? एक तरफ आप मज़बूत समझौते की बात करते हैं और दूसरी तरफ आपके बॉस होर्मुज में जहाज़ों पर बमबारी की तैयारी कर रहे हैं?

यह ट्रंप का दोहरा चेहरा है। वे दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि वे ‘शांति’ के दूत हैं, लेकिन उनकी हर हरकत युद्ध की तरफ इशारा कर रही है। असल में, ट्रंप चाहते हैं कि ईरान उनके सामने पूरी तरह सरेंडर कर दे, लेकिन इतिहास गवाह है कि ईरान जैसे मुल्क सरेंडर नहीं, संघर्ष करना जानते हैं। ट्रंप की यह ‘डीलमेकिंग’ असल में धमकीबाज़ी है, जिसे अब कोई भी मुल्क स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

अंत में, सबसे डराने वाली खबर आई है आईएमएफ (IMF) की तरफ से। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने साफ़-साफ़ कह दिया है कि ईरान और अमेरिका के बीच जारी इस तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को पहले ही अपूरणीय नुकसान पहुँचा दिया है। तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, जहाज़ों का रास्ता बदलने से माल ढुलाई महंगी हो गई है और दुनिया भर के बाज़ारों में डर का माहौल है।

आईएमएफ का यह बयान ट्रंप की नीतियों पर सबसे बड़ी चोट है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाली सनक ने आज पूरी दुनिया को मंदी की आग में झोंक दिया है। गरीब मुल्क पिस रहे हैं और अमीर मुल्क तेल की कीमतों से कांप रहे हैं। ट्रंप अपनी सत्ता और अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरी दुनिया की जेब पर डाका डाल रहे हैं।

साफ है कि ट्रंप अब पूरी दुनिया के लिए एक खतरा बन चुके हैं। चीनी टैंकर को खदेड़ना, रूस के प्रस्ताव को ठुकराना और ईरान को मुआवज़ा न देना—ये सब इस बात के सबूत हैं कि ट्रंप सिर्फ बर्बादी का रास्ता जानते हैं। लेकिन उन्हें यह याद रखना चाहिए कि अगर चीन, रूस और ईरान एक साथ आ गए, तो ट्रंप का अहंकार समंदर की लहरों में बह जाएगा।

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