पश्चिम बंगाल की राजनीति में गिरते स्तर पर कूटनीति

मतदान से पहले ममता बनर्जी के 800 कार्यकर्ताओं को किया जा सकता है गिरफ्तार!

  • कोर्ट पहुंची टीएमसी गिरफ्तारी को रोकने के लिए दायर की अपील
  • मतदान से ठीक एक दिन पहले डबल बेंच करेगी सुनवाई

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की चुनावी बिसात पर चालें तेज हो चुकी हैं। एक तरफ सत्ता की कुर्सी बचाने की जिद है तो दूसरी तरफ उसे छीनने का जुनून। सियासत के इन दो पाटों में अगर कोई पिस रहा है तो वह है लोकतंत्र। पश्चिम बंगाल में चुनावी बिगुल बजते ही आरोप और प्रत्यारोप का जो दौर शुरू हुआ है वह खत्म होने का नाम ही नही ले रहा। सबसे ताजा और भयंकर आरोप एक बार फिर टीएमसी की तरफ से लगाये गये हैं और पार्टी कोर्ट भी पहुंची है। आरोपों में कहा गया है कि मतदान और काउटिंग के बीच टीएमसी के 800 से ज्यादा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा सकता है। टीएमसी का कहना है कि इन कार्यकर्ताओं पर चुनाव आयोग की पैनी नजर बनी हुई हैं। इन आरोपों पर सवाल उठना भी शुरू हो गये है और पूछा जा रहा है कि क्या यह कानून व्यवस्था है या मैदान खाली करने की रणनीति? पश्चिम बंगाल की राजनीति में तापमान अपने उच्चतम स्तर पर है। इस बार गर्मी सिर्फ भाषणों में नहीं बल्कि हालात में भी दिखाई दे रही है। आरोप गंभीर हैं वक्त नाजुक है और दांव बहुत बड़ा क्योंकि यह सिर्फ एक चुनाव नहीं सत्ता के भविष्य का फैसला है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव से ठीक पहले जो आशंका जताई है उसने पूरे चुनावी परिदृश्य को एक नई दिशा दे दी है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग के निर्देशों के बाद उनकी पार्टी के लगभग 800 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा सकता है। वह भी ऐसे वक्त पर जब उनकी मौजूदगी पोलिंग बूथ और काउंटिंग टेबल पर सबसे ज्यादा मायने रखती है। यह आरोप साधारण नहीं है। यह सीधे सीधे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।

हाईकोर्ट की दहलीज पर ममता बनर्जी

तृणमूल कांग्रेस ने अब इस आशंका को केवल मंचों तक सीमित नहीं रखा है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है एक औपचारिक कदम जो इस पूरे विवाद को सियासी बयानबाजी से निकालकर संवैधानिक दायरे में ले आता है। वरिष्ठ वकील और सांसद कल्याण बनर्जी की ओर से दायर याचिका में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है। कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन की डिवीजन बेंच ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है और इस मामले में पहली सुनवाई की संभावित तारीख 22 अप्रैल है। यानी 23 अप्रैल को होने वाले दो चरणों वाले विधानसभा चुनावों के पहले चरण से ठीक एक दिन पहले। तृणमूल कांग्रेस को आशंका थी कि पार्टी के लगभग 800 कार्यकर्ता, जिन पर चुनाव आयोग की लगातार नजर बनी हुई है, उसके निर्देशों के बाद चुनावों से पहले गिरफ्तार किए जा सकते हैं। बता दें कि पिछले कुछ दिनों में अपनी हर चुनावी रैली में, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं, विशेष रूप से पोलिंग एजेंट और मतगणना एजेंटों के चुनाव से पहले गिरफ्तार होने को लेकर यही आशंका जताई थी। मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी के नेतृत्व को यह निर्देश भी दिया था कि ऐसी गिरफ्तारियों की स्थिति में वह बैकअप तैयार रखें। अब तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख करने के साथ ही उनकी आशंकाओं और आरोपों को एक आधिकारिक रूप मिल गया है।

पुराने आरोप, नई तीव्रता

यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग या सुरक्षा बलों पर सवाल उठाए हों। इससे पहले भी उन्होंने केंद्रीय बलों की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन इस बार मामला अलग है क्योंकि यह सीधे चुनावी संरचना के भीतर दखल की बात करता है। और जब आरोप इतने गंभीर हों तो उनका असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता यह जनता के भरोसे तक पहुंचता है।

नजर बनाम निशाना असली सवाल क्या है?

चुनाव आयोग का काम होता है निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करना। लेकिन जब उसी आयोग के निर्देशों को लेकर एक सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री खुलकर आरोप लगाए तो मामला साधारण नहीं रह जाता। क्या यह वाकई नजर है यानी संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी या फिर यह निशाना है यानी विपक्षी ढांचे को कमजोर करने की रणनीति? ममता बनर्जी के बयान लगातार इसी दिशा में इशारा कर रहे हैं। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को पहले ही आगाह कर दिया था कि संभावित गिरफ्तारियों के लिए तैयार रहें और बैकअप एजेंट्स की व्यवस्था रखें। यह निर्देश अपने आप में बताता है कि पार्टी इस खतरे को कितना वास्तविक मान रही है।

पोलिंग एजेंट लोकतंत्र के ग्राउंड सोल्जर

चुनाव में पोलिंग एजेंट और काउंटिंग एजेंट की भूमिका अक्सर सुर्खियों में नहीं आती लेकिन असल खेल वहीं होता है। यह वही लोग होते हैं जो बूथ पर खड़े होकर हर वोट की प्रक्रिया पर नजर रखते हैं और काउंटिंग के समय हर बैलेट या ईवीएम की गिनती पर निगरानी रखते हैं। अगर इन्हीं लोगों की अनुपस्थिति हो जाए कारण चाहे जो भी हो तो चुनावी पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही वजह है कि टीएमसी इस मुद्दे को केवल गिरफ्तारी नहीं बल्कि चुनावी ढांचे में हस्तक्षेप के तौर पर पेश कर रही है। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस अपने गढ़ को बचाने के लिए हर मोर्चे पर डटी हुई है। यह टकराव अब वैचारिक से ज्यादा रणनीतिक हो चुका है जहां हर चाल का जवाब चाल से दिया जा रहा है। और इसी टकराव के बीच यह 8०० गिरफ्तारियों का मुद्दा एक बड़ा नैरेटिव बनता जा रहा है।

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