बांदा: जांच में दोषी, फिर भी कुर्सी पर कायम! अमलोर स्कूल में ‘मैडम राज’ पर बड़ा खुलासा
बांदा के तिंदवारी ब्लॉक के अमलोर उच्च प्राथमिक विद्यालय में हेडमास्टर किरन शुक्ला पर 37 लाख की अनियमितता, मिड-डे मील घोटाला और धमकी जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। जांच में दोषी पाए जाने के बावजूद अब तक कार्रवाई न होने पर सवाल उठ रहे हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बांदा जिले के तिंदवारी ब्लॉक स्थित अमलोर गांव का उच्च प्राथमिक विद्यालय इन दिनों पढ़ाई से ज्यादा विवादों और गंभीर आरोपों को लेकर चर्चा में है। विद्यालय की हेडमास्टर किरन शुक्ला पर भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता, मिड-डे मील घोटाले और कर्मचारियों को धमकाने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि कई स्तरों की जांच में आरोपों की पुष्टि होने के बावजूद अब तक कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। ग्रामीणों और विद्यालय से जुड़े लोगों का आरोप है कि जांच रिपोर्टों में दोषी पाए जाने के बाद भी हेडमास्टर अपने पद पर बनी हुई हैं। इससे स्थानीय लोगों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है और प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं।
शिकायत से जांच तक, लेकिन कार्रवाई अब भी शून्य
ग्रामीणों के अनुसार, इस पूरे मामले की पहली औपचारिक शिकायत 15 दिसंबर 2025 को की गई थी। इसके बाद 20 जनवरी 2026 को जांच कराई गई। फिर 9 अप्रैल 2026 को एसडीएम स्तर की टीम ने भी मामले की पुष्टि की। आरोप है कि तीन अलग-अलग स्तरों पर जांच के बाद भी न तो निलंबन हुआ, न स्थानांतरण और न ही किसी प्रकार की विभागीय कार्रवाई की गई। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर किसके संरक्षण में यह पूरा मामला दबाया जा रहा है।
37 लाख रुपये खर्च, लेकिन स्कूल की हालत जर्जर
ग्रामीणों का दावा है कि विद्यालय में ग्रांट और निर्माण कार्यों के नाम पर करीब 37 लाख रुपये खर्च दिखाए गए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आती है। स्कूल भवन की स्थिति खराब बताई जा रही है। घटिया निर्माण, अधूरे कार्य और बुनियादी सुविधाओं की कमी यह सवाल खड़ा कर रही है कि आखिर यह पैसा कहां गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हो, तो कई बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं।
मिड-डे मील में भी गड़बड़ी के आरोप
आरोप केवल निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं हैं। ग्रामीणों और कुछ कर्मचारियों का कहना है कि बच्चों के मिड-डे मील में भी गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। दूध, पनीर और अन्य राशन सामग्री की खरीद और वितरण में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं। यह भी कहा जा रहा है कि रसोइया और अन्य स्टाफ बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन दबाव और डर के कारण खुलकर सामने नहीं आ रहे। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सीधे बच्चों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला बनता है।
धमकी और दबाव की भी शिकायतें
हेडमास्टर पर यह भी आरोप है कि वह महिला होने का दबाव बनाकर कर्मचारियों और ग्रामीणों को डराती-धमकाती हैं। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि झूठे मुकदमों में फंसाने और आत्महत्या जैसी धमकियों के जरिए पूरे सिस्टम पर दबाव बनाया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि इसी कारण कई लोग खुलकर शिकायत करने से बचते हैं। इस तरह का माहौल स्कूल के शैक्षणिक वातावरण को भी प्रभावित कर रहा है।
अफसरों की चुप्पी पर सवाल
इस मामले की शिकायतें BSA, BEO से लेकर तहसील स्तर तक पहुंच चुकी हैं। बावजूद इसके कार्रवाई का अभाव प्रशासनिक निष्क्रियता की ओर इशारा करता है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब जांच रिपोर्ट में दोष स्पष्ट है, तो फिर कार्रवाई पर ताला क्यों लगा है। क्या जिम्मेदार अधिकारी भी इस पूरे खेल का हिस्सा हैं, या फिर किसी प्रभाव के कारण मामला रोका जा रहा है।
ग्राम प्रधान ने भी उठाई आवाज
अमलोर ग्राम प्रधान भूपेंद्र सिंह ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने मांग की है कि दोषियों पर केस दर्ज हो, गलत तरीके से खर्च किए गए धन की वसूली हो और विद्यालय को फिर से सही दिशा में लाया जाए।
रिपोर्ट – इक़बाल खान
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