ममता बनर्जी के मुस्लिम वोट बैंक पर किसका वार भारी- हुमायूं, पीरजादा या ओवैसी?

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटबैंक का विभाजन ममता बनर्जी के पतन का प्रमुख कारण बना है. 30% मुस्लिम आबादी का समर्थन ममता से छिटकता दिख रहा है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटबैंक का विभाजन ममता बनर्जी के पतन का प्रमुख कारण बना है. 30% मुस्लिम आबादी का समर्थन ममता से छिटकता दिख रहा है.

हुमायूं कबीर की AJUP, ओवैसी की AIMIM और पीरजादा नौशाद सिद्दीकी की ISF ने ममता विरोधी नैरेटिव गढ़कर मुस्लिम वोटों को बांटा. इससे दशकों से बंगाल की सत्ता में रहे दलों को चुनौती मिली और पहली बार भाजपा की सरकार बनने की संभावना प्रबल हुई है.

पश्चिम बंगाल की सियासत में मुस्लिम वोटबैंक काफी अहम भूमिका निभाता रहा है. 30 फीसदी मुस्लिम आबादी के समर्थन से लेफ्ट ने बंगाल में 34 सालों तक राज किया. लेफ्ट के पतन के बाद मुस्लिम वोट ममता बनर्जी की ओर शिफ्ट हो गया और पिछले चुनावों में मुस्लिम वोट एकजुट होकर ममता बनर्जी के साथ खड़ा रहा, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में बंगाल का मुस्लिम वोटबैंक बंट गया.

मुस्लिम वोटबैंक के बंटने के परिणाम स्वरूप बंगाल की सत्ता ममता बनर्जी के हाथों से फिसलती दिख रही है और पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार बनती दिख रही है और भाजपा बहुमत की ओर बढ़ रही है.

मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में मुस्लिम वोटबैंक चुनावी असर काफी मजबूत है. इन इलाकों ने पिछले चुनावों में टीएमसी को बहुमत मिलता रहा था, लेकिन इस चुनाव में इन जिलों में भाजपा को बढ़त दिखती मिल रही है, जो मुस्लिम वोटबैंक शिफ्ट होने और बंटने के साफ संकेत हैं.

बंगाल में ममता बनर्जी की पतन का मुख्य कारणों में एक प्रमुख कारण मुस्लिम वोटबैंक का विभाजन माना जा रहा है. मुस्लिम वोट के विभाजन में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के शिलान्यास कर सुर्खियां बंटोरने वाले हुमायूं कबीर, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और पीरजादा नौसाद सिद्दीकी की पार्टी ISF ने अहम भूमिका निभाई है.

इन पार्टियों ने चुनाव के दौरान एक नैरेटिव बनाने की कोशिश की कि ममता बनर्जी मुस्लिमों को केवल एक वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं और ममता बनर्जी और उनकी पार्टी मुस्लिमों की हितैषी नहीं है. इस नैरिटव का चुनाव परिणाम का असर भी दिख रहा है.

हुमायूं कबीर ने लगाई मुस्लिम वोटबैंक में सेंध

ममता बनर्जी ने नाराज होकर पूर्व मंत्री हुमायूं कबीर ने चुनाव से पहले नई पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) का गठन किया था. बाबरी मस्जिद के शिलान्यास के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से बेदखल कर दिया था. हुमायूं कबीर ने राज्य की 294 सीटों में से 115 पर उम्मीदवार उतारे थे. हुमायूं कबीर खुद मुर्शिदाबाद की दो सीटों रेजिनगर और नाओदा से चुनाव लड़ रहे हैं.

दोनों ही सीटों पर शुरुआती रुझानों में हुमायूं कबीर आगे हैं. जिस तरह से हुमायूं कबीर ने मुस्लिमों को अपनी ओर बाबरी मुस्जिद बनाने की बात कहकर एकजुट किया. उससे ममता बनर्जी के मुस्लिम वोटबैंक को नुकसान पहुंचा.

ओवैसी को लाभ नहीं, लेकिन ममता का पहुंचाया नुकसान

दूसरी ओर, बिहार चुनाव में शानदार प्रदर्शन के बाद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने पश्चिम बंगाल में चुनावी दांव लगाया था. आरंभ में ओवैसी ने हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ गठबंधन किया, लेकिन हुमायूं कबीर के एक वीडियो वायरल होने के बाद ओवैसी ने हुमायूं कबीर से नाता तोड़ लिया.

औवैसी की पार्टी ने 12 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. हालांकि इस चुनाव में ओवैसी की पार्टी को ज्यादा वोट मिलता नहीं दिख रहा है, लेकिन जिस तरह की नैरेटिव ओवैसी ने पैदा किया. उससे मुस्लिमों में ममता बनर्जी के प्रति असंतोष तो पैदा किया ही.

नौशाद सिद्दीकी की पार्टी ने ममता के खिलाफ बनाई हवा

उसी तरह से चुनावी में जीत की शुरुआत ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने 2008 में दक्षिण 24 परगना के जिले से की थी. वहां पहली बार जिलापरिषद पर टीएमसी ने कब्जा किया था. उसी दक्षिण 24 परगना के भांगड़ में पीरजादा नौशाद सिद्दीकी ने ममता बनर्जी को झटका दिया था और भांगड़ सीट पर जीत हासिल की थी.

पीरजादा अब्बास सिद्दीकी बंगाल के प्रमुख मुस्लिम धार्मिक नेता हैं. उन्होंने 2021 में स्थापित इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) पार्टी की स्थापना की थी. फुरफुरा शरीफ दरगाह के एक प्रमुख मौलवी के रूप में, उन्होंने 2021 के बंगाल विधानसभा चुनावों को प्रभावित करने, अल्पसंख्यकों, दलितों और हाशिए के समुदायों की वकालत करते हुए राजनीति में प्रवेश किया था और लेफ्ट के साथ गठबंधन किया.

अब्बास सिद्दीकी के भाई नौशाद सिद्दीकी ने तृणमूल कांग्रेस के गढ़ में 2021 में जीत हासिल की और इस बार भी वह फिर से चुनावी मैदान में हैं. ISF कैंडिडेट नौशाद सिद्दीकी का भांगड़ में तृणमूल कैंडिडेट सौकत मोल्लाह से मुकाबला है और वह कई राउंड में पिछड़ने के बाद अब जीत की ओर बढ़ रहे हैं.

ग्रामीण बंगाल में मुस्लिम वोटिंग समीकरण बदलने में इनकी अहम भूमिका मानी जा रही है. मुस्लिम समुदाय के बीच ममता बनर्जी की पार्टी को लेकर जो असंतोष पैदा हुआ है. उनमें इन नेताओं की अहम भूमिका है.

Related Articles

Back to top button