तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन की आहट!

  • गवर्नर ने टीवीके प्रमुख के सरकार गठन के दावे को दो बार ठुकराया
  • फ्लोर पर बहुमत साबित करना चाहते हैं विजय जोसफ यही परपंरा भी रही है
  • स्थिर सरकार न बन पाने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं गवर्नर

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
चेन्नई। तमिलनाडु की राजनीति इस वक्त उबलते ज्वालामुखी की तरह खड़ी है। सरकार नहीं बन रही, बहुमत साबित नहीं हो रहा, विधायक रिसॉर्ट में बंद हैं और राजभवन सत्ता के सबसे बड़े कंट्रोल रूम में बदलता दिखाई दे रहा है। टीवीके प्रमुख विजय थलापति सरकार बनाना चाहते हैं। दावा कर रहे हैं कि उनके पास नंबर हैं। लेकिन राज्यपाल ने उनका दावा ठुकरा दिया है। वजह साफ है कि राजभवन पहले समर्थन देने वाले विधायकों की पूरी सूची चाहता है ताकि लोकतंत्र को विधायकों की खरीदो-फारोख्त से बचाया जा सके।
यानी अब सिर्फ बहुमत का दावा काफी नहीं रहा अब विश्वसनीय बहुमत साबित करना होगा। लेकिन सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ संवैधानिक सतर्कता है या फिर राजनीति का नया पॉवर सेंटर अब विधानसभा नहीं बल्कि राजभवन बन चुका है? तमिलनाडु में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच एआईएडीएमके और तमिलनाडु के दोनों प्रमुख राजनीतिक दल सक्रिय हो चुके हैं। जो पार्टीयां कुछ दिन पहले तक बैकफुट पर दिखाई दे रही थी वह अब सत्ता के नए गणित में एंट्री मार चुकी है। होटल, रिसॉर्ट, बंद कमरे, गुप्त बैठकों और फोन कॉल्स के बीच सत्ता का ऐसा खेल चल रहा है जिसमें जनता सिर्फ टीवी स्क्रीन पर तमाशा देख रही है। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी तरह सरकार बन भी गई तो चलेगी कैसे? क्या बिना स्थिर बहुमत के बनी सरकार पांच साल टिक सकती है? ऐसे राजनीतिक जानकार तो यही कह रहे है कि शनै शनै तमिलनाडु राष्ट्रपति शासन की ओर अग्रसर हो रहा है।

क्या राष्ट्रपति शासन की तरफ बढ़ रहा है?

हालांकि टीवीके सरकार बनाने के बेहद करीब है और कार्यवाहक सीएम स्टालिन बयानों में तो यही कह रहे है कि वह विजय थलापति को सरकार बनाने का मौका देना चाहते हैं। बयान तो ठीक है लेकिन बयान के भीतर की कूटनीति उस समय सर्वजनिक हो जाती है जब स्टालिन अंदर ही अंदर सरकार बनाने की स्टालिन की कोशिशें बाहर आ जाती है। जानकार साफ कह रहे हैं कि जब तक डीएमके या एआईएडीएमके का बड़ा धड़ा टूटकर बाहर नहीं आता तब तक कोई स्थिर सरकार संभव नहीं। यानी असली लड़ाई चुनाव जीतने की नहीं विधायकों को बचाने और तोडऩे की है।

तमिलनाडु क्यों महत्वपूर्ण है?

तमिलनाडु सिर्फ एक राज्य नहीं बल्कि दक्षिण भारतीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली केंद्र है। यहां की राजनीति लंबे समय से डीएमके और एआईएडीएमके के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन विजय थलापति की एंट्री ने पूरे समीकरण को हिला दिया है। अगर टीवीके सत्ता के करीब पहुंचती है, तो यह तमिल राजनीति में तीसरे बड़े ध्रुव का उदय होगा। यही कारण है कि हर दल इस वक्त अपनी पूरी ताकत झोंके हुए है।

सबसे बड़ी पार्टी बनाम बहुमत गठबंधन

कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर बहुमत का दावा पेश किया था। इसके बावजूद राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया। बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाए और इस्तीफा देना पड़ा। विपक्ष ने आरोप लगाया कि अतिरिक्त समय देकर विधायकों की तोडफ़ोड़ की कोशिश की गई।

परंपरा कुछ और लेकिन गवर्नर की शक्तियां असीमित

देश पहले भी ऐसे राजनीतिक विवाद देख चुका है। महाराष्ट्र में 2019 के घटनाक्रम के दौरान सुबह-सुबह राष्ट्रपति शासन हटाकर देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार को शपथ दिलाई गई थी। जिस पर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए थे। कर्नाटक, गोवा और मणिपुर में भी राज्यपाल की भूमिका को लेकर संवैधानिक बहस छिड़ चुकी है। ऐसे में तमिलनाडु के मौजूदा राजनीतिक हालात को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि सरकार गठन की प्रक्रिया किस दिशा में जाएगी। तमिलनाडु इस वक्त सिर्फ राजनीतिक संकट में नहीं है बल्कि वह भारतीय संघीय ढांचे की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।

गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी सत्ता से बाहर

गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। लेकिन बीजेपी ने तेजी से गठबंधन तैयार किया और राज्यपाल ने उसे सरकार बनाने का मौका दे दिया। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या सरकार बनाने का पहला अधिकार सबसे बड़ी पार्टी को मिलना चाहिए या बहुमत गठबंधन को?

सूरज निकलने से पहले बदल गई सरकार

भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित घटनाक्रमों में महाराष्ट्र का मामला हमेशा याद किया जाएगा। चुनाव के बाद शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस सरकार बनाने की तैयारी कर रहे थे। इसी बीच अचानक राष्ट्रपति शासन हटाया गया और सुबह-सुबह देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री तथा अजीत पवार डिप्टी सीएम बन गए। पूरे देश को यह खबर तब मिली जब अधिकांश लोग नींद से जाग भी नहीं पाए थे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि राजभवन ने असाधारण तेजी दिखाते हुए सत्ता गठन में भूमिका निभाई। हालांकि बाद में यह सरकार बहुमत साबित नहीं कर सकी और गिर गई, लेकिन इस घटना ने राज्यपाल की भूमिका पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी।

मध्य प्रदेश में इस्तीफों से गिर गई सरकार

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार तब गिर गई जब ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक विधायकों ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बीजेपी सत्ता में आ गई। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह लोकतांत्रिक जनादेश नहीं बल्कि ऑपरेशन लोटस था। हालांकि बीजेपी ने इसे राजनीतिक पुनर्संरचना बताया।

तेजी से गहरा रहा है अनिश्चितता का माहौल

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल गहराता जा रहा है। किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद सरकार गठन का संकट पैदा हो गया है। टीवीके प्रमुख विजय थलापति ने सरकार बनाने का दावा पेश किया लेकिन राज्यपाल ने इसे तुरंत स्वीकार नहीं किया। राजभवन ने विजय से उन विधायकों की सूची मांगी जो उन्हें समर्थन दे रहे हैं। यह मांग अपने आप में राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई। टीवीके चाहती थी कि उन्हें पहले फ्लोर टेस्ट का मौका मिले ताकि विधानसभा में बहुमत साबित किया जा सके। लेकिन राज्यपाल का रुख ज्यादा सतर्क और कठोर दिखाई दिया। इसी बीच एआईएडीएमके भी अचानक सक्रिय हो गई। पार्टी ने अपने विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए पड़ोसी राज्य के रिसॉर्टों में भेजना शुरू कर दिया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। लेकिन असली समस्या सिर्फ सरकार बनाने की नहीं है। असली सवाल यह है कि स्थिरता कहां से आएगी? अगर किसी छोटे अंतर से सरकार बन भी जाती है तो क्या वह लंबे समय तक टिक पाएगी? क्या हर हफ्ते विश्वास मत और बगावत की आशंका बनी नहीं रहेगी? यही कारण है कि अब राष्ट्रपति शासन की चर्चा भी तेज हो गई है। संविधान के मुताबिक अगर कोई भी दल स्थिर सरकार नहीं बना पाता और प्रशासनिक संकट गहराने लगता है, तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।

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