बंगाल में भाजपा की जीत का खुला राज, चुनाव अधिकारियों को तोहफा देकर बेनकाब हुई बीजेपी
भाजपाई चुनावी निष्पक्षता पर बड़े बड़े दावे और सफाइयां पेश करते हैं लेकिन असल में वोटों की हेराफेरी हो या SIR प्रक्रिया में वोटरों का नाम कटवाना। यह सब हालिया चुनाव में खूब देखने को मिला।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भाजपाई चुनावी निष्पक्षता पर बड़े बड़े दावे और सफाइयां पेश करते हैं लेकिन असल में वोटों की हेराफेरी हो या SIR प्रक्रिया में वोटरों का नाम कटवाना। यह सब हालिया चुनाव में खूब देखने को मिला।
बंगाल चुनाव में एक तरफ जहां पूर्व सीएम ममता चुनाव को निष्पक्ष कराने की मांग करती रहीं तो वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग के अधिकारी संविधान और नियमों को ताक पर रखकर अपने भाजपाई आकाओं को खुश करने में जुटे रहे।
जिसका कहीं न कहीं परिणाम यह भी रहा कि बंगाल में भाजपा की सरकार बन गई। शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन उनके सरकार के शुरुआती फैसलों ने चुनाव की निष्पक्षता और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दो ऐसे अधिकारी जिनकी भूमिका चुनाव से जुड़ी थी, उन्हें महत्वपूर्ण पद दिए गए हैं। विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस और कई लोग इसे पुरस्कार की तरह देख रहे हैं।
वहीं भाजपा के इस खेल को पूरी तरह से विपक्ष ने उजागर करके रख दिया है। दरअसल इस मामले को उठाते हुए कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने बड़ा सवाल उठाया। उन्होंने एक्स पर एक वीडियो शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा कि- कल बंगाल में पूर्व IAS सुब्रता गुप्ता जो SIR के Special Observor बनाये गए थे उन्हें मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त किया गया और आज मनोज अग्रवाल जो चुनाव के वक़्त Chief Electoral Officer थे, प्रमुख सचिव की नियुक्त हुए पर ख़बरदार, निष्पक्षता पर सवाल उठाया! साथ ही वीडियो में सुप्रिया बड़े सवाल उठती हुई नजर आ रही हैं।
जिन अधिकारीयों की बात कर रही हैं , उसमें पहला मामला है सुब्रता गुप्ता का। वे 1990 बैच के आईएएस अधिकारी थे। चुनाव आयोग ने उन्हें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के लिए स्पेशल रोल ऑब्जर्वर बनाया था। SIR में वोटर लिस्ट की खास समीक्षा की गई। इसमें करीब 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए और लाखों लोगों का वोटिंग अधिकार अटका रहा। कई लोगों ने इसे एक तरफा बताया।
SIR के दौरान विपक्ष ने आरोप लगाया कि इससे गरीब, अल्पसंख्यक और टीएमसी समर्थक वोटर प्रभावित हुए। अब चुनाव खत्म होते ही सुब्रता गुप्ता को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का सलाहकार नियुक्त कर दिया गया। यह फैसला शपथ ग्रहण के तुरंत बाद आया, जो संदेह पैदा करता है। लेकिन सत्ता के नशे में चूर भाजपा नेताओं को इससे कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है।
साथ ही बात की जाए दूसरा बड़ा मामला मनोज अग्रवाल का है। वे चुनाव के समय चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर यानी CEO थे। SIR प्रक्रिया उन्हीं के नेतृत्व में चली। टीएमसी ने उन पर पक्षपात का आरोप लगाया था और चुनाव आयोग में शिकायत भी की थी। अब भाजपा सरकार ने उन्हें चीफ सेक्रेटरी यानी राज्य का सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी बना दिया है। यह नियुक्ति भी बहुत जल्दी हुई है। आमतौर पर चुनाव अधिकारी को चुनाव के बाद कुछ समय शांतिपूर्ण अवधि में रखा जाता है ताकि निष्पक्षता का भरोसा बना रहे। लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ।
अब ऐसे में ये दोनों नियुक्तियां एक साथ देखें तो साफ लगता है कि चुनाव से जुड़े अधिकारियों को तुरंत महत्वपूर्ण पद दिए जा रहे हैं। विपक्ष कह रहा है कि इससे चुनाव की निष्पक्षता पर शक होता है। अगर कोई अधिकारी चुनाव प्रक्रिया में भूमिका निभाता है और उसके तुरंत बाद सत्ताधारी पार्टी उसे बड़ा पद दे दे, तो आम आदमी सोचता है कि शायद चुनाव से पहले ही सांठ-गांठ थी। चुनाव आयोग जैसी संस्था को पूरी तरह निष्पक्ष रहना चाहिए। लेकिन जब उसके ऑब्जर्वर और CEO को सत्ताधारी दल का हिस्सा बनाया जाता है, तो लोग पूछते हैं – क्या चुनाव सच में स्वतंत्र और निष्पक्ष थे?
SIR अभियान को लेकर पहले से विवाद था। लाखों नाम हटाने से कई गरीब परिवार, जो दस्तावेज जमा नहीं कर पाए, वोट नहीं दे सके। भाजपा कह रही है कि यह फर्जी वोटर हटाने के लिए जरूरी था। लेकिन तरीका और समय पर सवाल हैं। चुनाव से ठीक पहले ऐसा बड़ा बदलाव करना और फिर उसी प्रक्रिया के प्रमुख लोगों को पद देना, पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। भाजपा सरकार का दावा है कि ये अधिकारी सीनियर हैं और योग्य हैं। लेकिन कमाल की बात तो यह है कि जब टीएमसी सत्ता में थी, तब भी प्रशासनिक नियुक्तियों पर आरोप लगते थे। वहीं अब भाजपा भी उसी रास्ते पर चल रही दिख रही है, जबकि उन्होंने निष्पक्ष प्रशासन का वादा किया था। यह डबल स्टैंडर्ड जैसा लगता है।
ये घटनाएं दिखाती हैं कि सत्ता में आने के बाद पार्टियां अक्सर वादे भूल जाती हैं। भाजपा ने बंगाल में बदलाव का नारा दिया था, लेकिन शुरुआती फैसले पुरानी राजनीति की याद दिलाते हैं। विपक्षी दल अब इसे लेकर आंदोलन और कानूनी रास्ता अपनाने की बात कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग इन नियुक्तियों पर कोई स्पष्टीकरण देगा या आगे भी चुप रहेगा? कुल मिलाकर भाजपा और चुनाव आयोग के बीच पनपा इश्क अब और सवाब पर है। मानों इन्हे किसी का डर नहीं है ये खुल्लम खुल्ला बेईमानी पर आमदा है।



