कुर्सी का कुरुक्षेत्र : केरल में क्यों नहीं बन पा रही कांग्रेसी सरकार?

- आठ दिन 102 सीटें फिर भी मुख्यमंत्री नहीं!
- आखिर कांग्रेस के भीतर चल क्या रहा है?
- बीजेपी भी इंतजार में केरल में खुल सकता है क्या नया दरवाज़ा
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश के पांच राज्यां में हुए चुनाव में चार राज्यों में सरकारे बन चुकी है और काम-काज भी शुरू हो चुका है। लेकिन दक्षिण के खूबसूरत राज्यों में से एक केरल में स्पष्ठ बहुमत के बाद भी सरकार नहीं बन पा रही है। यहां कांग्रेस लीड यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी यूडीएफ ने बाजी मारी है। यूडीएफ ने 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटें जीतकर शानदार वापसी की। कांग्रेस का कहना है कि वह लोकतांत्रिक परम्पराओं वाली पार्टी है लिहाजा सभी को अपने दावे पेश करने का अधिकार है और उन दावों के बीच से किसी सही उम्मीदवार का नाम चुना जाता है। बस दिक्कत यहीं से जन्म ले रही है और कांग्रेस के लोकतांत्रिक मूल्यों से फायदा उठाने के लिए बीजेपी ने अपने सिग्नल आन कर दिये हैं। लेफ्ट पार्टियां भी आंख मूंद कर नहीं बैठी है और फायदे की चाल चलने की फिराक में हैं।
कार्यकर्ताओं की पहली पसंद वी डी सतीशन
जमीन पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों का एक बड़ा वर्ग वी डी सतीशन को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहता है। इसकी वजह केवल राजनीति नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव भी है। पिछले पांच वर्षों में जब कांग्रेस विपक्ष में थी तब सतीशन ने सड़क से लेकर विधानसभा तक वामपंथी सरकार के खिलाफ सबसे आक्रामक भूमिका निभाई। उन्होंने भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलताओं और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लगातार पिनरई विजयन सरकार को घेरा। यही कारण है कि कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता उन्हें संघर्ष का चेहरा मानता है। पार्टी के भीतर यह भावना भी मजबूत है कि जिसने विपक्ष में रहकर लड़ाई लड़ी जनता के बीच पार्टी को जिंदा रखा और संगठन को ऊर्जा दी सत्ता मिलने पर पहला अधिकार उसी का होना चाहिए।
यहीं से हाईकमान की असली दुविधा शुरू होती है
अगर कांग्रेस केवल केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे को प्राथमिकता देती है और कार्यकर्ताओं की भावना को नजरअंदाज करती है तो इसका संदेश गलत जा सकता है। दूसरी तरफ अगर केवल भावनात्मक दबाव में फैसला लिया गया तो दिल्ली और राज्य नेतृत्व के बीच समन्वय प्रभावित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल एक मुख्यमंत्री का चयन नहीं होगा बल्कि यह तय करेगा कि राहुल गांधी की कांग्रेस भविष्य में किस तरह की राजनीति करना चाहती है हाईकमान केंद्रित राजनीति या जमीनी नेतृत्व आधारित राजनीति। यही वजह है कि दिल्ली में बैठकों का दौर लगातार जारी है। क्योंकि कांग्रेस समझती है कि केरल की यह जीत सिर्फ सरकार बनाने का मौका नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपने राजनीतिक मॉडल को साबित करने की भी परीक्षा है।
बेहतरीन संगठनकर्ता हैं केसी वेणूगोपाल
इंडियन नेशनल कांग्रेस के भीतर इस समय सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि केरल का अगला मुख्यमंत्री कौन बनेगा। असली सवाल यह है कि पार्टी आखिर किस रास्ते पर आगे बढऩा चाहती है। दिल्ली के रणनीतिक भरोसे वाले नेतृत्व के साथ या जमीन पर संघर्ष करके उभरे जनाधार वाले चेहरे के साथ? यही वजह है कि मुख्यमंत्री चयन का मामला अब केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं रह गया बल्कि कांग्रेस की आंतरिक राजनीति, नेतृत्व शैली और भविष्य की दिशा का बड़ा परीक्षण बन चुका है। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे जिस नाम की चर्चा हो रही है वह है केसी वेणूगोपाल संगठन के भीतर उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। वह लंबे समय से कांग्रेस हाईकमान खासकर राहुल गांधी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते हैं। दिल्ली की राजनीति में उनकी स्वीकार्यता, संगठनात्मक क्षमता और केंद्रीय नेतृत्व के साथ तालमेल उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाता है। वहीं कांग्रेस के भीतर एक बड़ा वर्ग मानता है कि केरल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में ऐसा चेहरा होना चाहिए जो न केवल प्रशासन संभाल सके बल्कि दिल्ली और राज्य संगठन के बीच मजबूत संतुलन भी बनाए रखे। वेणुगोपाल को इसी दृष्टि से देखा जा रहा है। लेकिन जैसे-जैसे उनका नाम आगे बढ़ रहा है वैसे-वैसे पार्टी के भीतर दूसरी तरह की बेचैनी भी दिखाई देने लगी है।
कांग्रेस में बेचैनी
जिस जीत के बाद कांग्रेस खेमे में जश्न होना चाहिए था वहां अब बेचैनी लॉबिंग और गुटबाजी की खबरें ज्यादा सुनाई दे रही है। आठ दिन बीत चुके हैं लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा तय नहीं हो पाया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस के भीतर अब तीन बड़े शक्ति केंद्र बन चुके हैं। पहला गुट एआईसीसी महासचिव केसी वेणूगोपाल के के समर्थन में है। दूसरा गुट वी डी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाना चाहता है। जबकि तीसरा धड़ा वरिष्ठ नेता रमेश चैन्नीथाला को सबसे अनुभवी विकल्प बता रहा है। बताया जा रहा है कि हर गुट अपने-अपने विधायकों की संख्या दिखाकर हाईकमान पर दबाव बना रहा है। कोई 20 विधायकों का समर्थन होने का दावा कर रहा है तो कोई 40 विधायकों के साथ अपनी ताकत दिखा रहा है।
केरल में राजनीतिक जमीन की तलाश में बीजेपी
बीजेपी भले अभी केरल की सत्ता की तस्वीर में सीधे दिखाई न दे रही हो लेकिन कांग्रेस के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष बीजेपी के लिए किसी राजनीतिक अवसर से कम नहीं माना जा रहा। यही वजह है कि दिल्ली से लेकर तिरुवनंतपुरम तक राजनीतिक गलियारों में एक सवाल तेजी से घूम रहा है कि क्या कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई आखिरकार केरल में बीजेपी के लिए वह जगह बना सकती है जिसकी तलाश पार्टी वर्षों से कर रही है? अब तक केरल की राजनीति दो ध्रुवों के बीच सिमटी रही है एक तरफ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया मार्किस्ट नेतृत्व वाला एलडीएफ और दूसरी तरफ कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ। बीजेपी लगातार कोशिशों के बावजूद राज्य में निर्णायक राजनीतिक ताकत नहीं बन पाई। लेकिन इस बार हालात अलग माने जा रहे हैं। कारण साफ है कि कांग्रेस की जीत जितनी बड़ी है उसके भीतर की खींचतान उससे भी ज्यादा बड़ी दिखाई देने लगी है। मुख्यमंत्री पद को लेकर जिस तरह अलग-अलग गुट सक्रिय हैं उसने पार्टी के भीतर असहजता बढ़ा दी है। कोई गुट केसी वेणुगोपाल के पक्ष में लामबंद है तो कोई वीडी सतीशन को जनता का चेहरा बताकर दबाव बना रहा है। वहीं रमेश चेन्निथला समर्थक भी अपने समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है और किसी बड़े नेता या विधायक समूह में नाराजगी खुलकर सामने आती है तो बीजेपी तुरंत उस राजनीतिक खाली जगह को भरने की कोशिश करेगी। सूत्रों की मानें तो बीजेपी फिलहाल सार्वजनिक तौर पर चुप्पी बनाए हुए है लेकिन पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व और संगठन पूरे घटनाक्रम पर बेहद करीब से नजर रखे हुए हैं। क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा अवसर वही होता है जब विरोधी दल अपनी ही लड़ाई में कमजोर पड़ जाए। सबसे बड़ा डर कांग्रेस के भीतर भी यही माना जा रहा है कि अगर मुख्यमंत्री चयन में असंतोष बढ़ा तो कुछ विधायक क्रॉस पॉलिटिकल अंडरस्टैंडिंग की तरफ बढ़ सकते हैं। यही वह स्थिति होगी जहां बीजेपी अपने लिए नया राजनीतिक दरवाज़ा खोलने की कोशिश करेगी। केरल में अभी सत्ता कांग्रेस के हाथ में दिखाई दे रही है लेकिन अगर अंदरूनी युद्ध और लंबा चला तो आने वाले दिनों में असली फायदा उस पार्टी को मिल सकता है जो फिलहाल सबसे शांत बैठी है।




