सस्पेंस साफ, सतीशन के सिर पर ताज

- 10 दिनों तक दिल्ली से तिरुवनंतपुरम तक चली सत्ता की सुनामी
- वेणुगोपाल का त्याग, राहुल का दांव और केरल में कांग्रेस का नया विस्फोट
- आखिरकार कार्यकर्ताओं की हुंकार के आगे झुक गया आलाकमान
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। केरल की राजनीति में पिछले 10 दिनों से उठ रहा धुआं आखिरकार साफ हो चुका है। कांग्रेस के अंदर चल रही खामोश जंग, लॉबिंग, गुटबाजी, बंद कमरों की बैठकों और दिल्ली दरबार की माथापच्ची के बाद आखिर वह फैसला सामने आ गया जिसने पूरे दक्षिण भारत की राजनीति को नया मोड़ दे दिया। वीडी सतीशन अब सिर्फ विपक्ष का चेहरा नहीं बल्कि केरल कांग्रेस की नई धड़कन और सत्ता का नया केंद्र बन चुके हैं। दिल्ली के गलियारों में आखिरी वक्त तक केसी वेणुगोपाल का पलड़ा भारी माना जा रहा था। राहुल गांधी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले वेणुगोपाल को लेकर यह लगभग तय माना जा रहा था कि आलाकमान उन्हें ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाएगा। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने कांग्रेस की दशकों पुरानी हाईकमान संस्कृति को झटका दे दिया। केरल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने खुलकर संदेश दिया कि अगर जनता की लड़ाई लडऩे वाला चेहरा चाहिए अगर लेफ्ट की जड़ों को हिलाने वाला योद्धा चाहिए अगर सड़कों से विधानसभा तक संघर्ष की आग चाहिए तो सिर्फ और सिर्फ वीडी सतीशन।

कांग्रेस ने क्यों बदला सत्ता का रूट?
राजनीति सिर्फ चेहरे नहीं बदलती राजनीति रास्ते बदलती है। और केरल में कांग्रेस ने वही किया है। जिस तरह दुनिया की अर्थव्यवस्था होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती है उसी तरह केरल कांग्रेस की सत्ता की राजनीति भी अब एक नए पॉवर रूट से गुजरने जा रही है। दिल्ली दरबार समझ चुका था कि अगर उसने जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज किया तो पार्टी अंदर से फट सकती है। कार्यकर्ता लगातार संदेश दे रहे थे कि वेणुगोपाल संगठन के बड़े नेता जरूर हैं लेकिन जनता की नब्ज सतीशन के हाथ में है। यही वजह रही कि आखिरी दौर की बैठकों में राहुल गांधी ने खुद दखल दिया। उन्होंने वेणुगोपाल को समझाया कि यह सिर्फ एक पद का सवाल नहीं बल्कि कांग्रेस के भविष्य का सवाल है। और यहीं से शुरू हुआ त्याग का वो अध्याय जिसने कांग्रेस को संभावित बगावत से बचा लिया। वेणुगोपाल ने कदम पीछे खींचे लेकिन बदले में नैतिक ऊंचाई हासिल कर ली। कांग्रेस अब इसे सैक्रिफाइस मॉडल के तौर पर पेश कर रही है जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर पार्टी और जनता को रखा गया।
और आखिरकार कांग्रेस आलाकमान को झुकना पड़ा
यह सिर्फ मुख्यमंत्री चुनने का फैसला नहीं था यह कांग्रेस के भीतर बदलती राजनीति का ऐलान था। यह संदेश था कि अब सिर्फ दिल्ली का दरबार नहीं चलेगा जमीन की आवाज भी सुनी जाएगी। राहुल गांधी ने आखिरकार अपने सबसे करीबी साथी केसी वेणुगोपाल को मना लिया। यह आसान नहीं था। क्योंकि वेणुगोपाल सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि कांग्रेस संगठन के सबसे ताकतवर रणनीतिकारों में से एक माने जाते हैं। लेकिन उन्होंने पीछे हटकर जो राजनीतिक त्याग दिखाया उसने कांग्रेस के भीतर एक नया नैरेटिव खड़ा कर दिया। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि अगर आलाकमान जिद में आकर वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बना देता तो कांग्रेस के भीतर असंतोष फट सकता था। कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग खुद को ठगा हुआ महसूस करता। लेफ्ट और बीजेपी दोनों कांग्रेस को दिल्ली से चलने वाली पार्टी कहकर घेरते। लेकिन सतीशन को आगे कर कांग्रेस ने साफ कर दिया कि वह केरल में लोकल फेस, लोकल फाइट के फॉर्मूले पर आगे बढऩा चाहती है। वीडी सतीशन पिछले पांच वर्षों में लेफ्ट सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बनकर उभरे। विधानसभा से लेकर सड़क तक हर मुद्दे पर उन्होंने पिनराई विजयन सरकार को घेरा। गोल्ड स्मगलिंग केस हो, भ्रष्टाचार के आरोप हों या प्रशासनिक फैसलों पर सवाल सतीशन ने विपक्ष की भूमिका को सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रखा। यही वजह रही कि केरल कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता उन्हें संघर्ष का चेहरा मानने लगा।
केरल में कांग्रेस का नया अध्याय शुरू
10 दिनों का सस्पेंस खत्म हो चुका है। दिल्ली की राजनीति, कार्यकर्ताओं का दबाव, राहुल गांधी की रणनीति और वेणुगोपाल के त्याग ने मिलकर केरल कांग्रेस में एक नया अध्याय लिख दिया है। वीडी सतीशन अब सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं बल्कि कांग्रेस की उस नई राजनीति का चेहरा बन चुके हैं जो जमीन से उठती है संघर्ष से बनती है और कार्यकर्ताओं की आवाज पर खड़ी होती है। और यही वजह है कि केरल की राजनीति में अब सिर्फ सरकार नहीं बदली पूरा नैरेटिव बदल गया है।
राहुल गांधी का सबसे बड़ा टेस्ट और सबसे बड़ा संदेश
यह फैसला राहुल के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है। आलोचक लंबे समय से कांग्रेस पर दिल्ली से थोपे गए नेतृत्व का आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन इस बार राहुल ने संगठन की आवाज को प्राथमिकता देकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने यह भी दिखाया कि कांग्रेस अब सिर्फ हाईकमान आधारित राजनीति नहीं करना चाहती। पार्टी अब ऐसे चेहरों को आगे लाना चाहती है जिनकी जड़ें जमीन में हों। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि दक्षिण भारत में कांग्रेस की उम्मीदें अब काफी हद तक केरल पर टिकी हुई हैं। कर्नाटक में सत्ता के बाद कांग्रेस चाहती है कि केरल में भी वह मजबूत वापसी करे। और इसके लिए उसे ऐसा चेहरा चाहिए था जो सीधे जनता से संवाद कर सके।
सतीशन क्यों बने जनता की पहली पसंद?
वीडी सतीशन की सबसे बड़ी ताकत यही रही कि उन्होंने खुद को सिर्फ टीवी स्टूडियो वाला नेता नहीं बनने दिया। वे लगातार जमीन पर सक्रिय रहे। केरल में बाढ़ हो, बेरोजगारी का मुद्दा हो, युवाओं का गुस्सा हो या सरकारी भ्रष्टाचार सतीशन हर मोर्चे पर मौजूद रहे। उन्होंने लेफ्ट सरकार के खिलाफ ऐसा आक्रामक नैरेटिव तैयार किया कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को वर्षों बाद लगा कि पार्टी में लडऩे वाला चेहरा वापस आ गया है। यही वजह है कि जब मुख्यमंत्री के नाम को लेकर चर्चा शुरू हुई, तो जिला इकाइयों से लेकर बूथ स्तर तक एक ही आवाज उठी सतीशन या कोई नहीं। कांग्रेस आलाकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि अगर वह कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ जाता तो पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ सकता था। केरल जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य में यह जोखिम कांग्रेस नहीं लेना चाहती थी।
लेफ्ट के लिए खतरे की घंटी बीजेपी के लिए नई चुनौती
वीडी सतीशन का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ कांग्रेस की अंदरूनी जीत नहीं, बल्कि लेफ्ट सरकार के लिए भी खतरे की घंटी माना जा रहा है। क्योंकि सतीशन का पूरा राजनीतिक करियर ही लेफ्ट के खिलाफ आक्रामक लड़ाई से बना है। लेफ्ट अब तक कांग्रेस को कमजोर विपक्ष बताकर राजनीति करता रहा लेकिन सतीशन के नेतृत्व में कांग्रेस अब ज्यादा आक्रामक और संगठित नजर आ सकती है। वहीं बीजेपी के लिए भी यह आसान स्थिति नहीं होगी। क्योंकि कांग्रेस अब केरल में भावनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर नई ऊर्जा के साथ उतरती दिखाई दे रही है।



