गुजरात में पानी संकट पर सियासत तेज, बूंद-बूंद पानी को तरस रहे लोग, विपक्ष ने सरकार को घेरा

गुजरात में पानी की किल्लत को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है... कई इलाकों में लोग पानी की समस्या से जूझ रहे हैं...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात में इन दिनों पानी का संकट एक बार फिर सुर्खियों में है.. वलसाड जिले के कपराडा तालुका के मोती पलसन गांव का एक वायरल वीडियो पूरे देश का ध्यान खींच रहा है.. यहां आदिवासी महिलाएं और पुरुष रस्सियों के सहारे 45 फीट गहरे सूखे कुएं में उतरकर पानी भर रहे हैं.. इस इलाके को गुजरात का चेरापूंजी कहा जाता है.. क्योंकि यहां मानसून में सबसे ज्यादा बारिश होती है.. लेकिन गर्मियों में भूजल स्तर इतना नीचे चला जाता है कि लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पानी लेने को मजबूर हैं..

वहीं यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की नहीं है.. बल्कि खेरगाम और आसपास के कई आदिवासी बहुल इलाकों में यही हाल है.. लोग कह रहे हैं कि नल से जल योजना के दावों के बावजूद उन्हें बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.. यह सवाल उठा रहा है कि केंद्र और राज्य सरकार की जल जीवन मिशन जैसी बड़ी योजनाओं के हजारों करोड़ रुपये आखिर कहां गए.. क्या फंड सही तरीके से पहुंचा या प्रशासनिक लापरवाही.. और भ्रष्टाचार ने इसे बर्बाद कर दिया..

आपको बता दें कि गुजरात भारत का एक विकसित राज्य माना जाता है.. यहां उद्योग, कृषि और व्यापार अच्छा चलता है.. लेकिन पानी की उपलब्धता हर जगह समान नहीं है.. राज्य का उत्तरी और पश्चिमी हिस्सा (कच्छ, सौराष्ट्र) सूखा प्रभावित क्षेत्र है.. जबकि दक्षिणी आदिवासी क्षेत्रों (वलसाड, डांग, तापी) में पहाड़ी इलाके हैं.. जहां भूजल तेजी से नीचे चला जाता है.. 30 साल से भाजपा की सरकार होने के बावजूद कई गांवों में गर्मी के मौसम में पानी का संकट गहरा जाता है.. लोग टैंकरों पर निर्भर रहते हैं.. कुछ जगहों पर टैंकर भी समय पर नहीं पहुंचते.. महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं.. वे दूर-दूर से पानी लाने जाते हैं या खतरनाक कुओं में उतरते हैं..

सरकार का कहना है कि नर्मदा नहर परियोजना, चेक डैम, वर्षा जल संचयन.. और अन्य योजनाओं से राज्य को काफी फायदा हुआ है.. 25 साल पहले गुजरात सूखे के लिए मशहूर था.. लेकिन अब कई इलाकों में सिंचाई और पीने के पानी की स्थिति बेहतर हुई है.. फिर भी, कुछ आदिवासी और दूरदराज के इलाके अभी भी पिछड़ गए हैं..

जल जीवन मिशन (हर घर नल) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना है.. 2019 में शुरू हुई इस योजना का लक्ष्य था कि.. 2024 तक हर ग्रामीण घर में नल से साफ पानी पहुंचे.. केंद्र सरकार का दावा है कि गुजरात ने 100% कवरेज हासिल कर लिया है.. यानी राज्य के सभी ग्रामीण घरों में नल कनेक्शन हो चुके हैं.. केंद्रीय डैशबोर्ड के अनुसार गुजरात में 91 लाख से ज्यादा घरों को टैप वॉटर कनेक्शन मिल चुका है.. केंद्र ने अरबों रुपये दिए और राज्य सरकार ने भी अपना हिस्सा लगाया.. योजना के तहत हर व्यक्ति को रोज 55 लीटर साफ पानी मिलना चाहिए..

लेकिन वलसाड जैसे इलाकों में लोग कह रहे हैं कि नल सूखे पड़े हैं या पानी नहीं आता.. कुछ जगहों पर पाइपलाइन बिछाई गई, लेकिन रखरखाव नहीं हुआ.. भूजल स्रोत सूख गए तो नल में पानी कहां से आएगा.. विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस, आरोप लगाते हैं कि.. फंड का सही इस्तेमाल नहीं हुआ.. भ्रष्टाचार, ठेकेदारों की मिलीभगत और प्रशासनिक सुस्ती के कारण योजनाएं कागजों पर तो सफल दिखती हैं.. लेकिन जमीन पर नहीं.. सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुछ साल पहले गुजरात में नल कनेक्शनों की कार्यक्षमता सिर्फ 47% बताई गई थी.. जबकि देश का औसत 76% था.. यानी कई कनेक्शन बने.. लेकिन नियमित पानी नहीं मिलता..

वलसाड जिले के कपराडा क्षेत्र में मोती पलसन गांव के बेरास्ता फलिया में करीब 1200 लोगों की आबादी है.. यहां का कुआं होली के बाद सूख गया.. लोग 45 फीट गहरे कुएं में रस्सी बांधकर उतरते हैं.. एक महिला ने बताया कि रोज सुबह कुएं में उतरना पड़ता है.. बच्चे डरते हैं.. लेकिन पानी तो चाहिए..

खेरगाम और आसपास के गांवों में भी यही हाल है.. यहां की मिट्टी और पहाड़ी इलाका पानी को जल्दी सोख लेता है.. भूजल स्तर बहुत नीचे चला जाता है.. कुछ गांवों में नल से जल योजना अधूरी रह गई.. लोग कहते हैं कि टैंकर आते हैं.. लेकिन पर्याप्त पानी नहीं मिलता.. गर्मी में जानवरों को पानी पिलाना भी मुश्किल हो जाता है.. ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद स्थानीय प्रशासन सक्रिय हुआ.. कुछ जगहों पर अतिरिक्त टैंकर भेजे गए.. लेकिन लंबे समय का समाधान अभी बाकी है..

 

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