हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश, कहा- शांति भंग की आशंका मात्र से गिरफ्तारी उचित नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निवारक हिरासत के दुरुपयोग पर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निवारक हिरासत के दुरुपयोग पर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

24 घंटे से अधिक की अवैध हिरासत पर राज्य सरकार को पीड़ित को ₹25,000 प्रति दिन मुआवजा देना होगा. जो दोषी मजिस्ट्रेट, पुलिस अधिकारियों की सैलरी से वसूला जाएगा.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य में प्रिवेंटिव डिटेंशन के प्रावधानों के दुरुपयोग पर लगाम कसते हुए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं. कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के तहत शांति भंग की आशंका पर किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक गैर-कानूनी हिरासत में रखने पर राज्य सरकार को पीड़ित को ₹25,000 प्रति दिन का मुआवजा देना होगा. यह राशि सीधे दोषी मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारियों की सैलरी से वसूली जाएगी.

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की डिवीजन बेंच ने यह फैसला दिव्यांग वकील चंद्र पाल सिंह की हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया. बेंच ने राज्य में पुलिस और मजिस्ट्रेटों द्वारा “बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम करने की चिंताजनक प्रवृत्ति पर गहरी नाराजगी जताई.

क्या है मामला

22 फरवरी 2026 को गाजियाबाद पुलिस ने वकील चंद्र पाल सिंह को एक पड़ोसी की मामूली शिकायत पर जबरन उठा लिया. आरोप था कि उन्होंने गेट लगाकर रास्ता रोक दिया है. कानून के अनुसार उन्हें 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए था, लेकिन उन्हें केवल असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस के सामने पेश किया गया.

इसके बाद CrPC की धारा 151 (BNSS की धारा 170) के तहत उन्हें जेल भेज दिया गया. अगले दिन सिंह और उनके भतीजे ने BNSS की धारा 170, 126 और 135 के तहत शांति बनाए रखने के लिए ₹50,000 का बॉन्ड भरा, फिर भी उन्हें रिहा नहीं किया गया. हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर करने और कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 25 फरवरी को सिंह को रिहा किया गया, जबकि उनके भतीजे को 26 फरवरी को रिहाई मिली.

पुलिस और मजिस्ट्रेट का गैर-जिम्मेदाराना रवैया

बेंच ने पाया कि राज्य सरकार की 23 मार्च 2021 की स्पष्ट नीति के बावजूद, जिसमें जिला मजिस्ट्रेट, एग्जीक्यूटिव और स्पेशल मजिस्ट्रेट को दिशा-निर्देश दिए गए थे, पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाए हुए हैं.

कोर्ट ने देखा कि शांति भंग की महज आशंका पर लोगों को कई दिनों तक जेल में बंद रखा जा रहा है. BNSS की धारा 170 में बॉन्ड या surety का कोई प्रावधान नहीं होने के बावजूद मजिस्ट्रेट ₹50,000 के बॉन्ड और समान राशि की surety की मांग करते हैं.

गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर के अनुपालन हलफनामे में कहा गया कि फिलहाल कोई हिरासत में नहीं है, लेकिन कोर्ट ने रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा कि पहले गिरफ्तार कर कई दिनों तक जेल में रखा जाता है और कोर्ट के आदेश पर अच्छा काम दिखाने के लिए रिहा किया जाता है.

कोर्ट ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए

प्रिवेंटिव डिटेंशन में लिए गए व्यक्ति को शांति बनाए रखने और अच्छा व्यवहार करने का वचन देते हुए पर्सनल बॉन्ड (बिना पैसे जमा किए) भरना होगा.बॉन्ड की राशि ₹20,000 से अधिक नहीं होगी और surety की जरूरत नहीं होगी। यदि राशि बढ़ाई जाए तो मजिस्ट्रेट को लिखित कारण दर्ज करने होंगे.

हिरासत वाले दिन ही यदि व्यक्ति बॉन्ड भर दे तो उसे तुरंत रिहा कर दिया जाए.यदि आरोपी बॉन्ड भरने से इनकार करता है तो इनकार को लिखित और ऑडियो-विजुअल रूप से रिकॉर्ड किया जाए.

इनकार की तारीख पर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाए ताकि वह चुनी हुई तारीख पर बॉन्ड पेश कर सके.24 घंटे से अधिक गैर-कानूनी हिरासत में रखने पर राज्य सरकार पीड़ित को ₹25,000 प्रति दिन मुआवजा देगी.

दोषी मजिस्ट्रेट/पुलिस अधिकारी (या दोनों) की सैलरी से यह राशि वसूल की जाएगी.प्रथम दृष्टया जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के दौदयाल बनाम राजस्थान राज्य (2026 (SC) 567) और नीलाबती बेहरा बनाम ओडिशा राज्य (1993) के फैसले का जिक्र किया, जिसमें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर मिसाल कायम करने वाले हर्जाने (Exemplary Damages) दिए जाने की बात कही गई है. साथ ही अमित जानी बनाम यूपी राज्य (2020) और शिव कुमार वर्मा मामले में अपनी पिछली टिप्पणियों का भी उल्लेख किया.

चंद्र पाल सिंह को मुआवजा

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को 22 से 25 फरवरी (3 दिन) तक अवैध हिरासत में रखा गया, इसलिए उन्हें ₹75,000 का मुआवजा देने का निर्देश दिया. राज्य सरकार को 6 हफ्ते के अंदर राशि अदा करनी होगी, जिसे बाद में संबंधित ACP और SHO से वसूला जाएगा.

रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश दिया गया कि वे इस फैसले की प्रति एक सप्ताह के अंदर UP के DGP को भेजें, ताकि पुलिस कमिश्नरेट और सभी जिला पुलिस प्रमुखों को सर्कुलर जारी कर अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके.

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