पैदल यात्रियों को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारों को बताया सर्वोच्च
सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार मोटर वाहनों के विशेषाधिकार से ऊपर है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने कहा कि सुरक्षित फुटपाथ बनाए रखना नगर पालिकाओं का कर्तव्य है.
सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि फुटपाथ पर चलने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत एक मौलिक अधिकार माना गया है, जिसमें सुरक्षित और अच्छी तरह से चिह्नित फुटपाथ तक पहुंचने का अधिकार भी शामिल है. सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि तय किए गए फुटपाथ पर चलने के अधिकार का कोई भी उल्लंघन होने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुआवजे और भरपाई के लिए संवैधानिक कानूनी उपायों का सहारा लिया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट केजस्टिस पीएस नरसिम्हा, जिन्होंने यह फैसला लिखा था, ने कहा, अगर कोई सड़क है, तो यह पक्का करना जरूरी है कि पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ तय हो और उसे मेंटेन किया जाए. यह एक लागू करने लायक ड्यूटी है. तय फुटपाथ पर चलने का फंडामेंटल राइट, मोटर वाली गाड़ी के प्रिविलेज से ऊपर होगा. यह फैसला एक पांच साल के लड़के की मौत के मामले में आया, जिसे अपने पिता के साथ पड़ोस के स्कूल जाते समय एक ट्रक ने कुचल दिया था.
फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि चौड़े फुटपाथ पर सुरक्षित और बेफिक्र होकर चलना, हर मोड़ पर बिना किसी खतरे के, सबसे बेसिक राइट्स है. जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, “यह सबसे आसान इंसानी काम है, जो जिंदगी से जुड़ा हुआ है.”
सुप्रीम कोर्ट ने सीमांकित और अच्छी तरह से बनाए रखे गए फुटपाथों पर चलने की स्वतंत्रता को एक मौलिक अधिकार घोषित किया, जिसे मोटर चालित वाहनों द्वारा चलने पर प्राथमिकता दी जाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “यदि कोई सड़क मौजूद है, तो यह सुनिश्चित करना एक कर्तव्य होना चाहिए कि पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ सीमांकित और बनाए रखा जाए. यह एक लागू करने योग्य कर्तव्य है. सीमांकित फुटपाथों पर चलने का मौलिक अधिकार मोटर चालित वाहन के विशेषाधिकार पर हावी होगा.”
फुटपाथ को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा, चलने के बुनियादी अधिकार के लिए बस एक आरामदायक जगह चाहिए जहां आसानी से और बेफिक्र होकर चला जा सके. क्या यह एक म्युनिसिपल अथॉरिटी की नागरिकों के प्रति कम से कम जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 ने कभी भी चलने के बुनियादी अधिकार को पहचानने की जहमत नहीं उठाई.



