उद्धव का छोड़कर साथ शिंदे के बनेंगे खास

- दिल्ली की उड़ान में सवार छह सांसद
- महाराष्ट्र की राजनीति में फिर आनेे वाला है भूचाल
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। खबर है कि शिवसेना (यूबीटी) के आधा दर्जन सांसद दिल्ली पहुंच गये हैं और दोपहर बाद वे महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के दरबार में हाजिरी लगाकर अपनी नई राजनीतिक जन्मपत्री की शुरूआत करेंगे। उद्धव ठाकरे के लिए यह खबर वैसी ही है जैसे किसी किसान को फसल कटने से पहले टिड्डियों के हमले की सूचना मिल जाए। जिस पार्टी को बालासाहेब ठाकरे ने अपने खून-पसीने से सींचा वह अब धीरे-धीरे राजनीतिक रियल एस्टेट की तरह हिस्सों में बंटती दिखाई दे रही है। पहले विधायक गए फिर संगठन गया और अब सांसदों की कतार भी निकल पड़ी है। दिल्ली की राजनीति भी बड़ी दिलचस्प चीज है। यहां विचारधारा अक्सर एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में सामान बदल लेती है। जो नेता कल तक लोकतंत्र बचाने के लिए छाती पीट रहे थे वही आज सत्ता के स्थायित्व और विकास की दुहाई देते हुए नए झंडे के नीचे दिखाई दे रहे है। राजनीति में इसे अवसरवाद नहीं परिस्थितियों के अनुरूप वैचारिक पुनर्जन्म कहा जाता है। दिल्ली के गलियारों में यह भी चर्चा है कि यह पूरा घटनाक्रम अचानक नहीं हुआ। इसे पश्चिम बंगाल में चल रहे कथित ऑपरेशन लोटस की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। राहुल गांधी द्वारा केंद्र सरकार को लेकर की गई भविष्यवाणियों और विपक्षी एकजुटता के दावों के बीच भाजपा का रणनीतिकार वर्ग अब कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। सत्ता के गणित में जितने ज्यादा सांसद उतनी ज्यादा निश्चिंत नींद।
उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर उद्धव ठाकरे की राजनीतिक साख पर पड़ सकता है। लोकसभा चुनाव में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन के बाद यूबीटी खेमे में नई ऊर्जा दिखाई दी थी। लेकिन यदि सांसदों का एक बड़ा समूह अलग होता है तो यह संदेश जा सकता है कि संगठन के भीतर असंतोष अभी भी समाप्त नहीं हुआ है राजनीतिक रूप से यह सिर्फ संख्या का मामला नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी है। हर नया दल-बदल कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर डालता है और विरोधियों को नया हथियार दे देता है।
दिल्ली क्यों बनी राजनीतिक केंद्रबिंदु?
सवाल उठ रहा है कि यह राजनीतिक हलचल महाराष्ट्र के बजाय दिल्ली में क्यों दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण अब राज्यों की राजनीति को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र की राजनीति गठबंधन सहयोगियों के सहारे चल रही है। ऐसे में भाजपा के लिए संसद में अपनी स्थिति को अधिक मजबूत करना रणनीतिक प्राथमिकता हो सकती है। यदि विपक्षी दलों के सांसद सत्तारूढ़ गठबंधन के करीब आते हैं तो इससे राजनीतिक संदेश भी जाता है और संख्या बल भी बढ़ता है।
क्या यह ऑपरेशन लोटस का नया अध्याय है?
विपक्षी दल इस संभावित घटनाक्रम को ऑपरेशन लोटस की नई कड़ी के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। विपक्ष का आरोप रहा है कि विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के नेताओं को अपने पाले में लाने के लिए योजनाबद्ध प्रयास किए जाते हैं। दूसरी ओर भाजपा और उसके सहयोगी दल इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि नेताओं का समर्थन विकास और नेतृत्व में विश्वास के कारण मिलता है।
इसलिए टूट गयी उद्धव सेना : बीजेपी
भाजपा प्रवक्ता आरपी सिंह ने शिवसेना (यूबीटी) सांसदों के दलबदल पर बातचीत करते हुए कहा है कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना असली थी जो हिंदुत्व के विचार को लेकर आगे बढ़ी। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना हिंदुत्व की राह से भटकी और कांग्रेस की पिछलग्गू पार्टी बन गई। इसके चलते मूल शिवसेना एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में एकत्रित हुई है। आज शिवसेना यूबीटी के 6 सांसद एकनाथ शिंदे के साथ जुड़ें। असली शिवसेना वही है जो हिंदुत्व की विचारधारा को मानती है और जिसके पास सांसद और विधायक हैं।
शिंदे की बढ़ती ताकत
एकनाथ शिंदे के लिए यह घटनाक्रम राजनीतिक विस्तार का अवसर माना जा रहा है। मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने के बाद से शिंदे लगातार खुद को शिवसेना की मुख्य धारा के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। यूबीटी के सांसदों का सहयोग मिलने के बाद उनका यह दावा और मजबूत हो गया है कि पार्टी का बड़ा हिस्सा अब उनके नेतृत्व को स्वीकार कर रहा है।
महाराष्ट्र की सियासत में हलचल नई राजनीतिक करवट
महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। दिखाई दे रही है। शिवसेना (यूबीटी) के आधा दर्जन सांसदों के दिल्ली पहुंचने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। शिवसेना यूबीटी सांसदों की बगावत उद्धव ठाकरे के लिए एक और बड़ा राजनीतिक झटका माना है। वर्ष 2022 में शुरू हुई टूट का सिलसिला अब भी थमता नजर नहीं आ रहा है। पहले विधायकों का बड़ा समूह अलग हुआ फिर संगठनात्मक ढांचे में बदलाव आया और अब सांसदों के स्तर पर भी दरार चौड़ी हो गयी।
राहुल गांधी की भविष्यवाणियां और सरकार में बढ़ी बेचैनी
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विपक्ष की ओर से लगातार सरकार पर दबाव बनाने और संभावित राजनीतिक बदलावों की भविष्यवाणियों ने सत्ताधारी खेमे को भी सक्रिय कर दिया है। राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं ने समय-समय पर केंद्र सरकार की स्थिरता को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि भाजपा सार्वजनिक रूप से ऐसे दावों को खारिज करती रही है लेकिन राजनीतिक रणनीति के स्तर पर कोई भी दल अपनी स्थिति को और मजबूत बनाने का अवसर छोडऩा नहीं चाहता।
जनता भी बड़ी उलझन में
उधर जनता भी बड़ी उलझन में है। उसे समझ नहीं आता कि चुनाव में उसने जिस उम्मीदवार को एक विचारधारा के नाम पर वोट दिया था वह कुछ साल बाद दूसरी विचारधारा का प्रचारक कैसे बन जाता है। जनता पांच साल तक महंगाई बेरोजगारी और टैक्स की मार झेलती रहती है जबकि नेता दल बदल को लोकतंत्र का उत्सव बताकर नई कुर्सी पर विराजमान हो जाते हैं। फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति फिर एक बड़े मोड़ पर खड़ी है। उद्धव ठाकरे के सामने अस्तित्व का संकट और शिंदे के सामने विस्तार का अवसर है। दिल्ली मुस्कुरा रही है मुंबई बेचैन है और कार्यकर्ता अपने अपने नेताओं के बयान का इंतजार कर रहे हैं।
आगे क्या होगा?
यूबीटी सांसदों के शिंदे की शिवसेना में विलय के बाद इतना तय है कि महाराष्ट्र की राजनीति शांत नहीं होने वाली। यहां हर कुछ महीनों में सत्ता, संगठन और सिद्धांतों की नई परिभाषाएं लिखी जाती हैं। और इस बार भी कहानी वही है किरदार पुराने हैं मंच वही है सिर्फ संवाद बदल गए हैं। राजनीति का यह नाटक जारी है दर्शक भी वही हैं और टिकट खरीदने वाली जनता भी। फर्क बस इतना है कि पटकथा हर बार पहले से ज्यादा चौंकाने वाली होती जा रही है।




