हत्यारा सरकारी सिस्टम !
युवाओं की मौत का जिम्मेदार कौन ?

- लखनऊ अग्निकांड मौत का लाइसेंस किसने दिया?
- जिस भवन में लगी आग उसके ध्वस्तीकरण के थे आदेश बाद में एलडीए ने वापस लिये
- सूरत से लखनऊ तक की एक ही कहानी
- रिश्वत के दम पर खड़े मौत के महल
- हर हादसे के बाद जागती है सरकार और फिर सो जाता है जमीर
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। ब्रेकिंग न्यूज का लाल पट्टा फिर चमका एक बार फिर कैमरे दौड़े अफसर फिर पहुंचे नेताओं ने फिर दुख जताया जांच के आदेश फिर जारी हुए। 15 मासूम बच्चों की अधजली कॉपियां पिघली हुई पानी की बोतलें और राख में बदले सपने फिर एक सरकारी फाइल का हिस्सा बन गए। सवाल यह नहीं है कि लखनऊ में आग कैसे लगी। सवाल यह है कि आखिर वह इमारत खड़ी कैसे थी?
सवाल यह है कि बच्चों को पढ़ाने के नाम पर मौत का अड्डा चलाने की अनुमति किसने दी? सवाल यह है कि फायर एनओसी के बिना सुरक्षा मानकों के बिना इमरजेंसी एक्जिट के बिना नियम कानून को दरकिनार कर लगी आग से जो 15 मासूम सपने खाक बन गये हैं उनका जिम्मेदार कौन है और इन लोगों की पीठ पर किसका हाथ है? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन 15 बच्चों की मौत का हत्यारा कौन है? वह आग जिसने बच्चों को जिंदा निगल लिया? वह मालिक जिसने नियमों को कूड़ेदान में फेंक दिया? वह अधिकारी जिसने रिश्वत लेकर आंखें बंद कर लीं या फिर वह नेता जिसने संरक्षण दिया या फिर हम सब जो हर हादसे के बाद दो मिनट दुखी होकर अगले दिन सब भूल जाते हैं?
हादसे में जान गंवाने वालों की सूची पांच घायल, दो का जारी है इलाज
इस हादसे में लखनऊ के जानकीपुरम थाना गुडंबा के शाहजान, आलमबाग के सुखमनी सिंह, सीतापुर के आदित्य श्रीवास्तव, ज्वानिल चक्रवर्ती, गुडंबा के सागर पंत, हजरतगंज के नीलेश, कानपुर नगर के सय्यम, भविष्य, चिनहट की ज्योति, शहादतगंज के अब्दुल रहमान, न्यू अलीपुर कोलकाता की अनामिका सामंत, बाराबंकी के मो. अम्मार, उतरेठिया लखनऊ के अनुच्छा और दक्षिणी 24 परगना, बंगाल की सोमाल्या की जान चली गई। वहीं, इस हादसे में अलीगंज, लखनऊ की रहने वाली लवप्रीत और ऐशबाग, लखनऊ के रहने वाले जयंत गंभीर रूप से घायल हो गए हैं, जिनका इलाज केजीएमयू में चल रहा है। हादसे के बाद सरकार की ओर से एक्शन तेज कर दिया गया है। इमारत के मालिक समेत 4 नामजद और अज्ञात आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। बीएनएस की 105, 110, 125 और 3(5) की गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है। हादसे के बाद प्रशासन की ओर से लापरवाही की जांच शुरू की गई और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी गई है। अग्निकांड में चार आरोपी निलंबित कर दिए गए हैं और तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। निलंबित किए गए अधिकारियों में गौरव कुमार, एक्सईएन कलेक्शन जानकीपुरम, कमलेन्द्र कुमार सिंह, एफएसएसओ इंदिरा नगर, अनिल कुमार, सहायक अभियंता (एई) और प्रमोद पांडे, जूनियर इंजीनियर (जेई) शामिल हैं। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद इन अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई की गई। पुलिस ने इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार आरोपियों में रामकृष्ण उपाध्याय (43 वर्ष), वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला (62 वर्ष), और तुषॉक कृष्णा जायसवाल (31 वर्ष) शामिल हैं।
इमारत नहीं जली, तमाम दावों को भी किया राख
लखनऊ की इस भयावह त्रासदी ने सिर्फ एक इमारत नहीं जलाई। इसने शासन-प्रशासन के उन तमाम दावों को भी राख कर दिया है जिनमें स्मार्ट सिटी, सुरक्षित शहर और सुशासन की बातें की जाती हैं। क्योंकि सच यह है कि भारत के लगभग हर बड़े शहर में हजारों ऐसी इमारतें खड़ी हैं जिनकी दीवारों पर रंग रोगन भले चमकता हो लेकिन भीतर मौत अपने अवसर का इंतजार करती रहती है। कुछ वर्ष पहले गुजरात के सूरत में कोचिंग सेंटर में लगी आग ने पूरे देश को झकझोर दिया था। बच्चे छत से कूदे थे, चीखे थे, जलते हुए सपनों ने आसमान तक धुआं भेजा था। उसके बाद कसम खाई गई थी कि ऐसा दोबारा नहीं होगा। लेकिन हुआ। दिल्ली में होटल जला लोग मरे। राजधानी में अस्पतालों में आग लगी मरीज मरे। बेसमेंट में पानी भरा छात्र डूब गए। लखनऊ के होटल में आग लगी यात्री मारे गए। अब फिर बच्चों की चिताएं जल रही हैं। हर बार एक ही पटकथा चलती है हादसा हंगामा और जांच निलंबन मुआवजा और फिर खामोशी।
15 मौतों के बाद कटघरे में एलडीए की भूमिका
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार आग लगने वाला भवन मूल रूप से वर्ष 1980 में किराया-क्रय योजना के तहत विजय कुमार को आवंटित किया गया था। बाद में 2005 में यह संपत्ति विजय कुमार और उनकी पत्न्ी उषा के नाम दर्ज हुई तथा वर्ष 2013 में इसे वीरेंद्र प्रताप शुक्ला और सुरेंद्र प्रताप शुक्ला को बेच दिया गया। करीब 1992 वर्गफुट क्षेत्रफल वाली इस इमारत का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था। लेकिन इसके बाद भवन में कथित रूप से अनाधिकृत निर्माण किए जाने की शिकायतें सामने आईं। जांच के उपरांत लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने वर्ष 2016 में वीरेंद्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज कराया। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जांच के बाद 10 मई 2016 को एलडीए ने अवैध निर्माण के विरुद्ध ध्वस्तीकरण का आदेश पारित कर दिया था। हालांकि हैरानी की बात यह है कि महज दो माह के भीतर, 5 जुलाई 2016 को उसी आदेश को निरस्त भी कर दिया गया। आखिर किन परिस्थितियों में ध्वस्तीकरण का आदेश वापस लिया गया, यह अब सबसे बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है। सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड के बाद पुराने दस्तावेज और एलडीए की कार्यवाही फिर जांच के घेरे में हैं। यदि भवन में अनियमितताएं थीं और उन्हें लेकर कार्रवाई भी हुई थी, तो फिर अंतिम निष्कर्ष क्या निकला? क्या सभी खामियां दूर कर दी गई थीं या फाइलों में ही मामला दब गया? 15 मौतों के बाद अब इन सवालों के जवाब तलाशना जांच एजेंसियों और प्रशासन दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।




