गुजरात में 46 लाख के खर्च पर बवाल, 12 लाख का पानी, 20 लाख का लंच… बिलों ने मचाई हलचल

गुजरात में डिमोलिशन ड्राइव के दौरान हुए खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं... रिपोर्ट्स के मुताबिक पानी, लंच और अन्य व्यवस्थाओं पर लाखों...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात के राजकोट शहर में हाल ही में नगर निगम द्वारा चलाए गए एक बड़े डिमोलिशन अभियान ने सुर्खियां बटोरीं.. अवैध निर्माणों को हटाने की इस कार्रवाई की शुरुआत में तो प्रशंसा हुई.. लेकिन अब इस अभियान के दौरान हुए खर्च को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है.. जंगलेश्वर इलाके में अवैध इमारतों को तोड़ने के लिए नगर निगम ने भारी तैयारी की थी.. हजारों अधिकारी, पुलिसकर्मी और कर्मचारी इस काम में लगे रहे.. लेकिन अब पता चला है कि सिर्फ चाय, नाश्ता, लंच.. और पानी पर लाखों रुपये खर्च कर दिए गए.. कुल मिलाकर यह खर्च 46 लाख रुपये के आसपास पहुंच गया है.. इस पर अब नगर निगम की स्टैंडिंग कमेटी ने रोक लगा दी है.. और अधिकारियों से लिखित जवाब मांगा है..

जानकारी के अनुसार यह पूरा मामला फरवरी महीने का है.. राजकोट नगर निगम ने पूर्वी जोन के वार्ड नंबर 16 में जंगलेश्वर इलाके को चुना.. यह जगह आजी नदी के किनारे और टीपी रोड पर स्थित है.. यहां पर कई सालों से अवैध निर्माण हो रहे थे.. लोग बिना अनुमति के घर, दुकानें और अन्य संरचनाएं बना लेते थे.. नगर निगम ने फैसला किया कि इन सबको हटाया जाए.. अभियान में करीब 1400 अवैध निर्माणों को ध्वस्त किया गया.. इस काम में नगर निगम, पुलिस और अन्य विभागों के 4800 से ज्यादा अधिकारी और कर्मचारी तैनात किए गए.. कई दिनों तक यह कार्रवाई चली..

अभियान के दौरान अधिकारियों और कर्मचारियों की सुविधा के लिए भोजन.. और पेयजल की व्यवस्था की गई.. लेकिन अब जब बिल आए तो हर किसी की आंखें खुल गईं.. चाय-नाश्ते और लंच पर 27 लाख 20 हजार 946 रुपये का खर्च दिखाया गया.. इसमें 13,390 स्पेशल लंच पैकेट, मसाला छाछ.. और 4000 नींबू-अदरक शरबत की बोतलें शामिल थीं.. इन पर 20 लाख 68 हजार 500 रुपये खर्च हुए.. सिर्फ मिनरल वॉटर पर 12 लाख 40 हजार 28 रुपये खर्च किए गए.. मंडप सर्विस पर भी 6 लाख 70 हजार 678 रुपये का बिल आया.. सब मिलाकर कुल खर्च करीब 46.31 लाख रुपये हो गया..

नगर निगम की स्टैंडिंग कमेटी जब इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए देख रही थी.. तो सदस्यों ने सवाल उठा दिए.. उन्होंने कहा कि तोड़फोड़ जैसी सामान्य कार्रवाई में इतना भारी खर्च कैसे हो सकता है.. कमेटी ने बिल पर रोक लगा दी.. और अधिकारियों से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा.. अब इस मामले की जांच हो रही है.. नगर निगम का कहना है कि अभियान बहुत संवेदनशील था.. हजारों लोग कई दिनों तक लगातार ड्यूटी पर थे.. अगर वे काम छोड़कर बाहर भोजन करने जाते तो काम रुक जाता.. इसलिए जगह पर ही खाने-पीने की व्यवस्था की गई.. अधिकारियों का तर्क है कि कर्मचारियों की थकान कम करने.. और काम को बिना रुके पूरा करने के लिए यह जरूरी था..

लेकिन विपक्षी दल कांग्रेस ने इस खर्च को भ्रष्टाचार बताया है.. कांग्रेस के राजकोट जिलाध्यक्ष राजदीपसिंह जाडेजा ने कहा कि एक तरफ गरीबों के घर तोड़े जा रहे थे.. लोग रो रहे थे, और दूसरी तरफ अधिकारी टैक्स के पैसे से जलेबी-गांठिया.. और तरह-तरह के व्यंजन खा रहे थे.. उन्होंने इसे शर्मनाक करार दिया.. और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की..

सबसे ज्यादा सवाल मिनरल वॉटर के खर्च को लेकर उठ रहे हैं.. अगर एक 200 मिलीलीटर की पानी की बोतल औसतन 5 रुपये की मानें तो.. 12 लाख 40 हजार रुपये में करीब 2 लाख 48 हजार बोतलें आ सकती हैं.. इतनी सारी बोतलें कितने लोगों ने पीं.. यह सवाल कई लोगों के मन में है.. स्थानीय लोग और विपक्ष कह रहे हैं कि खर्च की पारदर्शिता पर शक है..

इस अभियान की पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है.. राजकोट में कई सालों से अवैध निर्माण की समस्या बढ़ रही थी.. नदी किनारे, सड़कों पर और खाली जगहों पर लोग कब्जा कर लेते थे.. इससे शहर का विकास रुक रहा था.. ट्रैफिक की समस्या बढ़ रही थी.. बाढ़ जैसे खतरे भी थे, क्योंकि नदी किनारे निर्माण हो रहे थे.. नगर निगम ने कोर्ट के आदेशों और नियमों के अनुसार कार्रवाई की.. 1400 निर्माण हटाने का काम आसान नहीं था.. सुरक्षा के लिए भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा..

अभियान के दौरान 21 से 27 फरवरी तक लगातार काम चला.. सुबह से शाम तक अधिकारी और कर्मचारी मौके पर डटे रहे.. ऐसे में उनके लिए ऊर्जा बनाए रखने के लिए भोजन जरूरी था.. लंच पैकेट में क्या-क्या शामिल था.. यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर पैकेट मंगवाए गए.. मसाला छाछ और नींबू-अदरक शरबत गर्मी में राहत देने के लिए अच्छा विकल्प माना जाता है.. लेकिन सवाल यह है कि क्या इतनी मात्रा वाकई जरूरी थी..

नगर निगम के एक अधिकारी ने अनौपचारिक रूप से बताया कि कर्मचारियों की संख्या बहुत ज्यादा थी.. 4800 से ज्यादा लोग कई दिन तक ड्यूटी पर थे.. अगर हर व्यक्ति के लिए रोज दो बार चाय-नाश्ता.. और एक लंच का इंतजाम किया जाए तो आंकड़ा बड़ा हो सकता है.. लेकिन फिर भी 27 लाख का खर्च सामान्य नहीं लगता.. मंडप सर्विस का खर्च भी अलग से आया है.. शायद टेंट, कुर्सियां और अन्य व्यवस्था के लिए यह खर्च हुआ.. यह विवाद सिर्फ राजकोट तक सीमित नहीं है.. पूरे देश में सरकारी खर्चों पर सवाल उठते रहते हैं.. जनता के टैक्स का पैसा कहां और कैसे खर्च होता है.. यह हर नागरिक जानना चाहता है.. अगर डिमोलिशन जैसे काम में इतना खर्च होता है.. तो दूसरे विकास कार्यों में कितना खर्च होगा.. यह सोचने वाली बात है..

नगर निगम की स्टैंडिंग कमेटी ने जो रोक लगाई है.. वह सही कदम माना जा रहा है.. कमेटी के सदस्यों ने कहा कि बिना जांच के बिल पास नहीं किया जाएगा.. अधिकारियों को सभी बिलों के साथ वाउचर, बिल की कॉपी.. और अन्य दस्तावेज जमा करने होंगे.. यह जांच कितने दिनों में पूरी होगी.. अभी कहना मुश्किल है.. कांग्रेस ने न सिर्फ आरोप लगाए.. बल्कि इस मामले को जनता के बीच ले जाने की बात भी कही है.. उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए.. अगर भ्रष्टाचार पाया गया तो दोषियों पर सख्त एक्शन लिया जाए.. भाजपा की ओर से अभी औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.. लेकिन नगर निगम प्रशासन बचाव की मुद्रा में है..

 

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