राम मंदिर में CEO मॉडल पर बहस तेज, क्या हैं विवाद की वजहें?

करोड़ों रामभक्त अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ रामलला के चरणों में चढ़ावा चढ़ाते हैं. लेकिन उसी चढ़ावे में कथित चोरी ने श्रद्धालुओं को गहरा आघात पहुंचाया है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: करोड़ों रामभक्त अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ रामलला के चरणों में चढ़ावा चढ़ाते हैं. लेकिन उसी चढ़ावे में कथित चोरी ने श्रद्धालुओं को गहरा आघात पहुंचाया है. सूत्रों के मुताबिक, इस घटनाक्रम के बाद राम मंदिर के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव पर मंथन तेज हो गया है.

अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावे में कथित चोरी ने करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को झटका दिया है. अब सवाल सिर्फ चोरी का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था और जवाबदेही तय करने का है. लेकिन सवाल ये है कि क्या पारदर्शिता के नाम पर बदलाव की कोशिश को वीएचपी, ट्रस्ट और संत समाज स्वीकार करेगा? या फिर इसे मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लाने की कोशिश मान इसका विरोध सामने आएगा.

दरअसल, करोड़ों रामभक्त अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ रामलला के चरणों में चढ़ावा चढ़ाते हैं. लेकिन उसी चढ़ावे में कथित चोरी ने श्रद्धालुओं को गहरा आघात पहुंचाया है. इसे सिर्फ पैसों की चोरी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था के साथ विश्वासघात माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, इस घटनाक्रम के बाद राम मंदिर के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव पर मंथन तेज हो गया है. तिरुपति बालाजी की तर्ज पर सीईओ व्यवस्था और प्रशासनिक बदलाव पर चर्चा है.

मंदिर पर सरकारी नियंत्रण स्वीकार्य नहीं:VHP
इस पूरे मामले में पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारियां हुई हैं, लेकिन अब पूरी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक, इसी के बाद मंदिर के प्रशासनिक और वित्तीय ढांचे में बदलाव पर मंथन शुरू हुआ है. हालांकि, विश्व हिंदू परिषद (VHP) अध्यक्ष आलोक कुमार का कहना है कि इस कथित घटना का फायदा उठाकर राम मंदिर या अन्य मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेने की कोशिश नहीं होनी चाहिए.

संगठन का स्पष्ट मत है कि मंदिर स्वायत्त रहें, सरकारी नियंत्रण स्वीकार्य नहीं है. हालाकि VHP प्रमुख का बयान है कि पूरी टीम को बदलने की जरूरत नहीं है, लेकिन मंदिर चलाने का जिनको अनुभव है प्रशासन का अनुभव है ऐसे लोगों को लाना चाहिए.

CEO व्यवस्था लागू करने पर गंभीर विचार
सूत्रों के मुताबिक, राम मंदिर में तिरुपति बालाजी मॉडल की तर्ज पर CEO व्यवस्था लागू करने पर गंभीर विचार किया जा रहा है. चर्चा है कि प्रशासनिक जिम्मेदारी एक अनुभवी अधिकारी को सौंपी जा सकती है. हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है लेकिन किसी वरिष्ठ रिटायर्ड आईएएस अधिकारी को ये काम दिया जा सकता है.

सरकारी व्यवस्था का विरोध शुरू
वहीं कई संत इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं. उनका मानना है कि मंदिर की परंपरागत व्यवस्था में किसी सरकारी या प्रशासनिक सीईओ की नियुक्ति उचित नहीं होगी. ऐसे में पारदर्शिता और मंदिर की स्वायत्तता के बीच संतुलन कैसे बनेगा, यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है. अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव जितेंद्रानंद सरस्वती ने भी सरकारी व्यवस्था थोपे जाने का विरोध शुरू कर दिया है.

CEO मॉडल होगा लागू या संत समाज पड़ेगा भारी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और संत समाज का जोर पारदर्शी और सुव्यवस्थित संचालन पर है. उनकी प्राथमिकताओं में मंदिर की सुरक्षा, चढ़ावे का सटीक प्रबंधन और भक्तों की सुविधा शामिल है. सूत्रों के मुताबिक, नई प्रशासनिक व्यवस्था पर मंथन जारी है. अब सबकी निगाह 7 जुलाई को ट्रस्ट के प्रस्तावित बैठक पर रहेगी कि क्या सीईओ मॉडल पर अंतिम फैसला होता है? और क्या ट्रस्ट, वीएचपी तथा संत समाज किसी साझा सहमति पर पहुंच पाते हैं या नहीं?

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