कौन हैं भगवान झूलेलाल? जानिए उनकी जन्म कथा और चालिहो पर्व का रहस्य

16 जुलाई से शुरू हो रहे सिंधी समाज के चालिहो महोत्सव में 40 दिनों तक भगवान झूलेलाल की आराधना होगी। जानिए अंतिम 9 दिन की कठिन तपस्या, झूलेलाल के अवतरण की कथा और 25 अगस्त की जयंती का महत्व।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: आस्था, तपस्या और सामाजिक एकता का प्रतीक सिंधी समाज का प्रमुख धार्मिक पर्व चालिहो महोत्सव 16 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। 40 दिनों तक चलने वाले इस विशेष पर्व में श्रद्धालु भगवान झूलेलाल की आराधना करते हैं। महोत्सव के अंतिम नौ दिन सबसे कठिन माने जाते हैं, जब श्रद्धालु कठोर व्रत और विशेष साधना के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। इस वर्ष महोत्सव का समापन 25 अगस्त को भगवान झूलेलाल जयंती के साथ होगा।

40 दिन की साधना और अंतिम 9 दिन की कठिन तपस्या

चालिहो महोत्सव की शुरुआत झूलेलाल मंदिरों में कलश स्थापना के साथ होगी। पूरे महोत्सव के दौरान भजन-कीर्तन, आरती, धार्मिक प्रवचन और आकर्षक झांकियों का आयोजन किया जाएगा। सिंधी समाज के अनुसार अंतिम नौ दिनों की तपस्या विशेष महत्व रखती है, जिसमें श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ भगवान झूलेलाल की आराधना करते हैं। गोरखपुर में सिंधी समाज के करीब 800 परिवार हैं और यहां भगवान झूलेलाल के सात मंदिर स्थापित हैं।

क्या है भगवान झूलेलाल के अवतरण की कथा?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग एक हजार वर्ष पहले सिंध प्रांत में मिरख बादशाह के अत्याचारों से परेशान होकर सिंधी समाज ने सिंधु नदी के तट पर भगवान वरुण की आराधना शुरू की। लगातार 31 दिनों तक पूजा के बाद भी कोई संकेत नहीं मिला, जिसके बाद श्रद्धालुओं ने अंतिम नौ दिनों तक कठोर व्रत रखा। 40वें दिन भगवान वरुण ने प्रकट होकर भविष्यवाणी की कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नसरपुर में एक दिव्य बालक जन्म लेगा, जो अत्याचार का अंत करेगा।

कैसे पड़ा भगवान झूलेलाल नाम?

पुजारियों के अनुसार, नसरपुर में ठाकुर रतन राय और माता देवकी के घर जन्मे बालक उदयचंद ही आगे चलकर भगवान झूलेलाल कहलाए। मान्यता है कि जब मिरख बादशाह बालक को मारने पहुंचा तो वह पालने से अदृश्य होकर दिव्य रूप में उसके सामने प्रकट हुए और अन्याय छोड़ने का संदेश दिया। पालने में झूलते हुए बालक के इसी स्वरूप के कारण उन्हें भगवान झूलेलाल नाम मिला। सिंधी समाज आज भी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाता है।

रिपोर्ट – अमरेंद्र पांडेय, गोरखपुर

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