कॉकरोचों से घबराई सरकार, अभिजीत दीपके को शाह की पुलिस ने किया गिरफ्तार

कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद' मार्च को लेकर दिल्ली पुलिस हाई अलर्ट पर है। जंतर-मंतर के पास 5000 जवान तैनात किए गए हैं, इसके अलावा धरना स्थल क्षेत्र में धारा 163 लागू की गई है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: कॉकरोच जनता पार्टी के ‘चलो संसद’ मार्च को लेकर दिल्ली पुलिस हाई अलर्ट पर है। जंतर-मंतर के पास 5000 जवान तैनात किए गए हैं, इसके अलावा धरना स्थल क्षेत्र में धारा 163 लागू की गई है।

पहले रायसीना रोड पर करीब 12.30 बजे प्रदर्शनकारियों ने संसद मार्ग के तरफ कूच करने की कोशिश की। पुलिसकर्मियों ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तक बैरिकेडिंग तोड़कर युवा आगे बढ़ने लगे। इस पर पुलिस कर्मियों को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और लाठीचार्ज करना पड़ा। इतना ही नहीं कॉकरोच जनता पार्टी के फउंडर अभिजीत दीपके को पुलिस ने जंतर-मंतर से हिरासत में ले लिया है। सरकार पूरी तरह से घबरा चुकी है।

पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर हो रहे कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान एक अजीब सी तस्वीर सामने आई. संसद की ओर कूच कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया. इस दौरान एक वीडियो ने सोशल मीडिया यूजर्स का ध्यान खींचा है. लाठी चार्ज के दौरान एक युवा पुलिस के सामने अड़ गया. इस दौरान छात्र ‘मारो, मुझे मारो, मेरी जान ले लो’ कहता हुआ सुनाई दिया.

जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर आया, लोग इसे धड़ाधड़ वायरल करने लगे और पुलिस और सरकार के इस रवैये पर नाराजगी जताने लगे. बता दें, कॉकरोज जनता पार्टी के आह्वान पर आज संसद मार्च का आह्वान किया गया था, जिसमें शामिल होने के बाद देश के कोने-कोने से हजारों छात्र जंतर-मंतर पहुंचे हैं.

कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले जैसे ही छात्रों ने संसद की ओर कूच करना शुरू किया, पुलिस ने छात्रों को रोकने के लिए लाठी चार्ज कर दिया. इस दौरान कई छात्र इधर-उधर भागते नजर आए. हालांकि, एक छात्र पुलिस के सामने डट गया. वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस छात्र को घेरे खड़ी है और उस पर चारों तरफ से लाठी बरसाई जा रही हैं, लेकिन वह छात्र आक्रोश में डटा हुआ है और अपने शरीर पर लाठियां सहता जा रहा है.

सोनम वांगचुक के समर्थन में और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए बड़ी संख्या में कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ता और अलग-अलग जगहों से जंतर-मंतर पहुंचे छात्र ‘चलो संसद’ मार्च का हिस्सा बने. इस शांतिपूर्ण मार्च के जरिए छात्रों की मांग है कि सरकार नीट पेपर लीक का जवाब दे और जिम्मेदारों पर एक्शन ले. हालांकि, खबरें हैं शांति से चल रहे मार्च में पुलिस जवानों ने छात्रों पर लाठियां चलाई हैं, जिसको लेकर विपक्ष के सांसद नाराज हैं.

इसी क्रम में समाजवादी पार्टी के सांसद जंतर-मंतर पहुंचे हैं. समाजवादी पार्टी के डिंपल यादव, इकरा हसन, प्रिया सरोज, जियाउर्रहमान बर्क, राजीव राय, रुचि वीरा और धर्मेंद्र यादव समेत कई सांसद इस प्रोटेस्ट में पहुंचे हैं. उनके हाथ में बैनर हैं, ‘नीट है या चीट है.’ इसी के साथ सपा सांसद और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने ‘चलो संसद’ मार्च को लेकर संसद के बाहर बड़ा बयान दिया. उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के बच्चे लाठियां खा रहे हैं. सरकार छात्रों की सुनना ही नहीं चाहती है.

डिंपल यादव ने कहा कि देश में यह मजाक हो रहा है. सपा सांसद का यह भी कहना है कि नीट की पूरी प्रॉसेस करप्ट है. देश में न जाने कितने पेपर लीक हुए हैं. सवाल यही है कि इसकी जिम्मेदारी सरकार लेगी या नहीं? अब पानी सिर के ऊपर से निकल चुका है. किसान भी परेशान हैं, छात्र भी परेशान हैं.

सपा सांसद इकरा हसन ने भी सीधे तौर पर बस इतना ही कहा है कि वह नैतिकता के आधार पर इस्तीफा चाहती हैं. इतना ही नहीं, खुद अखिलेश यादव ने भी मार्च का समर्थन करते हुए सरकार से सवाल किए हैं. अखिलेश यादव का कहना है कि यह सरकार नहीं अहंकार है. श्रद्धांजली में भी भेदभाव करती है. हजारों परिवार के बच्चे और छात्र यहां धरने पर बैठे हैं. वो चाहते हैं कि सरकार सुने, लेकिन सरकार सुनती नहीं है. छात्रों को प्रताड़ना देने का काम करती है.

कन्नौज सांसद अखिलेश यादव का कहना है कि नीट पेपर लीक में बीजेपी के लोग ही शामिल हैं. मैं युवा सांसदों से कहना चाहता हूं, जंतर- मंतर जाइए और पार्टी का संदेश दीजिए कि पार्टी आपके साथ है. लखनऊ वाले दिल्लीवालों को नीचा दिखा रहे हैं. दिल्लीवालों ने मंदिर का उद्धाटन किया था, इसलिए लखनऊ वालों ने जांच बैठाकर कंट्रोल अपने हाथ में रखा.

यह आंदोलन महज दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। देश के कई राज्यों में इसकी गूंज है। दिल्ली के साथ-साथ मुंबई में सोनम वांगचुक के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर देश में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और युवाओं की समस्याओं को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।

यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लाखों युवाओं की चिंताओं से जुड़ गया है जो रोजगार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। जब किसी आंदोलन को देश के अलग-अलग हिस्सों से समर्थन मिलने लगता है, तब यह केवल विरोध नहीं रह जाता बल्कि जनता के एक बड़े वर्ग की बेचैनी का संकेत बन जाता है। सोनम वांगचुक लंबे समय से शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं।

हाल के दिनों में उन्होंने छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर आवाज उठाई, जिसके बाद उनके समर्थन में देशभर में प्रदर्शन शुरू हुए। मुंबई में भी बड़ी संख्या में छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक सड़कों पर उतरे। कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति बनी तथा कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया। पुलिस द्वारा मामले दर्ज किए जाने के बाद यह विवाद और अधिक चर्चा में आ गया।

सरकार के आलोचकों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को किस नजर से देखा जाना चाहिए। भारतीय संविधान नागरिकों को अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है।

ऐसे में जब किसी आंदोलन के नेताओं को हिरासत में लिया जाता है या प्रदर्शन पर कड़ी पाबंदियां लगाई जाती हैं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार जनता की आवाज सुनने के बजाय उसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। आलोचकों का कहना है कि लोकतंत्र की असली ताकत संवाद में होती है, दमन में नहीं।

युवाओं के बीच बढ़ता असंतोष भी इस पूरे आंदोलन का महत्वपूर्ण पहलू है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ियों, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं।

लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं, लेकिन जब परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठते हैं तो उनके भविष्य पर भी असर पड़ता है। यही कारण है कि कई युवा संगठनों ने सोनम वांगचुक के आंदोलन को अपना समर्थन दिया। उनका मानना है कि यह केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं बल्कि छात्रों के अधिकारों और उनके भविष्य का सवाल है।

साथ ही आलोचकों का यह भी कहना है कि यदि युवाओं की समस्याओं का समाधान समय पर किया गया होता, तो शायद इस तरह के व्यापक आंदोलन खड़े ही नहीं होते। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में देरी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर असंतोष लगातार बढ़ता रहा है।

ऐसे में जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता इन मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाता है, तो उसे बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन मिलना स्वाभाविक है। आलोचकों का तर्क है कि सरकार को आंदोलनकारियों को विरोधी मानने के बजाय उनकी बात सुननी चाहिए और समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।

मुंबई के विरोध प्रदर्शनों ने यह भी दिखाया कि युवाओं और नागरिक समाज के बीच लोकतांत्रिक भागीदारी की इच्छा अब भी मजबूत है। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे, सोशल मीडिया पर अपनी बात रखी और आंदोलन के समर्थन में आवाज उठाई। यह लोकतंत्र का सकारात्मक पक्ष माना जा सकता है, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। दूसरी ओर यह सरकार के लिए भी एक संकेत है कि जनता की चिंताओं को गंभीरता से लिया जाए।

सोनम वांगचुक के समर्थन में कलाकारों और सार्वजनिक हस्तियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों ने भी इस आंदोलन को व्यापक पहचान दिलाई। कई लोगों ने कहा कि लोकतंत्र में हर आवाज का सम्मान होना चाहिए और असहमति को राष्ट्रविरोध या व्यवस्था विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न उभरता है—क्या सरकार आलोचना को स्वीकार करने की पर्याप्त क्षमता दिखा रही है? किसी भी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से मापी जाती है कि वह असहमति और विरोध को किस तरह संभालता है। यदि सरकार आलोचनाओं को सुनती है, संवाद स्थापित करती है और समस्याओं का समाधान खोजती है, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा मजबूत होता है। लेकिन यदि लोगों को यह महसूस होने लगे कि उनकी आवाज सुनी नहीं जा रही, तो असंतोष और बढ़ सकता है।

मुंबई में हुए प्रदर्शन और देशभर में सोनम वांगचुक को मिल रहा समर्थन यह संकेत देता है कि युवाओं से जुड़े मुद्दे अब केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रह सकते। रोजगार, शिक्षा और पारदर्शिता जैसे विषयों पर सरकार को ठोस परिणाम दिखाने होंगे। केवल घोषणाओं और दावों से लोगों की चिंताएं समाप्त नहीं होंगी। जनता, विशेषकर युवा वर्ग, अब जवाबदेही और परिणाम दोनों चाहता है।

यह विवाद केवल सोनम वांगचुक या किसी एक आंदोलन का नहीं है। यह उस व्यापक सवाल का प्रतीक बन चुका है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज कितनी प्रभावी है और सरकार उस आवाज को किस हद तक सुनने के लिए तैयार है। यदि सरकार और आंदोलनकारी संवाद के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, तो समाधान की संभावना मजबूत होगी। लेकिन यदि टकराव की राजनीति जारी रहती है, तो यह असंतोष और अधिक व्यापक रूप ले सकता है। इसलिए समय की मांग है कि लोकतांत्रिक मूल्यों, संवाद और जवाबदेही को प्राथमिकता दी जाए, ताकि जनता और सरकार के बीच विश्वास मजबूत हो सके।

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